
Recent major reliefs granted by various High Courts झूठे मुकदमों से जूझते पतियों को हाई कोर्ट की बड़ी राहत: ससुराल पक्ष पर मनगढ़ंत केस दर्ज कराना ‘मानसिक क्रूरता’, तलाक की डिक्री बरकरार
जबलपुर:
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने वैवाहिक विवादों से जुड़े एक ऐतिहासिक फैसले में पुरुषों और उनके परिवारों के पक्ष में बेहद महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पत्नी द्वारा अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ झूठे व बेबुनियाद आपराधिक मामले दर्ज कराना कानूनन ‘मानसिक क्रूरता’ (Mental Cruelty) है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मनगढ़ंत आरोप जीवनसाथी को गंभीर मानसिक प्रताड़ना देते हैं, जिसके आधार पर पति को तलाक मिलने का पूरा हक है।
यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने श्रीमती आलोकिता (सीता) बनाम विकास मिश्रा (प्रथम अपील संख्या 135/2024) के मामले में दिया। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा पति के पक्ष में सुनाए गए तलाक के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया है।
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## हाई कोर्ट के फैसले के 4 मुख्य कानूनी आधार:
1. झूठे आरोप यानी मानसिक प्रताड़ना: हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i-a) के तहत कोर्ट ने माना कि बिना किसी सबूत के ससुराल वालों को फंसाना क्रूरता है। ऐसा व्यवहार वैवाहिक जीवन को इस हद तक कड़वा बना देता है कि साथ रहना नामुमकिन हो जाता है।
2. बिना सबूत के ससुर पर आरोप संदेहास्पद: पत्नी ने अपने ससुर पर छेड़छाड़ के आरोप लगाए थे। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि पत्नी ससुराल छोड़ने के काफी समय बाद यह शिकायत दर्ज करा रही थी, और इसके समर्थन में कोई भी स्वतंत्र गवाह या सबूत नहीं था।
3. लंबे समय तक अलग रहना ‘परित्याग’: कोर्ट ने पाया कि पत्नी कानूनी रूप से तय अनिवार्य अवधि से अधिक समय से अलग रह रही थी और उसने वापस आकर घर बसाने की कोई कोशिश नहीं की, जो धारा 13(1)(ib) के तहत ‘परित्याग’ (Desertion) का ठोस आधार है।
4. गुजारा भत्ता मिलने का मतलब क्रूरता की माफी नहीं: अदालत ने साफ किया कि अगर पत्नी को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण (Maintenance) मिल रहा है, तो इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि पति पर की गई क्रूरता खत्म हो गई। ठोस सबूत होने पर क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री वैध रहेगी।
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## इस फैसले से पुरुषों के लिए 4 बड़े सबक (कानूनी सुरक्षा कवच):
यह फैसला उन विवाहित पुरुषों के लिए एक मार्गदर्शिका और कानूनी सबक है जो वैवाहिक विवादों या झूठे मुकदमों का सामना कर रहे हैं:
* घबराएं नहीं, झूठे मुकदमों के खिलाफ डटकर लड़ें: यदि आपके और आपके परिवार के खिलाफ लगाए गए आरोप मनगढ़ंत हैं, तो कानून आपको पूरा संरक्षण देता है। अदालतें अब झूठे केस दर्ज कराने की प्रवृत्ति को गंभीरता से ले रही हैं और इसे पति के साथ क्रूरता मानकर राहत दे रही हैं।
* तथ्य, समय और डिजिटल रिकॉर्ड का महत्व: इस केस में पति की जीत इसलिए हुई क्योंकि पत्नी के आरोपों का समय (Timeline) संदेहास्पद था। पुरुषों के लिए सबक है कि विवाद की स्थिति में हमेशा धैर्य रखें, हर घटनाक्रम, तारीख, संदेश या बातचीत का सही और कानूनी रिकॉर्ड रखें। यही साक्ष्य अदालत में आपकी बेगुनाही साबित करेंगे।
* देरी से दर्ज मामलों पर उठाएं सवाल: यदि पत्नी ससुराल छोड़ने के महीनों या सालों बाद छेड़छाड़ या प्रताड़ना जैसे गंभीर आरोप लगाती है, तो बिना स्वतंत्र गवाहों के कोर्ट उन्हें संदेहास्पद मानता है। पुरुष पक्ष को अदालत में आरोपों की टाइमिंग पर मजबूती से सवाल उठाना चाहिए।
* भरण-पोषण (Maintenance) के आदेश से निराश न हों: कई बार पुरुष यह मान लेते हैं कि पत्नी को अंतरिम गुजारा भत्ता मिलने का मतलब है कि वे मुख्य केस हार गए हैं। यह फैसला सिखाता है कि गुजारा भत्ता मिलना एक अलग वित्तीय प्रक्रिया है, लेकिन यदि आप क्रूरता साबित कर देते हैं, तो मुख्य केस (तलाक/तलाक का बचाव) में जीत आपकी ही होगी।





