
लेखक: भारत सेन (अधिवक्ता, सिविल कोर्ट, बैतूल, मध्य प्रदेश) 9827306273
भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी अस्पतालों द्वारा दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स पर भारी मार्जिन लगाने की शिकायत लंबे समय से चली आ रही है। अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर गंभीरता से सुनवाई करते हुए निजी अस्पतालों और केंद्र सरकार दोनों को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने दवा मूल्य निर्धारण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान निजी अस्पतालों के अधिवक्ताओं के तर्क सुने और अस्पतालों की प्रथाओं को “लूट” तथा “डकैती” की संज्ञा दी।
### याचिकाओं की पृष्ठभूमि
मुख्य जनहित याचिका अधिवक्ता किशन चंद जैन ने दायर की थी। इसमें नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर सख्त मूल्य नियंत्रण, जेनेरिक दवाओं को अनिवार्य रूप से लिखने, मेडिकल डिवाइसेज पर वैधानिक मार्जिन कैप और ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) के तहत सुधार की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि अधिकांश दवाएं (लगभग 90 प्रतिशत) DPCO के दायरे से बाहर हैं, जिससे अस्पताल और निर्माता मनमाने मार्जिन लगा रहे हैं। पहले की सुनवाइयों में कोर्ट ने कैंसर की एक दवा का उदाहरण दिया था, जिसका रिटेलर मूल्य करीब 2,700 रुपये था, जबकि MRP 27,000 रुपये तय किया गया था।
### सुनवाई में कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां
27 अक्टूबर 2026 को हुई सुनवाई में पीठ ने एक चौंकाने वाला उदाहरण पेश किया। एक दवा डीलर की पत्नी का कैंसर का इलाज एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में चल रहा था। डीलर ने अस्पताल अधिकारियों को बताया कि वही कीमोथेरेपी इंजेक्शन उसे डीलर मूल्य पर मात्र 11,000 रुपये में उपलब्ध है। अस्पताल ने बाहरी दवा स्वीकार करने से इनकार कर दिया और उसी इंजेक्शन के लिए 1,30,000 रुपये वसूल किए।
कोर्ट ने केंद्र से पूछा—
“क्या आप इस लूट का कोई औचित्य बता सकते हैं? कीमत में इतना अंतर क्यों है? यह पैसा कहां जाता है?”
पीठ ने स्पष्ट कहा कि अस्पताल अपनी सेवाओं का शुल्क ले सकते हैं, लेकिन दवाओं को लागत से 100 या 200 गुना कीमत पर बेचना जायज नहीं है। “अस्पताल अन्य तरीकों से जीवित रह सकते हैं, इस डकैती से नहीं… आप वाणिज्यिक अस्पताल हैं। आप हर चीज का चार्ज लेते हैं। लेकिन दवा को 100-200 गुना क्यों कोट किया जाए?” कोर्ट ने पूछा। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि निर्माताओं द्वारा दिए जाने वाले कॉरपोरेट डिस्काउंट अभी भी अपारदर्शी हैं और पूरा सिस्टम निर्माताओं के पक्ष में काम करता दिखता है।
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने केंद्र की ओर से कहा कि सरकार लगातार मूल्य नीतियों को कैलिब्रेट कर रही है और भारत में दवाओं की कीमतें वैश्विक स्तर पर कम हैं। लेकिन कोर्ट ने जवाब दिया कि 11,000 रुपये से 1,30,000 रुपये का अंतर कोई कैलिब्रेशन नहीं है और मरीजों तथा जीवन की बात करते समय पूंजीवादी सोच नहीं होनी चाहिए। NPPA (नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी) को भी कमजोर और अप्रभावी बताया गया।
### निजी अस्पतालों के अधिवक्ताओं के तर्क
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने निजी अस्पतालों की ओर से दलील दी कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही दबाव में है, इसलिए निजी अस्पताल जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि निजी अस्पतालों की अधिकांश आय बीमा और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत) से आती है, जबकि जेब से भुगतान करने वाले मरीज करीब 30 प्रतिशत हैं। अस्पतालों को ऑपरेटिंग थिएटर, कैथ लैब, MRI मशीनें और चौबीसों घंटे स्टाफ बनाए रखने का खर्च उठाना पड़ता है। बाहरी दवाओं पर नकली दवाओं का खतरा भी है, इसलिए अस्पताल अपनी फार्मेसी से ही दवा खरीदने पर जोर देते हैं।
कोर्ट ने इन तर्कों को पर्याप्त नहीं माना। पीठ ने कहा कि अस्पताल अन्य स्रोतों से अपनी लागत पूरी कर सकते हैं, लेकिन मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर दवाओं पर अत्यधिक मार्जिन लगाना स्वीकार्य नहीं है। जब सरकारी योजनाओं के तहत इलाज होता है, तो अंततः करदाता ही इन बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उठाते हैं।
### व्यापक संदर्भ और प्रभाव
यह मुद्दा सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं है। कई वर्षों से निजी अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसियों से ऊंची कीमत पर दवा और कंज्यूमेबल्स खरीदने की मजबूरी की शिकायतें आती रही हैं। कुछ पुरानी याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को नीति बनाने का निर्देश दिया था, क्योंकि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है।
हाल की सुनवाई में कोर्ट ने DPCO की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाए और संसदीय समितियों की रिपोर्टों का जिक्र किया, जिनके नतीजे आम लोगों के हित में नहीं रहे।
कोर्ट ने याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इस सुनवाई से साफ संकेत मिलता है कि शीर्ष अदालत स्वास्थ्य सेवाओं के व्यावसायीकरण और मरीजों के शोषण पर नजर रखे हुए है। अगर कोर्ट सख्त निर्देश जारी करता है, तो नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं पर मार्जिन कैप, जेनेरिक दवाओं को बढ़ावा और पारदर्शी मूल्य निर्धारण की दिशा में बड़ा बदलाव आ सकता है।
निजी अस्पताल स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन मरीजों की जान की कीमत पर मुनाफाखोरी को न्यायपालिका बर्दाश्त करने को तैयार नहीं दिखती। यह मामला न सिर्फ दवा मूल्य नियंत्रण, बल्कि पूरे स्वास्थ्य क्षेत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग को फिर से मजबूत करता है। आम नागरिकों को उम्मीद है कि इस सुनवाई के नतीजे उन्हें महंगी दवाओं और मनमाने बिलों से राहत दिलाएंगे।



