दमोह – संत सैनिक हमारे रक्षक हैंः श्रवणानंद

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SCN NEWS हटा संवाददाता की रिपोर्ट

उपकाषी में बह रही ज्ञानगंगा

हटा, हमारे देष में संत और सैनिक के चरणों में हमारा सिर सदैव झुक जाता है क्योंकि इसमेें से जहां एक धर्म की रक्षा करता है तो दूसरा सैनिक राष्ट की रक्षा करता है। दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए हमें सदा ही इनका सम्मान करना चाहिए। उक्त विचार यहां चल रही श्रीमदभागवत कथा में स्वामी श्रवणानंद जी महाराज ने कहे हैं। उन्होनें स्वयं से जुड़े हुए एक प्रसंग को विस्तार से सुनाते हुए कहा कि जो सबको सम्मान दे और स्वयं सम्मान की कामना न करे वही प्रभु को प्यारा है क्योंकि अधिकांष लोग ही ऐसा चाहते हैं कि जिसको हम प्रणाम करें तो वह हमें आर्षीवाद प्रदान करे और हमें भी सम्मान की दृष्टि से देखे लेकिन वेद पुराणों इस बात को गलत बताया गया है। संत महात्मा कहते हैं कि सभी को सम्मान दो लेकिन स्वयं को भिखारी ही बनाकर ही रखो भगवान तो उसी के दिल में बसते हैं जो कि दूसरों को सम्मान तो देता है लेकिन स्वयं सम्मान पाने की इच्छा नहीं रखता।

कथा में बताया गया कि शुकदेव जी महाराज ने महाराज नंदबाबा को महामना की संबा दी है लेकिन यहां पर यह स्पष्ट करना आवष्यक है कि महामना आखिर क्या है। मन का स्वरूप संकल्प विकलप्तामक है वह केवल वही देखते हैं जो हमारी आंखे दिखाती हैं लेकिन जिसके मन में स्वयं ठाकुर जी आ जाएं और मन में परमात्मा समाहित हो जाएं उसे ही महामना कहा गया है। श्रीमदभागवत कथा के स्वरूप पर बोलते संतश्री ने बताया कि यह कथा महासागर है जिसे हजारों जन्म लेने के उपरांत भी पूर्ण स्वरूप में नहीं जाना जा सकता है। परंतु इसको हम जितना भी जानते हैं समझते हैं वह भी हमारे लिए भवसागर से पार कर देती है। कथा में कहा गया संत को भोग अर्पित करने से भगवान भी उसी तरह से ग्रहण कर लेते हैं जैसे कि किसी गर्भवती स्त्री को भोज देने से उसके पेट में पल रहे बच्चे को भी पोषण मिल जाता है इसलिए ही वेदों में कहा गया है कि संत को प्रसन्न करने से ही ठाकुर जी प्रसन्न होते हैं और अगर संत भगवान में हम कोई अंतर करते हैं तो इससे प्रभु भी नाराज हो जाते हैं।

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अंतःकरण में प्रभु भक्ति सच्चा धन…

व्यासपीठ से संतश्री किषोर दास जी महाराज ने कहा कि संसार में मान प्रतिष्ठा, धन दौलत से परिपूर्ण होने पर समूचा जगत प्यारा लगने लगता है और हम स्वयं को परिपूर्ण मानने लगते हैं जबकि ऐसा नहीं है क्योंकि यह सब तो इहलोक का है उस लोक के लिए हमारे पर कोई संपत्ति नहीं होती है। यह सब प्रभु की भक्ति के बिना अधूरा है। जीवन में सबसे बड़ा धनी व्यक्ति तो वह है जिसके अंतःकरण में प्रभु की भक्ति उनका ध्यान विराजमान हो जाता है क्योंकि यह धन कोई लुटेरा लूट नहीं सकता है और अगर लूट भी लिया तो वह भी धनी हो जाएगा और आप स्वयं कंगाल नहीं हो पाएंगे।

ब्ताया गया कि रिष्ते नाते और अपने पराए का बोध भी सही नहीं है क्योंकि अगर भगवान से लगन जोड़ ली तो फिर किसी के प्रेम की आवष्यकता है यहां अगर जगत रूठ जाए तो हम कोई बात नहीं लेकिन अगर हमारा ठाकुर हमसे रूठ गया तो फिर हमारा जीवन व्यर्थ हो जाता है। संबंध में बारे में यहां बताया गया कि जब संबंध नहीं जुड़ता है तब तक कोई नहीं जुड़ता और एक बार किसी न किसी रूप संबंध जुड़ जाता है तो वहीं से वह अपना बन जाता है ऐसा ही संबंध में अगर प्रभु से जुड़ जाता है तो वह हमें अपना बना लेते हैं। कई बार यह सवाल किया जाता है कि किस तरह का संबंध में भगवान से जोड़ा जाए इसमें ठाकुर जी कहते हैं कि मुझसे भाई, बहिन, माता पिता और बहू जिस भी रूप में भक्त मानता है मैं उसके साथ उसी संबंध में जुड़ जाता हूं। कथा श्रवण पर संतश्री ने कहा कि कथा को सुनने के दौरान एकाग्रता होने की जरूरत होती है ऐसा नहीं कि कथास्थल पर खानापूर्ति के लिए पहुंच गए और वहां बैठकर इधर उधर की बातों में उलझे रहें। कथा का रसपान करने के बाद उसे अपने जीवन में उतारना ही श्रवण की सार्थकता है। उन्होंने जै जै सरकार को ब्रम्ह स्वरूप बताते हुए कहा कि सरकार जैसे संत का सानिध्य जिसे प्राप्त हो जाता है उसका उद्धार हो जाता है।

चित्र विचित्र ने विखेरा जलवा

धार्मिक अनुष्ठान के दौरान होने वाली मंचीय कार्यक्रम की श्रृंखला में श्रीधाम वृन्द्रावन से आने वाले चित्र विचित्र महाराज के द्वारा गुरूवार की रात अपनी आवाज का जलवा बिखेरा जिसे सुनकर समूचे में मौजूद हजारों की भीड़ राधामय हो गया। पूजन अर्चन करने पश्चात प्रारंभ होने वाले इस कार्यक्रम में सबसे पहले स्वास्थ्य खराब होने के कारण यहां तक न पहंुचने वाले विख्यात रसिक पागल बाबा के द्वारा मोबाइल के माध्यम से अपनी आवाज को सुनाया पष्चात चित्र विचित्र के द्वारा अपने भजनों को प्रस्तुत किया गया जिसमें इनका प्रसिद्ध मेरी विनती यही है राधारानी कृपा बरसाए रखना ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया इसी के साथ पांच छः अन्य भजनों का भी यहां श्रवण कराया गया। इस दौरान राधे राधे के संकीर्तन ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। प्रस्तुति के दौरान कथावाचक स्वामी श्रवणानंद जी महाराज एवं गौरीकुंज वाले किषोर दास जी महाराज भी मंच पर मौजूद रहे हैं।

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