
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
सुप्रीम कोर्ट ने **जनरल प्रोविडेंट फंड (जीपीएफ)** में नामांकन (nomination) के महत्व को मजबूत करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि **जीपीएफ खाते में जमा राशि 5,000 रुपये से अधिक होने पर भी वैध नामांकनकर्ता (nominee) को राशि प्राप्त करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (succession certificate), प्रोबेट (probate) या लेटर्स ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (letters of administration) की आवश्यकता नहीं होगी**। ऐसे दस्तावेजों की मांग करने से नामांकन की अवधारणा ही व्यर्थ (otiose) हो जाती है।
यह फैसला **यूनियन ऑफ इंडिया** द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज करते हुए आया है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच जिसमें **जस्टिस मनोज मिश्रा** और **जस्टिस मनमोहन** शामिल थे, ने कलकत्ता हाई कोर्ट के 4 अप्रैल 2025 के फैसले को बरकरार रखा।
### मामले की पृष्ठभूमि
– मामला **परेश चंद्र मंडल** से जुड़ा है, जिन्होंने अपने दिवंगत भाई के जीपीएफ खाते की राशि प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था।
– कैट (Central Administrative Tribunal) ने उनके पक्ष में फैसला दिया और राशि जारी करने का निर्देश दिया।
– केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया और तर्क दिया कि **प्रोविडेंट फंड्स एक्ट, 1925** की धारा 4(1)(c)(i) के अनुसार, यदि राशि 5,000 रुपये से अधिक है, तो नामांकनकर्ता को succession certificate या probate/letters of administration प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
– कलकत्ता हाई कोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज कर दी और कहा कि **जनरल प्रोविडेंट फंड (सेंट्रल सर्विसेज) रूल्स, 1960** के रूल 33(ii) के तहत नामांकनकर्ता को राशि मिलनी चाहिए, चाहे राशि कितनी भी हो।
### सुप्रीम कोर्ट के मुख्य तर्क और निष्कर्ष
– **नामांकन की अवधारणा का उद्देश्य**: नामांकन इसलिए बनाया गया है ताकि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु पर राशि जल्दी और आसानी से नामांकनकर्ता को मिल सके। यदि 5,000 रुपये की पुरानी सीमा के आधार पर succession certificate मांगा जाए, तो यह नामांकन को बेमानी बना देगा।
– **1925 एक्ट और 1960 रूल्स में सामंजस्य**: कोर्ट ने कहा कि 1925 के एक्ट में 5,000 रुपये की सीमा मुद्रास्फीति (inflation) के कारण अब प्रासंगिक नहीं रह गई है। 1960 के रूल्स (जो 35 साल बाद बने) में स्पष्ट है कि नामांकन होने पर राशि नामांकनकर्ता को दी जाएगी, बिना किसी अतिरिक्त दस्तावेज के।
– **नॉन-ऑब्स्टेंट क्लॉज**: प्रोविडेंट फंड्स एक्ट की धारा 5(1) में नॉन-ऑब्स्टेंट क्लॉज है, जिसके तहत फंड के नियमों के अनुसार नामांकनकर्ता को प्राथमिकता मिलती है।
– **सरकार की भूमिका**: कोर्ट ने कहा कि सरकार को निजी पारिवारिक विवादों में फंसना नहीं चाहिए। succession certificate मांगने से सरकार अनावश्यक रूप से मुकदमेबाजी में शामिल हो जाती है, जबकि नामांकन से राशि जल्दी जारी हो सकती है।
– **नामांकनकर्ता की स्थिति**: नामांकनकर्ता केवल ट्रस्टी (trustee) की तरह राशि प्राप्त करता है, लाभकारी मालिक नहीं। यदि कोई अन्य उत्तराधिकारी दावा करता है, तो वह अदालत में जा सकता है, लेकिन नामांकनकर्ता को राशि पहले मिलेगी।
### फैसले का प्रभाव
– लाखों सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए राहत: अब जीपीएफ राशि (चाहे 5 लाख हो या 50 लाख) नामांकनकर्ता को बिना succession certificate के मिल सकेगी, जिससे समय और खर्च दोनों बचेंगे।
– पुरानी 5,000 रुपये की सीमा अब व्यावहारिक रूप से अप्रासंगिक हो गई है।
– यह फैसला नामांकन की प्रक्रिया को मजबूत बनाता है और भविष्य में इसी तरह के अन्य फंड्स/योजनाओं (जैसे बैंक FD, LIC आदि) में भी संदर्भित किया जा सकता है।
यह फैसला **13 जनवरी 2026** को सुनाया गया और कर्मचारी कल्याण तथा सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। केंद्र सरकार की SLP खारिज होने से हाई कोर्ट का फैसला अंतिम रूप से लागू हो गया है।
यदि आपके पास कोई जीपीएफ नामांकन संबंधी मामला है, तो संबंधित विभाग से संपर्क करें और नामांकन को अपडेट रखें।