
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
नई दिल्ली, 11 जनवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) सदस्यों द्वारा अपनी कृषि भूमि की बिक्री को वैध ठहराया है। यह फैसला **धारा 165** के तहत मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की व्याख्या से संबंधित है।
**मामला:** *मध्य प्रदेश राज्य बनाम दिनेश कुमार एवं अन्य* (8 अप्रैल 2025) में जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कमिश्नर के रिविजनल आदेश को रद्द किया गया था।
### मामले की पृष्ठभूमि
रतलाम जिले (मध्य प्रदेश) में कुछ आदिवासी सदस्यों ने अपनी कृषि भूमि **दिनेश कुमार** को बेची। यह भूमि **संविधान की पांचवीं अनुसूची** के तहत घोषित अनुसूचित क्षेत्र में नहीं आती थी।
– 21 मार्च 2018 को अतिरिक्त कलेक्टर ने **धारा 165(6)** के तहत बिक्री की अनुमति दी।
– 26 मार्च 2018 को रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए सौदा पूरा हुआ।
– बाद में उज्जैन डिवीजन के कमिश्नर ने **धारा 50** के तहत स्वत: संज्ञान (suo motu) में 14 सितंबर 2021 को इस अनुमति को रद्द कर दिया।
– हाई कोर्ट ने कमिश्नर के आदेश को पलट दिया, जिसके खिलाफ राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
### मुख्य विवाद के बिंदु और कोर्ट का फैसला
1. **अतिरिक्त कलेक्टर की अधिकारिता** — राज्य का तर्क था कि केवल जिला कलेक्टर ही अनुमति दे सकते हैं।
**कोर्ट ने खारिज किया:** 19 मई 2017 के सरकारी आदेश से अतिरिक्त कलेक्टर को कलेक्टर की शक्तियां सौंपी गई थीं। **धारा 11** के तहत अतिरिक्त कलेक्टर को वैध अधिकारी माना गया। इसलिए अनुमति वैध थी।
2. **धारा 165(6-सी)** का अनुपालन — राज्य ने दावा किया कि अनुमति देते समय आवश्यक शर्तों (जैसे उचित मूल्य, आदिवासी का लाभ, बेनामी न होना आदि) का पालन नहीं हुआ।
**कोर्ट ने पाया:**
– भूमि अनुसूचित क्षेत्र में नहीं थी।
– बिक्री मूल्य 45 लाख रुपये था, जो बाजार मूल्य (38.31 लाख) से अधिक था।
– खरीदार ने 10 साल तक कृषि उपयोग की शर्त मानी।
– पटवारी और तहसीलदार की रिपोर्ट से सौदा पारदर्शी और वास्तविक साबित हुआ।
कोई उल्लंघन नहीं पाया गया।
3. **रिविजनल शक्तियों पर समय सीमा** — कमिश्नर का आदेश 3 साल बाद आया, जबकि हाई कोर्ट के फुल बेंच फैसले (*रणवीर सिंह* मामले) में ऐसी रिविजनल कार्रवाई के लिए 180 दिनों की सीमा तय है।
**कोर्ट ने टिप्पणी की:** देरी अनुचित थी, लेकिन मुख्य आधार पर भी अनुमति वैध पाई गई।
### फैसले का महत्व
यह निर्णय आदिवासी भूमि अधिकारों को मजबूत करता है, साथ ही गैर-अनुसूचित क्षेत्रों में आवश्यक प्रक्रिया का पालन करने पर बिक्री को वैध मानता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि प्रक्रिया पूरी हो और आदिवासी को लाभ हो, तो ऐसे सौदों को अनावश्यक रूप से रद्द नहीं किया जा सकता। इससे संपत्ति लेन-देन में स्पष्टता आएगी और अनावश्यक कानूनी विवाद कम होंगे।
राज्य सरकार की अपील खारिज होने से यह **लैंडमार्क रूलिंग** मानी जा रही है, जो मध्य प्रदेश में आदिवासी भूमि हस्तांतरण के मामलों में मार्गदर्शन प्रदान करेगी।