
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
SARFAESI अधिनियम 2002 के अंतर्गत ऋणी व्यक्तियों के बचाव एवं अधिकार
#### परिचय
वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण एवं पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (SARFAESI Act) भारत में बैंकिंग क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कानून है। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों को गैर-निष्पादित आस्तियों (Non-Performing Assets – NPA) की वसूली में तेजी लाना है, बिना अदालती हस्तक्षेप के। अधिनियम की धारा 13 के तहत सुरक्षित लेनदार (बैंक) को ऋणी की सुरक्षित संपत्ति पर कब्जा करने, प्रबंधन करने या बेचने का अधिकार है, यदि ऋणी 90 दिनों से अधिक समय से ऋण की किस्तें चुकाने में विफल हो। हालांकि, यह अधिनियम ऋणियों के हितों की रक्षा के लिए भी प्रावधान करता है, ताकि बैंक की मनमानी रोकी जा सके। यह निबंध ऋणियों के उपलब्ध बचावों की विवेचना करता है, साथ ही कानूनी प्रावधानों और न्यायिक सिद्धांतों को समझाता है। ये बचाव प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हैं, जो सुनवाई का अधिकार, निष्पक्षता और मुआवजे की गारंटी देते हैं।
#### ऋणी व्यक्तियों के मूल अधिकार एवं कानूनी प्रावधान
SARFAESI अधिनियम ऋणियों को बैंक की कार्रवाई के खिलाफ कई अधिकार प्रदान करता है, जो प्रक्रियात्मक निष्पक्षता सुनिश्चित करते हैं। अधिनियम की धारा 13(2) के तहत बैंक को ऋण की वसूली के लिए 60 दिनों की मांग नोटिस जारी करनी होती है, जिसमें बकाया राशि, ब्याज और अन्य विवरण स्पष्ट रूप से उल्लिखित होते हैं। यह नोटिस ऋणी को अपनी स्थिति सुधारने का अवसर देती है।
– *आपत्ति दर्ज करने का अधिकार (धारा 13(3A))*: नोटिस प्राप्त करने के 15 दिनों के भीतर ऋणी लिखित आपत्ति या प्रतिनिधित्व प्रस्तुत कर सकता है। बैंक को इन पर विचार करना अनिवार्य है और 15 दिनों के भीतर कारण बताते हुए उत्तर देना होता है। यदि बैंक आपत्ति को अस्वीकार करता है, तो ऋणी इसे चुनौती दे सकता है।
– *अन्य सुरक्षा प्रावधान*: अधिनियम कुछ मामलों में लागू नहीं होता, जैसे 1 लाख रुपये से कम के ऋणों पर, या यदि ऋणी ने मूल ऋण राशि का 80% से अधिक भुगतान कर दिया हो। साथ ही, कृषि भूमि पर अधिनियम लागू नहीं होता। ये प्रावधान ऋणियों को प्रारंभिक स्तर पर संरक्षण देते हैं।
ये अधिकार प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से प्रेरित हैं, जो ब्रिटिश कॉमन लॉ से निकले हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) में निहित हैं। न्यायिक रूप से, सुप्रीम कोर्ट ने Mardia Chemicals Ltd. vs. Union of India (2004) मामले में अधिनियम की धारा 17 की वैधता को बरकरार रखा, लेकिन धारा 17(2) के 75% जमा की शर्त को मनमाना बताकर रद्द कर दिया, क्योंकि यह ऋणियों पर अनुचित बोझ डालता था। अदालत ने कहा कि अधिनियम का उद्देश्य आर्थिक विकास है, लेकिन ऋणियों के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।
#### ऋणी व्यक्तियों के लिए उपलब्ध बचाव की विवेचना
यदि बैंक धारा 13(4) के तहत संपत्ति पर कब्जा कर लेता है (जैसे प्रतीकात्मक या भौतिक कब्जा), तो ऋणी विभिन्न कानूनी मार्गों से अपना बचाव कर सकता है। ये बचाव न्यायिक और गैर-न्यायिक दोनों हैं, और इनकी प्रभावशीलता ऋणी की समयबद्धता और सबूतों पर निर्भर करती है।
1. *ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) में अपील (धारा 17): यह ऋणियों का प्राथमिक बचाव है। बैंक की कार्रवाई (जैसे कब्जा या नीलामी) के 45 दिनों के भीतर DRT में आवेदन दाखिल किया जा सकता है। DRT प्रक्रियात्मक उल्लंघनों (जैसे गलत NPA वर्गीकरण, अपर्याप्त नोटिस, या मूल्यांकन त्रुटि) की जांच करता है। यदि बैंक की कार्रवाई गलत पाई जाती है, तो DRT संपत्ति वापस करने, नीलामी रद्द करने या मुआवजा देने का आदेश दे सकता है। विवेचना: यह बचाव प्रभावी है क्योंकि DRT विशेषज्ञ न्यायाधिकरण है, लेकिन इसमें देरी हो सकती है। *Indian Overseas Bank vs. M/s. Ashok Saw Mill (2009) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि DRT गलत कब्जे पर मुआवजा दे सकता है, जो ऋणियों के हित में है।
2. *ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) में अपील (धारा 18): DRT के आदेश से असंतुष्ट होने पर 30 दिनों के भीतर DRAT में अपील की जा सकती है। अपील के लिए बकाया राशि का 50% जमा करना पड़ता है, जो न्यूनतम 25% तक घटाया जा सकता है। विवेचना: यह उच्च स्तर का बचाव है, लेकिन जमा की शर्त छोटे ऋणियों के लिए बाधा बन सकती है। न्यायिक सिद्धांत के रूप में, यह उचित सुनवाई का अधिकार सुनिश्चित करता है, जैसा कि *Bank of Baroda vs. M/s. Karwa Trading Company मामले में सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि पूर्ण भुगतान तक बैंक संपत्ति बेच सकता है, लेकिन ऋणी की अपील का अधिकार अक्षुण्ण रहता है।
3. *उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका: संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन (जैसे अनुच्छेद 21 का जीवन और संपत्ति का अधिकार) पर अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) या 32 (सुप्रीम कोर्ट) के तहत रिट दाखिल की जा सकती है। हालांकि, अदालतें वैकल्पिक उपचार (DRT/DRAT) उपलब्ध होने पर हस्तक्षेप से बचती हैं। विवेचना: यह अंतिम बचाव है, विशेष रूप से यदि प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि हो। *D. Ravichandran vs. Indian Overseas Bank मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 13(2) नोटिस को समय से पहले चुनौती नहीं दी जा सकती, लेकिन यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई तो उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। Sravan Dall Mill P. Ltd. vs. Central Bank of India में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने आपत्तियों पर विचार करने का निर्देश दिया।
4. *स्टे ऑर्डर और मुआवजा*: DRT या DRAT से कार्रवाई पर अस्थायी रोक (स्टे) मांगी जा सकती है, यदि पर्याप्त भुगतान किया गया हो, वित्तीय कठिनाई हो, या प्रक्रियात्मक उल्लंघन हो। धारा 19 के तहत गलत कार्रवाई पर मुआवजा मिल सकता है। विवेचना: स्टे प्रभावी है, लेकिन यह अस्थायी होता है और केस की जटिलता पर निर्भर करता है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को मजबूत करता है, जहां ऋणी को अपूरणीय क्षति से बचाया जाता है।
5. *गैर-न्यायिक बचाव*: एकमुश्त समझौता (One-Time Settlement – OTS) या ऋण पुनर्गठन के माध्यम से बैंक से बातचीत। विवेचना: यह व्यावहारिक है, क्योंकि कई बैंक OTS स्वीकार करते हैं, लेकिन कानूनी बचाव से पहले इसका उपयोग करना चाहिए।
इन बचावों की विवेचना से स्पष्ट है कि वे ऋणियों को संतुलित संरक्षण देते हैं, लेकिन सफलता के लिए समयबद्धता और कानूनी सहायता आवश्यक है। छोटे ऋणी अक्सर जागरूकता की कमी से प्रभावित होते हैं, जबकि बड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप से देरी होती है।
#### निष्कर्ष
SARFAESI अधिनियम 2002 बैंकिंग प्रणाली को सशक्त बनाता है, लेकिन ऋणियों के हितों की रक्षा के लिए मजबूत कानूनी ढांचा प्रदान करता है। उपलब्ध बचाव जैसे DRT अपील, आपत्ति अधिकार और मुआवजा प्राकृतिक न्याय, निष्पक्ष सुनवाई और संवैधानिक समानता के सिद्धांतों पर आधारित हैं। न्यायिक निर्णयों जैसे Mardia Chemicals ने अधिनियम को अधिक मानवीय बनाया है। ऋणियों को सलाह है कि वे नोटिस प्राप्त होते ही कानूनी सलाह लें और सक्रिय रहें, ताकि अनावश्यक संपत्ति हानि से बचा जा सके। अंततः, यह अधिनियम आर्थिक न्याय का संतुलन बनाए रखता है।




