
ब्यूरो रिपोर्ट
*नई दिल्ली, 20 जनवरी 2026* — भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 6 जनवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी कंपनी (प्रमोटर या पैरेंट कंपनी) द्वारा उधारकर्ता कंपनी में फंड डालने (infuse funds) का वादा *इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धारा 126* के तहत *गारंटी अनुबंध* नहीं माना जाएगा। यह फैसला *UV Asset Reconstruction Company Limited बनाम Electrosteel Castings Limited* (केस नंबर: 2026 INSC 14) में आया है।
न्यायमूर्ति संजय कुमार और अलोक अराधे की बेंच ने अपील खारिज कर दी और NCLT तथा NCLAT के फैसलों को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि ऐसे वादे से प्रमोटर कंपनी को उधारकर्ता के कर्ज के लिए *गारंटर* नहीं माना जा सकता।
### मामले की पूरी कहानी
– *Electrosteel Steels Limited (ESL)* ने 2011 में SREI Infrastructure Finance Limited से करीब 500 करोड़ रुपये का लोन लिया था।
– ESL की प्रमोटर कंपनी *Electrosteel Castings Limited (ECL)* ने 27 जुलाई 2011 को एक *Deed of Undertaking* साइन किया।
– इस Deed के *क्लॉज 2.2* में लिखा था कि अगर ESL फाइनेंशियल कोवेनेंट्स (वित्तीय शर्तें) का पालन नहीं करती, तो ECL ESL में जरूरी फंड की व्यवस्था करेगी ताकि ESL उन शर्तों को पूरा कर सके।
– बाद में SREI ने अपना लोन का अधिकार *UV Asset Reconstruction Company Limited (UVARCL)* को ट्रांसफर कर दिया।
– ESL दिवालिया हो गई और उसका रेजोल्यूशन प्लान कोर्ट से मंजूर हो गया।
– UVARCL ने IBC की *धारा 7* के तहत ECL के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू करने की अर्जी दी, दावा करते हुए कि ECL ESL के कर्ज की गारंटर है।
– NCLT (24 जून 2022) और NCLAT (24 जनवरी 2024) ने अर्जी खारिज कर दी। UVARCL ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
### सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फैसला
अदालत ने *धारा 126* (इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट) की व्याख्या करते हुए कहा:
– गारंटी अनुबंध के लिए जरूरी है कि गारंटर स्पष्ट रूप से वादा करे कि मुख्य देनदार (ESL) डिफॉल्ट करने पर वह खुद लेनदार (UVARCL/SREI) को कर्ज चुकाएगा।
– क्लॉज 2.2 में ECL ने केवल ESL में फंड डालने की व्यवस्था करने का वादा किया है — यह *लेनदार को सीधे पैसे चुकाने* का वादा नहीं है।
– अदालत ने कहा: “उधारकर्ता में फंड इन्फ्यूजन का वादा गारंटी नहीं बनता। यह सिर्फ उधारकर्ता को वित्तीय अनुशासन बनाए रखने में मदद करने का समझौता है, न कि लेनदार को भुगतान का प्रत्यक्ष वचन।”
अदालत ने *’See to it’ गारंटी* (अंग्रेजी कानून की अवधारणा) पर भी चर्चा की और कहा कि भारतीय कानून में भी फंड इन्फ्यूजन जैसा वादा ‘See to it’ गारंटी नहीं बनता, क्योंकि यह उधारकर्ता को सक्षम बनाने का है, न कि खुद कर्ज चुकाने का।
### अन्य महत्वपूर्ण बातें
– मूल सैंक्शन लेटर, CIRP इन्फॉर्मेशन मेमोरैंडम, असाइनमेंट एग्रीमेंट और ESL की फाइनेंशियल स्टेटमेंट्स में ECL को गारंटर नहीं दिखाया गया — इससे साबित होता है कि पक्षकारों का इरादा गारंटी बनाने का नहीं था।
– रेजोल्यूशन प्लान से ESL का कर्ज खत्म हो गया, लेकिन थर्ड-पार्टी (जैसे ECL) की सुरक्षा या गारंटी देयता बनी रहती है — अगर गारंटी होती। लेकिन चूंकि ECL गारंटर नहीं था, इसलिए अपील खारिज।
– अपील पर कोई कोर्ट खर्च नहीं लगाया गया।
### इस फैसले का असर
यह फैसला कॉरपोरेट लोन, प्रमोटर अंडरटेकिंग और IBC मामलों में बहुत बड़ा है। अब:
– प्रमोटर कंपनियां फंड इन्फ्यूजन क्लॉज को लेकर ज्यादा सुरक्षित रहेंगी।
– लेनदारों (ARC आदि) को गारंटी साबित करने के लिए स्पष्ट और सीधा वादा दिखाना होगा।
– IBC धारा 7 की अर्जी में ऐसे क्लॉज पर गारंटी का दावा करना मुश्किल हो जाएगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला IBC के तहत थर्ड-पार्टी देयता की सीमाओं को और साफ करता है। ECL के पक्ष में यह राहत भरा फैसला है, जबकि UVARCL की अपील पूरी तरह खारिज हो गई।
(स्रोत: सुप्रीम कोर्ट जजमेंट 2026 INSC 14, आर्थिक टाइम्स, लाइव लॉ और अन्य कानूनी रिपोर्ट्स)