
ब्यूरो रिपोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक लापरवाही और बिना ठोस जांच के आदेश पारित करने पर छिंदवाड़ा जिले के कलेक्टर को कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में न केवल कलेक्टर के आदेश को रद्द कर दिया, बल्कि राज्य सरकार पर ₹50,000 का हर्जाना भी लगाया, जिसे दोषी अधिकारियों की जेब से वसूल किया जाएगा। यह फैसला प्रदेश के अधिकारियों के लिए एक मजबूत नजीर बन गया है, जो यांत्रिक (मैकेनिकल) और लापरवाह तरीके से काम करने की आदत पर रोक लगाने वाला है।
### मामले की पूरी पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला छिंदवाड़ा जिले के चौरई इलाके से जुड़ा है, जहां अवैध खनिज परिवहन का आरोप लगा था। माइनिंग विभाग के अधिकारी ने एक ट्रक (रजिस्ट्रेशन नंबर RJ 14 GE 8519) को अवैध परिवहन के संदेह में जब्त कर लिया था। ट्रक चालक से पूछताछ के दौरान उसने अपना नाम सारंग रघुवंशी बतलाया।
माइनिंग अधिकारी ने इसी एक बयान को आधार बनाकर पंचनामा तैयार कर दिया और ट्रक को अवैध खनन से जुड़ा मानते हुए कार्रवाई की सिफारिश की। मामला जब छिंदवाड़ा के जिला कलेक्टर के पास पहुंचा, तो उन्होंने बिना गहराई से जांच किए, बिना ट्रक के असली मालिकाना हक की पुष्टि किए और बिना याचिकाकर्ता को उचित सुनवाई दिए, 27 जनवरी 2025 को एक आदेश पारित कर दिया। इस आदेश में ट्रक को जब्त करने के साथ-साथ याचिकाकर्ता सारंग रघुवंशी पर जुर्माना लगाया गया।
ट्रक का असली मालिक बालवीर सिंह था, लेकिन कार्रवाई गलत व्यक्ति पर हो गई। सारंग रघुवंशी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (जबलपुर पीठ) में याचिका दायर की।
### हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियां
युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर ने माइनिंग अधिकारी की रिपोर्ट को *आंख मूंदकर स्वीकार* कर लिया, बिना तथ्यों की जांच के और बिना स्वतंत्र अनुप्रयोग के। यह कार्रवाई *”यांत्रिक (mechanical) और लापरवाह (careless)”* थी, जिसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (natural justice) का भी उल्लंघन हुआ।
कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में अधिकारियों को सतर्कता और गहन जांच बरतनी चाहिए, न कि सिर्फ एक बयान या रिपोर्ट पर आधारित आदेश पारित करना चाहिए। गलत व्यक्ति पर दंड लगाना न केवल अन्याय है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है।
### फैसला क्या रहा?
– छिंदवाड़ा कलेक्टर द्वारा पारित दंड और जब्ती आदेश को पूरी तरह *रद्द* कर दिया गया।
– राज्य सरकार पर *₹50,000* का हर्जाना लगाया गया।
– यह राशि सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि *दोषी अधिकारियों* (कलेक्टर और संबंधित माइनिंग अधिकारी) से वसूल की जाएगी।
– हर्जाने की राशि याचिकाकर्ता को भुगतान की जाएगी।
यह फैसला 13 मार्च 2026 को सुनाया गया और हाल ही में विभिन्न मीडिया और कानूनी रिपोर्टों में प्रकाशित हुआ है।
### महत्व और प्रभाव
यह फैसला मध्य प्रदेश में प्रशासनिक अधिकारियों के लिए चेतावनी की तरह है। अब से यदि कोई अधिकारी बिना ठोस सबूत, जांच या सुनवाई के आदेश पारित करता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जा सकता है। इससे भविष्य में ऐसी लापरवाही पर अंकुश लगने की उम्मीद है, खासकर अवैध खनन जैसे संवेदनशील मामलों में जहां निर्दोष लोग फंस जाते हैं।