एससी एसटी एक्ट में बदलाव के विरोध मे एससी एसटी बीसी कौंसिल ने राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन

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बैतूल/सारनी। कैलाश पाटिल

पाथाखेड़ा- आल इंडिया एससी एसटी बैकवर्ड क्लासेस एंप्लॉईज को-आर्डिनेशन कौंसिल ने महामहिम राष्ट्रपति के नाम पुलिस चौकी पाथाखेड़ा में ज्ञापन सौंपा। कौंसिल के क्षेत्रीय अध्यक्ष दौलत निरापुरे ने बताया कि अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 सविधान के संगत होकर संसद द्वारा एससी एसटी वर्गो की सुरक्षा और उनके साथ होने वाले जातीय अत्याचार पर न्याय देने के लिए बनाया गया अधिनियम है।

जिसमें यह स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि उसके विरूद्ध की गई व्याख्या संवैधानिक न होकर विधि विरुद्ध होगी। सुप्रीम कोर्ट के दो सदस्य न्यायपीठ द्वारा एससी एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए उक्त अधिनियम में बदलाव किया है। इस घटना की एफआईआर के बाद और आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक। आरोपी शासकीय कर्मचारी होने के कारण गिरफ्तारी के लिए नियोक्ता की अनुमति और अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाना। न्यायालय द्वारा अधिनियम के प्रमुख प्रावधान में बदलाव के लिए दिए गए आदेश असंवैधानिक तथा अधिकार क्षेत्र से बाहर है। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता 1973 में अजमानतीय अपराध के आरोपी को पुलिस धारा 41 में बिना वारंट के धारा 42 में नाम और निवास को छिपाने तथा धारा 43 में प्राइवेट व्यक्ति को भी अपराध के आरोपी को गिरफ्तार करने के अधिकार दिए।

किंतु दांडिक अधिनियम में आरोपी को गिरफ्तार करने से पहले नियोक्ता की अनुमति आवश्यक नहीं होती केवल सशस्त्र सेना के अधिकारियों को छोड़कर। एससी एसटी एक्ट की धारा 18 के तहत अग्रिम जमानत को प्रतिबंधित किया गया जो न्यायालय को उक्त अधिनियम के संबंध में अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाने वाला आदेश विधि विरुद्ध है।

भारतीय सविधान में शक्ति पृथककरण के सिद्धांत के आधार पर संसद को कानून बनाने और उसने संसोधन करने तथा समाप्त करने का अधिकार दिया गया है। वही न्यायपालिका को संसद द्वारा बनाए गए कानून को लागू कराने व सविधान के विरुद्ध बनाए गए कानून को शून्य घोषित करने का अधिकार दिया गया है। माननीय न्यायालय द्वारा अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर न्यायायिक समीक्षा के माध्यम से एसी एसटी एक्ट में बदलाव संबंधी जो नियम पारित किया गया है वह निरस्त किए जाने योग्य है।

भारतीय सामाजिक व्यवस्था में यह व्यवहारिक तथा शासकीय आकडों से यह सत्य है कि अनुसूचित जाति जनजाति वर्गों के साथ देश में प्रति वर्ष लाखों घटनाएं जैसे मध्यप्रदेश में बैरसिया के पास महासबुंद में सर्व समाज के साथ खाना खाने से रोकना, सतना में कुल्हाड़ी से काट कर फेंकना,गुना एवं भिंड में शव को नहीं जलाने दैना, भंडारा में बरती जलाना, रतलाम में दूल्हे को घोड़े पर बैठकर बारात नहीं निकालने देना, जनप्रतिनिधियों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकाना, उनाकांड, सहारनपुर, भीमा कोरेगांव, खैरलाजी हत्याकांड के अलावा इलाहाबाद में अंबेडकर की प्रतिमा को दो बार खंडित किया जाना। इन तमाम गंभीर अमानवीय तथा वीभत्स घटनाएं होती रही। यदि कहीं किसी केस विशेष में एससी एसटी एक्ट का दुरुपयोग हुआ है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही की जानी चाहिए। दुरुपयोग तो भारतीय दंड संहिता या अन्य किसी भी कानून का होने की संभावना से इंकार नहीं या जा सकता है। यह सारे आरोपी 302,307,376 या अन्य कानून जैसे देशद्रोह, टाडा, भ्रष्टाचार, आतंकवादी घटनाओं से संबंधित दोषमुक्त हो जाते हैं फिर भी इन कानूनों में आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक, नियोक्ता की अनुमति संबंधी आदेश पारित नहीं किए गए। किंतु एससी एसटी एक्ट जनजाति वर्ग में असुरक्षा,भय और अत्याचार की घटनाओं को बढ़ावा दिया जायेगा।
ऑल इंडिया एससी एसटी बैकवर्ड क्लासेस एंप्लॉईज को आर्डिनेशन कौंसील महामहिम राष्ट्रपति महोदय से अनुरोध करती है कि देश में सामाजिक ताना-बाना बनाये रखने के साथ एससी एसटी वर्ग को सुरक्षा प्रदान करने, अत्याचार होने पर न्याय दिलाने हेतु एससी एसटी एक्ट को पुन: मूल रूप में लाना अति आवश्यक है जिसके लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ के समक्ष भारत सरकार द्वारा पुनरीक्षण याचिका दायर की जाए। विज्ञापन देने वालों में प्रदीप लागले, संतोष कैथवास, तुलसीदास चंदेल कर, रामदास आठनरे, रामपत कुबड,़े सुनील सरियाम, देवीलाल पवार, पवन तुमडाम, रोहित निरापुरे, धनराज धुर्वे, मुकेश धुर्वे, उमेश चौकीकर, श्रीराम नीरापूरे के अलावा बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

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