
लेखक: भारत सेन, अधिवक्ता, जिला न्यायालय बैतूल
समाचार पत्र के लिए विशेष आलेख
धार लगाता ‘धारणाधिकार’ कानून, बैतूल में प्रशासनिक जंग लगाती लालफीताशाही!
विधिक प्रावधानों के बावजूद फाइलों में दफन गरीबों के आशियाने का हक; कब जागेगा जिला प्रशासन?
बैतूल। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नगरीय क्षेत्रों में शासकीय व नजूल भूमि पर वर्षों से काबिज नागरिकों को भूमिस्वामी अधिकार प्रदान करने के लिए लागू की गई मुख्यमंत्री नगरीय भू-अधिकार योजना (धारणाधिकार कानून) आज जिला प्रशासन की प्रशासनिक शिथिलता का शिकार हो चुकी है। सरकार की मंशा भले ही नागरिकों को उनके आशियाने का वैध अधिकार पत्र सौंपकर भयमुक्त करने की रही हो, लेकिन बैतूल जिले की जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। एक विधि विशेषज्ञ के रूप में यह देखना अत्यंत चिंताजनक है कि सुस्पष्ट कानूनी धाराओं और विधायी प्रावधानों के होने के बावजूद, बैतूल जिला प्रशासन के राजस्व विभागों में सैकड़ों आवेदन पत्र दीर्घ अवधि से लंबित पड़े हैं, जिससे पात्र हितग्राहियों को आज भी अपने कानूनी हक के लिए भटकना पड़ रहा है।
## ⚖️ क्या हैं इस योजना से जुड़े प्रमुख कानूनी और विधायी प्रावधान?
धारणाधिकार योजना कोई प्रशासनिक आदेश मात्र नहीं है, बल्कि यह मध्य प्रदेश के स्थापित राजस्व कानूनों के अंतर्गत संचालित एक वैधानिक प्रक्रिया है। इसके प्रमुख कानूनी पहलू इस प्रकार हैं:
1. मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता (MPLRC), 1959 की धारा 162: इस संहिता के तहत राज्य सरकार को शासकीय और नजूल भूमि के प्रबंधन, आवंटन और उसे पट्टे (Lease) पर देने का विवेकाधिकार प्राप्त है। धारणाधिकार कानून इसी वैधानिक शक्ति का उपयोग करते हुए नागरिकों को 30 वर्षीय स्थायी पट्टा (पट्टाधृति अधिकार) प्रदान करता है, जिसे बाद में नवीनीकृत भी किया जा सकता है।
2. भूमिस्वामी अधिकारों का हस्तांतरण (धारा 158): इस कानून के अंतर्गत निर्धारित प्रीमियम और भू-भाटक (Land Revenue) जमा करने के बाद, काबिज व्यक्ति को उस भूखंड पर कानूनी रूप से ‘भूमिस्वामी’ के अधिकार प्राप्त होते हैं। यह अधिकार उन्हें सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम (Transfer of Property Act), 1882 के तहत अपनी संपत्ति का उपयोग करने, उस पर निर्माण करने और कानूनी संरक्षण प्राप्त करने की शक्ति देता है।
3. मध्य प्रदेश लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी अधिनियम, 2010: यह सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। राजस्व विभाग की सेवाएं इस अधिनियम के दायरे में आती हैं। नियमानुसार, धारणाधिकार के आवेदनों का निराकरण (पटवारी जांच, सीमांकन, और दावों-आपत्तियों का आमंत्रण) एक निश्चित समय-सीमा (Time-limit) के भीतर होना अनिवार्य है। बैतूल में आवेदनों का दीर्घ अवधि तक लंबित रहना सीधे तौर पर इस अधिनियम की भावना का उल्लंघन है।
## 🏠 क्या आबादी भूमि पर भी पट्टा जारी करने का अधिकार है?
कानूनी दृष्टिकोण से यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि इस योजना के तहत सरकार को नगरीय सीमा में शामिल हुई ‘आबादी भूमि’ पर भी धारणाधिकार या पट्टा जारी करने का पूर्ण विधिक अधिकार है [RCMS MP, CM Helpline]। बैतूल जिले के कई ऐसे वार्ड और सीमावर्ती क्षेत्र हैं जो पहले ग्रामीण आबादी का हिस्सा थे, लेकिन नगरीय निकाय के विस्तार (Master Plan या सीमा वृद्धि) के कारण अब शहर में शामिल हो चुके हैं।
राजस्व नियमों के अनुसार, यदि ऐसे विस्तारित नगरीय आबादी क्षेत्रों के रहवासियों के पास रजिस्ट्री या लीज डीड जैसे पक्के दस्तावेज़ नहीं भी हैं, तो भी 31 दिसंबर 2020 से पहले का निर्विवाद कब्ज़ा होने पर सरकार उन्हें भूमिस्वामी अधिकार पत्र जारी कर सकती है [RCMS MP]。 नागरिकों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि शहरी सीमा के भीतर आने वाली ऐसी आबादी भूमि पर धारणाधिकार पत्र पाना उनका वैधानिक अधिकार है और प्रशासन इससे इनकार नहीं कर सकता।
## 🔍 बैतूल जिले की वर्तमान स्थिति: कानूनी अधिकारों का हनन
बैतूल जिले की विभिन्न तहसीलों और नगरीय निकायों (बैतूल, मुलताई, आमला, भैंसदेही, आठनेर आदि) से हजारों पात्र नागरिकों ने मध्य प्रदेश सरकार के [RCMS पोर्टल] के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन किए थे। राजस्व अधिकारियों के पास मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत अतिक्रमण हटाने की शक्तियां तो हैं, लेकिन जब बात धारा 162 के तहत गरीबों को वैध अधिकार देने की आती है, तो प्रक्रिया कछुआ गति से भी धीमी हो जाती है।
प्रशासनिक स्तर पर प्रारंभिक जांच (मौका मुआयना) और पट्टे जारी करने की अंतिम प्रक्रिया को महीनों और सालों तक लटका कर रखा गया है। इसके कारण आवेदकों को धारणा अधिकार पत्र प्रदान नहीं किया गया है, जो कि उनके विधिक और नागरिक अधिकारों का स्पष्ट हनन है।
## 🛑 विधिक अधिकार न मिलने से आम जनता को क्षति
* वित्तीय अधिकारों से वंचना: जब तक नागरिक को वैध पट्टा या भूमिस्वामी अधिकार पत्र नहीं मिलता, तब तक वह बैंकिंग विनियमन अधिनियम के तहत किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक से गृह ऋण (Home Loan) या व्यावसायिक ऋण प्राप्त नहीं कर सकता। पट्टे के अभाव में वे अपने कच्चे मकानों को पक्का करने में असमर्थ हैं।
* कल्याणकारी योजनाओं का कानूनी संकट: [प्रधानमंत्री आवास योजना] का लाभ लेने के लिए भू-स्वामित्व या वैध पट्टा होना एक अनिवार्य कानूनी शर्त है। प्रशासन की देरी के कारण सैकड़ों गरीब इस महत्वकांक्षी योजना के लाभ से भी वंचित हो रहे हैं।
* असुरक्षा की भावना: कानूनी दस्तावेज हाथ में न होने के कारण इन परिवारों के सिर पर हमेशा प्रशासनिक कार्रवाई या बेदखली की तलवार लटकी रहती है, जो उनके गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करती है।




