
भरत सेन*
अधिवक्ता, जिला न्यायालय बैतूल (मध्य प्रदेश)
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति का मुद्दा एक बार फिर सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की बहस का केंद्र बन गया है। ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन द्वारा दायर जनहित याचिका ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की हालिया सिफारिशों को चुनौती देते हुए न्यायपालिका में पिछड़े वर्गों की उपेक्षा का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया है। यह मामला केवल कुछ नामों का नहीं, बल्कि देश की सबसे महत्वपूर्ण संस्था में सामाजिक विविधता और संवैधानिक मूल्यों के पालन का है।
### पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति
26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सात अधिवक्ताओं को न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की। इनमें डॉ. विवेक शरण, राजेश कुमार शुक्ला, कनक गहरवार, भक्ति व्यास, श्रेयस पंडित, मृणाल एलकर और अविनाश जरगर के नाम शामिल हैं। एसोसिएशन का स्पष्ट आरोप है कि इनमें से छह नाम सामान्य वर्ग से हैं और केवल एक नाम अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से है। अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) से एक भी नाम सिफारिश में शामिल नहीं है।
याचिका में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में वर्तमान में कार्यरत लगभग 38 न्यायाधीशों में से 36 सामान्य या उच्च जाति वर्ग से हैं। एससी और ओबीसी वर्ग से मात्र एक-एक न्यायाधीश हैं। आजादी के इतने दशकों बाद भी एसटी वर्ग से एक भी न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं हुई है। यह स्थिति उस राज्य में है जहां पिछड़े वर्गों की आबादी बहुसंख्यक है।
### याचिका में उठाए गए मुख्य मुद्दे
ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व का अभाव संविधान की मूल भावना के विपरीत है। संविधान निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को संविधान का अभिन्न अंग बनाया था। अनुच्छेद 14, 15 और 16 समानता और अवसर की समानता की बात करते हैं। जब न्यायपालिका जैसी संस्था में एक वर्ग का लगभग एकाधिकार हो जाए, तो आम नागरिक का विश्वास कैसे बना रहेगा?
याचिका में मांग की गई है कि:
– कॉलेजियम की 26 अक्टूबर की सिफारिशों पर पुनर्विचार किया जाए।
– नियुक्तियों पर अंतरिम रोक लगाई जाए।
– हाई कोर्ट के न्यायाधीशों और राज्य विधि अधिकारियों की नियुक्ति में एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी दिशानिर्देश बनाए जाएं।
### सामाजिक न्याय का प्रश्न
न्यायपालिका केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं है। यह समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचाने वाली संस्था है। जब न्यायाधीशों का एक बड़ा हिस्सा एक ही सामाजिक पृष्ठभूमि से आता है, तो विभिन्न वर्गों के अनुभव, दृष्टिकोण और सामाजिक यथार्थ को समझने में स्वाभाविक सीमाएं आती हैं। पिछड़े वर्गों के वकील और सामाजिक कार्यकर्ता लंबे समय से यही कहते रहे हैं कि न्यायपालिका में विविधता न होने से कई मामलों में सामाजिक संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती है।
इंद्रा साहनी मामले में भी सामाजिक न्याय के सिद्धांत को मान्यता दी गई थी। पिछड़े वर्गों का तर्क है कि यदि प्रशासनिक सेवाओं, शिक्षा और विधायिका में प्रतिनिधित्व का सिद्धांत लागू हो सकता है, तो न्यायपालिका को इससे पूरी तरह बाहर क्यों रखा जाए? योग्यता महत्वपूर्ण है, लेकिन योग्यता को सामाजिक पृष्ठभूमि से पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता। सामाजिक रूप से वंचित वर्गों के योग्य अभ्यर्थी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं, बशर्ते चयन प्रक्रिया में पूर्वाग्रह और अनौपचारिक नेटवर्क का प्रभाव कम हो।
### सुनवाई और वर्तमान स्थिति
5 नवंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ के समक्ष इस याचिका पर विस्तार से सुनवाई हुई। सामाजिक प्रतिनिधित्व, विविधता और संवैधानिक मूल्यों पर तीखी बहस हुई। सुनवाई के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया और याचिकाकर्ताओं को अतिरिक्त लिखित तर्क पेश करने का अवसर दिया।
यह पहली बार नहीं है जब यह मुद्दा उठाया गया हो। पहले भी ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन और अन्य संगठनों ने इसी तरह की याचिकाएं दायर की थीं। कई बार अदालतों ने कहा कि जजों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के तहत होती है और संविधान में जातिगत आरक्षण का सीधा प्रावधान नहीं है। लेकिन यह तर्क सामाजिक यथार्थ को नजरअंदाज करता है। कॉलेजियम प्रणाली पारदर्शी और समावेशी होनी चाहिए, ताकि समाज के सभी वर्गों के योग्य लोगों को समान अवसर मिल सके।
### आगे का रास्ता
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही यह भी जरूरी है कि यह संस्था समाज के विविध स्वरूप को प्रतिबिंबित करे। पिछड़े वर्गों का हित इसी में है कि:
– चयन प्रक्रिया में सामाजिक विविधता को एक महत्वपूर्ण कारक माना जाए।
– योग्य एससी, एसटी और ओबीसी अधिवक्ताओं को पर्याप्त अवसर दिए जाएं।
– कॉलेजियम की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता लाई जाए।
– अन्य राज्यों के अनुभवों से सीखते हुए मध्य प्रदेश में भी प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाया जाए।
सामाजिक न्याय केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है। यह समान अवसर, सम्मान और भागीदारी का प्रश्न है। जब न्यायपालिका में बैठने वाले लोग समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करेंगे, तभी आम नागरिक को लगेगा कि न्याय व्यवस्था उसके लिए भी है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चल रही यह बहस सिर्फ एक याचिका नहीं, बल्कि न्यायपालिका को और अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पिछड़े वर्गों के हित में यह आवश्यक है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार हो और न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के ठोस उपाय किए जाएं। फैसला सुरक्षित है, लेकिन बहस जारी रहनी चाहिए। क्योंकि न्याय की असली कसौटी यही है कि वह समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचे।






