
* भारत सेन, अधिवक्ता
सिविल कोर्ट, बैतुल (मध्य प्रदेश)
अक्सर देखा जाता है कि व्यापारिक लेन-देन या निजी कारणों से जब कोई चेक बाउंस (Check Bounce) होता है, तो शिकायतकर्ता तुरंत नजदीकी कोर्ट में मामला दर्ज करा देता है। कई मामलों में आरोपी व्यक्ति उस शहर या राज्य का निवासी नहीं होता जहाँ मामला दर्ज किया गया है। ऐसी स्थिति में कानून आम नागरिकों को क्या सुरक्षा देता है? क्या कोर्ट बिना पूरी जांच किए किसी बाहरी व्यक्ति को सीधे समन (बुलावा पत्र) भेजकर अदालत में तलब कर सकता है?
हाल ही में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने मुन्नू गिरी बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। यह फैसला मध्य प्रदेश सहित पूरे देश के उन आम नागरिकों के लिए जानना बेहद जरूरी है, जो अनजाने में कानूनी प्रक्रियाओं के फेर में फंस जाते हैं।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता मुन्नू गिरी के खिलाफ चेक बाउंस (Negotiable Instruments Act की धारा 138) की शिकायत दर्ज की गई थी। निचली अदालत (Trial Court) ने शिकायतकर्ता के हलफनामे को देखा और आरोपी को सीधे कोर्ट में हाजिर होने का समन जारी कर दिया।
चूंकि आरोपी उस कोर्ट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (Territorial Jurisdiction) से बाहर रहता था, इसलिए उसने इस समन को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसका तर्क था कि कोर्ट ने समन जारी करने से पहले उस अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया, जो कानूनन जरूरी थी।
कानून क्या कहता है? (धारा 202 CrPC का नियम)
हमारे देश के कानून (दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 202) में साफ लिखा है कि यदि कोई आरोपी उस अदालत के अधिकार क्षेत्र की सीमा से बाहर रहता है, तो मजिस्ट्रेट सीधे समन जारी नहीं कर सकता। समन जारी करने से पहले जज साहब के लिए यह अनिवार्य (Mandatory) है कि वे मामले की खुद जांच करें या पुलिस को जांच का आदेश दें।
इस नियम का मुख्य उद्देश्य यह है कि दूर-दराज रहने वाले किसी भी निर्दोष नागरिक को झूठे या आधारहीन मुकदमों में फंसाकर परेशान न किया जा सके। कोर्ट को पहले यह पक्का करना होगा कि आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई ठोस आधार है भी या नहीं।
उच्च न्यायालय ने क्या फैसला सुनाया?
माननीय उच्च न्यायालय ने माना कि निचली अदालत ने बाहरी क्षेत्र के आरोपी को समन जारी करने से पहले धारा 202 के तहत कोई अनिवार्य जांच नहीं की थी। इसलिए कोर्ट ने निचली अदालत के उस समन आदेश को पूरी तरह से अवैध मानते हुए रद्द (Set Aside) कर दिया।
इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने मामले को वापस निचली अदालत में भेजते हुए यह निर्देश दिया कि वे कानून के अनुसार पहले 6 सप्ताह के भीतर अनिवार्य जांच पूरी करें और उसके बाद ही मामले को आगे बढ़ाएं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि चेक बाउंस के मामलों का निपटारा बिना किसी फालतू तारीख (Adjournment) के तेजी से होना चाहिए।
आम जनता के लिए इस फैसले के मायने
एक अधिवक्ता के रूप में, मैं सिविल कोर्ट बैतुल (म.प्र.) के माध्यम से आम नागरिकों को यह सलाह देना चाहता हूँ कि कानून आपकी सुरक्षा के लिए सजग है। यदि आपके खिलाफ भी किसी ऐसे शहर या जिले की अदालत से सीधे समन आता है जहाँ आप नहीं रहते, तो घबराएं नहीं। अपने वकील के माध्यम से आप यह जांच कर सकते हैं कि क्या कोर्ट ने समन जारी करने से पहले इस अनिवार्य नियम का पालन किया है या नहीं।
कानून का उद्देश्य न्याय प्रदान करना है, लेकिन उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना दिया गया कोई भी आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता। सजग रहें, कानून जानें और अपने अधिकारों की रक्षा करें।



