
ब्यूरो रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने *ट्रांसफरी पेंडेंट लाइट (transferee pendente lite)* के अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोहराया है कि *मुकदमे की लंबित अवस्था (pendency of litigation) के दौरान संपत्ति खरीदने वाला व्यक्ति डिक्री के निष्पादन (execution of decree) में बाधा नहीं डाल सकता* और वह मुकदमे के परिणाम से पूरी तरह बंधा होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी ट्रांसफर (transfer) डिक्री के अधीन रहती है और डिक्री धारक के अधिकारों के अधीन होती है।
यह फैसला *13 जनवरी 2026* को जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भूयान की बेंच द्वारा सुनाया गया। कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपीलकर्ताओं की अपील खारिज कर दी।
### मामले की पृष्ठभूमि
– मामला 1973 के एक बिक्री समझौते से शुरू हुआ। विक्रेता के डिफॉल्ट पर मूल खरीदार (रिस्पॉन्डेंट नंबर 1) ने 1986 में *स्पेसिफिक परफॉर्मेंस* का मुकदमा दायर किया, जो 1990 में डिक्री में बदल गया।
– मुकदमे की लंबित अवस्था में ही जजमेंट डेब्टर (विक्रेता) ने संपत्ति के हिस्सों को तीसरे पक्षों को बेच दिया। अपीलकर्ता (वर्तमान खरीदार) बाद में इनसे टाइटल प्राप्त करने वाले थे।
– डिक्री के निष्पादन में अपीलकर्ताओं ने बार-बार बाधा डाली। एक्जीक्यूटिंग कोर्ट, फर्स्ट अपीलेट कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी आपत्तियों को खारिज किया।
– अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, जहां कोर्ट ने *ऑर्डर XXI रूल 102 CPC* और *ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 52* (doctrine of lis pendens) पर जोर दिया।
### सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और तर्क
– *धारा 52 TPA (Lis Pendens)*: मुकदमे की लंबित अवस्था में संपत्ति का कोई ट्रांसफर डिक्री के परिणाम के अधीन रहता है। ट्रांसफर अवैध नहीं होता, लेकिन वह डिक्री धारक के अधिकारों के अधीन होता है।
– *ट्रांसफरी पेंडेंट लाइट का कोई अधिकार नहीं: ऐसा खरीदार जजमेंट डेब्टर के जूते में खड़ा होता है। वह डिक्री के निष्पादन में बाधा नहीं डाल सकता। **ऑर्डर XXI रूल 102 CPC* स्पष्ट रूप से कहता है कि ट्रांसफरी पेंडेंट लाइट द्वारा की गई बाधा को मान्य नहीं किया जाएगा।
– *अधिकारों की सीमा*: एक्जीक्यूशन में आपत्ति करने वाले की जांच केवल इतनी होती है कि क्या वह ट्रांसफरी पेंडेंट लाइट है। यदि हां, तो उसकी कोई स्वतंत्र दलील नहीं सुनी जाएगी। (Silverline Forum Pvt. Ltd. v. Rajiv Trust और Usha Sinha v. Dina Ram केस का हवाला)
– *बोनाफाइड खरीदार का तर्क खारिज*: कोर्ट ने कहा कि लिस पेंडेंस में नोटिस की प्रासंगिकता नहीं है। खरीदार को मुकदमे की जानकारी हो या न हो, ट्रांसफर डिक्री के अधीन रहता है।
– *न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता*: यदि ट्रांसफरी पेंडेंट लाइट को बाधा डालने की अनुमति दी गई, तो धारा 52 का उद्देश्य विफल हो जाएगा और न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता प्रभावित होगी।
### फैसले के निर्देश
– अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को *15 फरवरी 2026* तक डिक्री धारक को संपत्ति का *वास्तविक भौतिक कब्जा* सौंपने का आदेश दिया।
– कोर्ट ने *संविधान के अनुच्छेद 142* के तहत असाधारण शक्ति का प्रयोग करते हुए इस मामले में भविष्य में कोई और मुकदमेबाजी पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, ताकि डिक्री धारक को न्याय का फल तुरंत मिल सके।
### फैसले का महत्व
यह फैसला संपत्ति विवादों में *डिक्री के निष्पादन* को मजबूत बनाता है। लाखों मामलों में जहां मुकदमे के दौरान संपत्ति बेची जाती है, अब ऐसे खरीदार डिक्री के खिलाफ नहीं जा सकेंगे। यह न्यायिक प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाने की दिशा में बड़ा कदम है, क्योंकि अक्सर डिक्री मिलने के बाद भी कब्जा मिलने में वर्षों लग जाते हैं।
यदि आप किसी संपत्ति विवाद में हैं और मुकदमे के दौरान ट्रांसफर हुआ है, तो कानूनी सलाह लें कि डिक्री का परिणाम ही अंतिम होगा।