
* एडवोकेट [Bharat Sen Advocate, Civil Court BETUL ]
व्यापारिक लेन-देन, आपसी व्यवहार या जमीन-जायदाद के सौदों में चेक का उपयोग आम बात है। लेकिन जब यही चेक बाउंस (Dishonour) हो जाता है, तो परक्राम्य विलेख अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने की बाढ़ सी आ जाती है। अक्सर देखा गया है कि विशुद्ध रूप से दीवानी (Civil) प्रकृति के व्यावसायिक विवादों या अनुबंधों के टूटने पर, सामने वाले पक्ष को डराने और त्वरित वसूली के शॉर्टकट के रूप में इसे आपराधिक रंग दे दिया जाता है।
हाल ही में माननीय बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा समीर बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024) के मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि आखिर चेक बाउंस के मामलों में सिविल और क्रिमिनल लायबिलिटी के बीच की पतली लकीर को कैसे पहचाना जाए? साथ ही, वर्ष 2024 से लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 274 निर्दोष आरोपियों को मुकदमे के शुरुआती दौर में ही ‘डिस्चार्ज’ (उन्मोचित) होने का एक मजबूत हथियार देती है। आइए समझते हैं इस पूरे कानूनी गणित को।
## सिविल और क्रिमिनल मामले में अंतर कैसे करें?
सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, किसी चेक बाउंस मामले को आपराधिक मानने के बजाय सिविल मानने के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं:
1. शुरुआती आपराधिक नीयत (Mens Rea) का अभाव: आपराधिक कानून का मूल सिद्धांत है ‘मेन्स रिया’ यानी बुरी नीयत। यदि दो पक्षों के बीच एक वैध व्यापारिक सौदा हुआ, लेकिन बाद में परिस्थितियों या व्यापारिक घाटे के कारण अनुबंध का पालन (Breach of Contract) नहीं हो सका, तो यह एक सिविल डिफ़ॉल्ट है। इसे तब तक धोखाधड़ी या अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी की नीयत सौदे के पहले दिन से ही ठगने की थी।
2. शून्य अनुबंध (Void Agreements): यदि चेक किसी ऐसे सौदे के एवज में दिया गया है जो कानूनन अमान्य है—जैसे किसी ऐसी जमीन का सौदा करना जिसका वास्तविक मालिक कोई तीसरा व्यक्ति हो—तो ऐसा अनुबंध कानून की नजर में शून्य (Void ab initio) होता है। गैर-कानूनी या शून्य समझौते से कभी भी कोई “वैध कानूनी देनदारी” (Legally Enforceable Debt) पैदा नहीं होती। धारा 138 के तहत केस चलाने की पहली शर्त ही यह है कि चेक किसी वैध कानूनी देनदारी को चुकाने के लिए दिया गया हो।
3. तारीखों और शर्तों की अनिश्चितता: यदि परिवादी अपने परिवाद पत्र में मूल ब्याना चिट्ठी या अनुबंध की तारीख छुपाता है, या रजिस्ट्री व भुगतान की कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं करता, तो मामला संदिग्ध हो जाता है। शर्तों का यह अभाव दर्शाता है कि मामला आपराधिक नहीं, बल्कि एक उलझा हुआ सिविल विवाद है।
4. पुलिस थाने का दबाव: यदि परिवादी सिविल कोर्ट जाने के बजाय पुलिस थाने के जरिए दबाव बनाकर, जांच के दौरान डरा-धमकाकर चेक हासिल करता है, तो कानून इसे स्वतंत्र सहमति (Free Consent) नहीं मानता। थानों में बैठकर व्यावसायिक वसूली कराना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Abuse of Process of Law) है।
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## धारा 274 BNSS: आरोप तय होने से पहले ‘डिस्चार्ज’ का अधिकार
नए आपराधिक कानूनों के तहत, मजिस्ट्रेट अदालतों में परिवाद पर दर्ज मामलों में आरोप के स्तर पर आरोपी को बरी (उन्मोचित) करने का प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 274 में दिया गया है (जो पुरानी व्यवस्था में CrPC की धारा 245 के समकक्ष था)।
यदि किसी निर्दोष व्यक्ति को सिविल मामले में जबरन घसीटा गया है, तो वह इस धारा के तहत निम्नलिखित तरीकों से प्रयास कर सकता है:
* प्रारंभिक स्तर पर ही लिखित तर्क (Written Arguments) प्रस्तुत करना: जब आरोपी अदालत में हाजिर होता है, तो ‘आरोप तय करने’ (Framing of Charge) की स्टेज पर ही उसके वकील को धारा 274 BNSS के तहत एक विस्तृत आवेदन सह लिखित तर्क प्रस्तुत करना चाहिए।
* दस्तावेजी साक्ष्यों पर प्रहार: यदि आपके पास यह साबित करने के लिए दस्तावेज हैं कि—विवादित संपत्ति का असली मालिक कोई और है (राजस्व रिकॉर्ड/खसरा), या आपने बैंक को पहले ही ‘Stop Payment’ का नोटिस दे रखा था कि चेक दबाव में लिया गया था, अथवा परिवादी की खुद की वित्तीय क्षमता (ITR) इतनी राशि देने की नहीं थी—तो इन दस्तावेजों को इस स्तर पर ही कोर्ट के सामने मजबूती से रखना चाहिए।
* ‘No Case’ की स्थिति सिद्ध करना: धारा 274 BNSS स्पष्ट कहती है कि यदि परिवादी द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर आरोपी के खिलाफ कोई प्रथम दृष्टया (Prima Facie) अपराध नहीं बनता है, तो मजिस्ट्रेट को आरोपी पर मुकदमा चलाने के बजाय उसे वहीं डिस्चार्ज कर देना चाहिए।
## निष्कर्ष
कानून का उद्देश्य किसी भी निर्दोष को प्रताड़ित करना नहीं है। यदि आपके खिलाफ दर्ज चेक बाउंस का मामला वास्तव में एक सिविल लेनदेन या पुलिसिया दबाव का नतीजा है, जिसमें मूल अनुबंध की तारीखें गायब हैं और संपत्ति किसी और की है, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। सजग नागरिक और कुशल कानूनी पैरवी के माध्यम से BNSS की धारा 274 के तहत सही समय पर उठाया गया कदम, आपको सालों चलने वाले मुकदमे की प्रताड़ना से बचाकर शुरुआती स्तर पर ही सम्मानपूर्वक बरी करा सकता है।



