
चेक बाउंस मामलों में न्याय का नया सवेरा या अंतहीन तारीखों का जाल?
BNSS, 2023 की धारा 274 के तहत ‘डिस्चार्ज’ (Discharge) प्रावधान और जिला अदालतों की व्यावहारिक चुनौतियां
1. प्रस्तावना: औपनिवेशिक मानसिकता से नागरिक-केंद्रित न्याय की ओर
भारत सरकार द्वारा लागू किए गए नए आपराधिक कानूनों—भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)—का मुख्य उद्देश्य दंड देने के बजाय न्याय सुनिश्चित करना और अदालतों में लंबित मुकदमों के बोझ को कम करना है। पुराने कानून (CrPC, 1973) में कई ऐसे दोष थे, जिनकी वजह से निर्दोष आरोपियों को बिना किसी ठोस आधार के लंबे समय तक अदालती चक्कर काटने पड़ते थे। इस दोष को दूर करने का एक उत्कृष्ट और क्रांतिकारी उदाहरण भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 274 का परंतुक (Proviso) है।
2. कानूनी बदलाव: CrPC की धारा 251 बनाम BNSS की धारा 274
पुरानी व्यवस्था (CrPC की धारा 251) के तहत, समन मामलों या चेक बाउंस (Section 138 NI Act) के मुकदमों में मजिस्ट्रेट के पास आरोपी को ‘डिस्चार्ज’ करने की कोई स्पष्ट वैधानिक शक्ति नहीं थी। एक बार यदि आरोपी को समन जारी हो गया, तो उसे अनिवार्य रूप से पूरे मुकदमे (Trial) की अग्निपरीक्षा से गुजरना ही पड़ता था। मजिस्ट्रेट चाहकर भी शुरुआती स्तर पर केस को खारिज नहीं कर सकते थे, भले ही मामला पूरी तरह से झूठा क्यों न हो। इसके लिए आरोपी को धारा 482 CrPC के तहत उच्च न्यायालय (High Court) के चक्कर काटने पड़ते थे।
BNSS की धारा 274 में जोड़ा गया ऐतिहासिक परंतुक (Proviso):
“परंतु यदि मजिस्ट्रेट आरोप को आधारहीन (Groundless) समझता है, तो वह लिखित रूप में कारण दर्ज करने के बाद, अभियुक्त को मुक्त कर देगा और ऐसी मुक्ति का प्रभाव डिस्चार्ज (उन्मोचन) होगा।”
यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि कानून का लक्ष्य यह है कि जिन मामलों का कोई कानूनी आधार नहीं है, उन्हें अदालत का कीमती समय बर्बाद करने और आरोपी को प्रताड़ित करने के लिए आगे नहीं चलाया जाना चाहिए। [1]
3. चेक बाउंस मामलों में ‘डिस्चार्ज’ के वैध और ठोस आधार
चेक बाउंस के मामलों में आरोपी निम्नलिखित आधारों पर धारा 274 BNSS के तहत डिस्चार्ज का आवेदन दे सकता है, बशर्ते वे शिकायतकर्ता के दस्तावेजों या स्थापित विधि से स्वतः सिद्ध होते हों:
* विधिमान्य ऋण या दायित्व का अभाव (No Legally Enforceable Debt): यदि चेक किसी ऐसे लेनदेन के लिए दिया गया था जो कानूनी रूप से मान्य नहीं है, या वो केवल सुरक्षा (Security) के रूप में था और देयता परिपक्व (Crystallize) नहीं हुई थी।
* समय-वर्जित ऋण (Time-Barred Debt): यदि चेक किसी ऐसे कर्ज को चुकाने के लिए दिया गया था जो कानूनन ‘Limitation Act’ के तहत वसूलने की अवधि से बाहर हो चुका था।
* चेक बाउंस होने का तकनीकी कारण: यदि बैंक से चेक वापस आने का कारण धारा 138 एनआई एक्ट की परिधि में नहीं आता है (जैसे कि हस्ताक्षर न मिलना या तकनीकी त्रुटि, जहां कोई धोखाधड़ी या अपर्याप्त फंड का इरादा न हो)।
* परिवाद में वैधानिक दोष (Statutory Defects): कानूनन अनिवार्य नोटिस 30 दिनों के भीतर न भेजा गया हो या नोटिस मिलने के 15 दिनों का वैधानिक समय पूरा होने से पहले ही जल्दबाजी में केस दायर कर दिया गया हो।
* सिविल मामले को आपराधिक रंग देना: मूल रूप से व्यावसायिक या दीवानी (Civil Dispute) विवाद को दबाव बनाने के उद्देश्य से जबरन आपराधिक चेक बाउंस का मामला बनाना।
* परिवादी का वैध धारक न होना (Locus Standi): शिकायतकर्ता “धारक या सम्यक अनुक्रम में धारक” (Holder in due course) न हो।
4. जिला न्यायालय स्तर पर व्यावहारिक गतिरोध: “अंतहीन तारीखों का जाल”
कानून निर्माताओं की मंशा अत्यंत स्पष्ट और जनहितैषी थी, लेकिन जिला न्यायालय (District & Subordinate Courts) के स्तर पर इस नए प्रावधान के क्रियान्वयन में गंभीर व्यावहारिक चुनौतियां देखी जा रही हैं:
* निराकरण से परहेज और न्यायिक हिचकिचाहट: कई जिला अदालतों के मजिस्ट्रेट अभी भी पुरानी CrPC की कार्यप्रणाली के अभ्यस्त हैं। वे समन मामलों में ‘डिस्चार्ज’ के आवेदन पर गुण-दोष (Merits) के आधार पर त्वरित निर्णय लेने से बचते हैं।
* “मामला विचारणीय (Matter of Trial) है” का आसान रास्ता: अदालतों में अक्सर यह रुख अपना लिया जाता है कि “आरोपी द्वारा उठाए गए बिंदु ट्रायल का विषय हैं और इनका फैसला गवाही के बाद होगा”। ऐसा कहकर डिस्चार्ज के आवेदनों को लंबित रख दिया जाता है या खारिज कर दिया जाता है।
* अंतहीन पेशी तारीखें: डिस्चार्ज का आवेदन पेश होने के बाद भी आरोपी को हर तारीख पर अदालत में व्यक्तिगत रूप से या वकील के माध्यम से हाजिर होना पड़ता है। शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा जवाब देने के लिए बार-बार समय मांगा जाता है, जिससे आरोपी उसी अंतहीन कानूनी चक्रव्यूह में फंस जाता है जिससे बचाना इस धारा का मुख्य उद्देश्य था।
* जवाबदेही का डर: मजिस्ट्रेटों में कभी-कभी यह आशंका भी होती है कि यदि उन्होंने शुरुआती स्तर पर ही आरोपी को डिस्चार्ज कर दिया, तो ऊपरी अदालत (सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय) में उनके आदेश को चुनौती दी जाएगी, जिससे न्यायिक समय और बढ़ेगा।
5. न्यायिक दृष्टांत और उच्च न्यायालयों का रुख
इस गतिरोध को तोड़ने के लिए उच्च न्यायालयों ने महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं, जो जिला अदालतों के लिए मार्गदर्शक हैं:
1. डॉ. मनजोत सिंह वड़ैच बनाम राजिंदरपाल सिंह (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय): इस ऐतिहासिक मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 274 BNSS का परंतुक समन मामलों (विशेषकर धारा 138 NI Act) में एक ठोस वैधानिक अधिकार (Statutory Remedy) प्रदान करता है। यदि आरोप आधारहीन हैं, तो मजिस्ट्रेट को केस को प्रारंभिक चरण में ही समाप्त कर देना चाहिए।
2. विजय घई बनाम राज्य (दिल्ली उच्च न्यायालय, 2026): दिल्ली हाई कोर्ट ने भी माना कि 1 जुलाई 2024 से लागू BNSS की धारा 274 के तहत मजिस्ट्रेट को समन मामलों में आरोपी को आरोपमुक्त करने की स्पष्ट विधायी शक्ति प्राप्त है।
3. निचली अदालतों के सफल उदाहरण: दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट (जैसे मोना राठौर बनाम कमलेश गर्ग, 2026) में मजिस्ट्रेटों ने धारा 274 के परंतुक का उपयोग करते हुए उन मामलों में आरोपियों को डिस्चार्ज किया है जहां शिकायतकर्ता के खुद के दस्तावेजों से साबित हो रहा था कि चेक प्रस्तुति की तारीख पर कोई “वैध कानूनी देनदारी” अस्तित्व में नहीं थी।
6. निष्कर्ष एवं आगे की राह
धारा 274 बीएनएसएस, 2023 आपराधिक न्याय प्रणाली को त्वरित और उत्पीड़न-मुक्त बनाने की दिशा में एक मिल का पत्थर है। लेकिन इस कानून की सफलता पूरी तरह से जिला स्तर के न्यायिक अधिकारियों की सक्रियता और ‘न्यायिक साहस’ पर निर्भर करती है।






