
ब्यूरो रिपोर्ट
डिजिटल लोन का मायाजाल: मध्य प्रदेश में कर्ज, तमिलनाडु में मुकदमा और कानून का दुरुपयोग
तकनीक और शोषण का नया गठजोड़
सूचना क्रांति के इस युग में वित्तीय सेवाओं का लोकतंत्रीकरण हुआ है। आज ‘फिनटेक’ (Fintech) कंपनियों के माध्यम से मध्य प्रदेश के बैतूल जैसे आदिवासी बहुल और विकासशील जिलों के नागरिकों के लिए मोबाइल के एक क्लिक पर ऋण (Loan) उपलब्ध है। लेकिन इस सुगमता के पीछे एक काला पक्ष भी है। जब कोई ऋणी विपरीत आर्थिक परिस्थितियों के कारण किश्त (EMI) चुकाने में असमर्थ होता है, तो ये कंपनियां कानून की प्रक्रियाओं का उपयोग ‘हथियार’ के रूप में करने लगती हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऋण बैतूल में दिया जाता है, लेकिन आपराधिक मुकदमा हजारों किलोमीटर दूर तमिलनाडु, कर्नाटक या तेलंगाना जैसे राज्यों में दर्ज कराया जाता है। भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(2) और 318(4) का भय दिखाकर आम नागरिकों का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है। जिला न्यायालय बैतूल के अधिवक्तान भारत सेन का यह लेख बचाव पक्ष का मार्गदर्शन करता हैं।
1. कानूनी पेचीदगियां: BNS की धारा 316(2) और 318(4) क्या हैं?
पुराने भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह अब ‘भारतीय न्याय संहिता’ (BNS) प्रभावी है। वित्तीय संस्थान मुख्य रूप से दो धाराओं का उपयोग कर रहे हैं:
• धारा 316 (2) BNS (पुरानी IPC 406): यह ‘आपराधिक विश्वासघात’ (Criminal Breach of Trust) से संबंधित है। बैंक यह आरोप लगाते हैं कि ऋणी को जो पैसा (संपत्ति) एक विशेष उद्देश्य के लिए दिया गया था, उसने उसका दुरुपयोग किया।
• धारा 318 (4) BNS (पुरानी IPC 420): यह ‘धोखाधड़ी’ (Cheating) से संबंधित है। कंपनियों का तर्क होता है कि ऋणी ने शुरू से ही पैसा हड़पने की नीयत से फर्जी दस्तावेज दिए या तथ्यों को छिपाया।
यथार्थ: ऋण न चुका पाना (Default) एक ‘सिविल लायबिलिटी’ है, न कि ‘आपराधिक कृत्य’। जब तक कि ऋणी की मंशा (Mens Rea) शुरुआत से ही धोखाधड़ी की न हो, तब तक ये धाराएं लागू नहीं होनी चाहिए।
2. क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का दुरुपयोग: ‘फोरम शॉपिंग’ की रणनीति
वित्तीय कंपनियां जानबूझकर सुदूर राज्यों में FIR दर्ज कराती हैं या न्यांयालय में परिवाद पत्र दाखिल करती हैं इसके पीछे उनका उद्देश्य न्याय पाना नहीं, बल्कि ऋणी को इतना डराना और थकाना है कि वह दबाव में आकर समझौता कर ले। इसे कानूनी भाषा में ‘Forum Shopping’ कहा जाता है।
• कानून का सिद्धांत: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 197 स्पष्ट करती है कि किसी भी अपराध की जांच और विचारण (Trial) उसी क्षेत्र की अदालत में होगा जहाँ वह अपराध हुआ है।
• यदि ऋणी मध्य( प्रदेश राज्या के जिला बैतूल का निवासी है, उसने बैतूल में बैठकर ऑनलाइन आवेदन किया और पैसा उसके बैतूल स्थित बैंक खाते में आया, तो ‘वाद का कारण’ (Cause of Action) बैतूल में ही उत्पन्न होता है। तमिलनाडु की पुलिस या अदालत को ऐसे मामलों में दखल देने का नैतिक और कानूनी अधिकार सीमित है।
3. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय: ऋणी के लिए सुरक्षा कवच
भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक फैसलों में ऋण चूककर्ताओं को अनावश्यक आपराधिक मुकदमों से बचाया है:
• सतीशचंद्र रतनलाल शाह बनाम गुजरात राज्य: कोर्ट ने कहा कि केवल अनुबंध का उल्लंघन (Breach of Contract) धोखाधड़ी नहीं है, जब तक कि बेईमानी का इरादा स्पष्ट न हो।
• जी. सागर सूरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य: न्यायालय ने चेतावनी दी कि आपराधिक अदालतों का उपयोग नागरिक विवादों (Civil Disputes) को सुलझाने के लिए ‘दबाव के औजार’ के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
• अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य: 7 साल से कम की सजा वाले मामलों (जैसे 316(2) BNS) में पुलिस सीधे गिरफ्तारी नहीं कर सकती; उसे पहले धारा 35 BNSS (पुरानी 41A CrPC) के तहत नोटिस देना अनिवार्य है।
4. बचाव पक्ष के लिए उपलब्ध कानूनी रणनीतियाँ
यदि आप बैतूल के निवासी हैं और आपको किसी सुदूर राज्य से कानूनी नोटिस या समन मिला है, तो निम्नलिखित कदम उठाएं:
क. क्षेत्राधिकार को चुनौती (Challenge to Jurisdiction):
क्षेत्राधिकार का प्रश्नी महत्व पूर्ण हैं आप अदालत में आवेदन दे सकते हैं कि उस अदालत को मामला सुनने का अधिकार नहीं है। डिजिटल साक्ष्यों (IP Address, बैंक स्टेटमेंट) के आधार पर यह साबित किया जा सकता है कि पूरी प्रक्रिया बैतूल में संपन्न हुई थी।
ख. अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail):
चूंकि धारा 318(4) गैर-जमानती है, इसलिए गिरफ्तारी की संभावना को खत्म करने के लिए सत्र…






