
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय: डेविन्दर कुमार बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया*
*बैंक को ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ (यथाविधि धारक) न मानने के आधार*
भारत सेन, अधिवक्ता
चैम्बर नं. 24, सिविल कोर्ट, बैतूल (म.प्र.) 9827306273
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नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स अधिनियम, 1881 (संक्षेप में एन.आई. अधिनियम) की धारा 138 के अंतर्गत चेक बाउंस के मामलों में शिकायतकर्ता का ‘पेयी’ या ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ होना अनिवार्य शर्त है। हाल ही में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने डेविन्दर कुमार बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया 2023:PHHC:153262 : (2024) 2 RCR(Criminal) 256PUNJAB AND HARYANA HIGH COURTSINGLE BENCH के मामले में इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर स्पष्ट निर्णय दिया कि बैंक को उक्त मामले में ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ क्यों नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने बैंक द्वारा दायर शिकायत तथा समन आदेश को रद्द (क्वैश) कर दिया।
### मामले के मुख्य तथ्य एवं विधिक प्रश्न
आरोपी द्वारा जारी चेक किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर था। बैंक ने उक्त चेक को अपने पास रखकर धारा 138 के अंतर्गत शिकायत प्रस्तुत की। बैंक का तर्क था कि आरोपी ने बैंक से ऋण लिया था तथा कर्ज चुकाने के लिए समझौता-पत्र (settlement letter) भी निष्पादित किया था, अतः बैंक ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ की हैसियत रखता है। न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए निम्न तीन मुख्य आधारों पर बैंक को ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ नहीं माना—
### 1. चेक पर बैंक का नाम न होना (Neither Payee nor Endorsee)
धारा 138 एवं 142 एन.आई. अधिनियम के अनुसार चेक बाउंस की शिकायत केवल वही व्यक्ति या संस्था कर सकती है जो—
* चेक का पेयी (Payee) हो, अथवा
* जिसे चेक कानूनी रूप से एंडोर्स (Endorse) किया गया हो।
इस मामले में चेक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नाम पर जारी नहीं किया गया था। चेक के पीछे या कहीं भी ऐसा कोई लिखित निर्देश या एंडोर्समेंट उपलब्ध नहीं था जिससे चेक बैंक के नाम ट्रांसफर होता। मात्र कब्जा होने से बैंक पेयी या एंडोसी की श्रेणी में नहीं आता।
### 2. मात्र कब्जा पर्याप्त नहीं (Mere Possession is not enough)
धारा 9 एन.आई. अधिनियम ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ को परिभाषित करती है। जब चेक ‘ऑर्डर’ पर देय हो (payable to order), तो मात्र चेक का कब्जा होना पर्याप्त नहीं है। होल्डर इन ड्यू कोर्स बनने के लिए आवश्यक है कि—
* व्यक्ति विचारण (consideration) के लिए चेक का धारक बने, तथा
* वह पेयी या एंडोसी हो।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक चेक पर नाम अंकित न हो या वैध एंडोर्समेंट न हो, तब तक मात्र कब्जे से कानूनी मालिकाना हक उत्पन्न नहीं होता।
### 3. कर्ज चुकाने का समझौता-पत्र एंडोर्समेंट नहीं माना जा सकता
आरोपी द्वारा बैंक के साथ निष्पादित कर्ज चुकाने का समझौता-पत्र (letter agreeing to liquidate the debt) चेक का एंडोर्समेंट नहीं माना जा सकता। एंडोर्समेंट चेक पर ही लिखित रूप में होना चाहिए। समझौता-पत्र अलग अनुबंध हो सकता है, किन्तु वह धारा 138 की शिकायत चलाने के लिए आवश्यक ‘एंडोर्समेंट’ की पूर्ति नहीं करता।
### निष्कर्ष एवं विधिक महत्व
उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया न तो उक्त चेक का पेयी था और न ही एंडोसी। अतः बैंक को ‘होल्डर इन ड्यू कोर्स’ की हैसियत प्राप्त नहीं हुई। इसी तकनीकी एवं कानूनी कमी के आधार पर उच्च न्यायालय ने बैंक की शिकायत तथा समन आदेश को रद्द कर दिया।
यह निर्णय धारा 138 एन.आई. अधिनियम के मामलों में शिकायतकर्ता की ‘लोकल स्टैंडिंग’ (locus standi) की अनिवार्यता को पुनः रेखांकित करता है। बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं को चेक बाउंस की शिकायत दायर करने से पूर्व सुनिश्चित करना चाहिए कि चेक उनके नाम पर हो अथवा वैध एंडोर्समेंट द्वारा उन्हें ट्रांसफर किया गया हो। मात्र ऋण संबंध या समझौता-पत्र पर्याप्त नहीं है।
यह निर्णय वकीलों, बैंक अधिकारियों तथा न्यायिक अधिकारियों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा तथा अनावश्यक मुकदमों से बचाव में सहायक सिद्ध होगा।
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*भारत सेन*
अधिवक्ता
चैम्बर नं. 24, सिविल कोर्ट, बैतूल (म.प्र.) 9827306273





