
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
**इलाहाबाद हाईकोर्ट का सख्त निर्देश: झूठी या दुर्भावनापूर्ण FIR दर्ज कराने वालों पर पुलिस को अनिवार्य मुकदमा चलाना होगा**
**प्रयागराज, 23 जनवरी 2026:** इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को झूठी या दुर्भावनापूर्ण फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का सख्त आदेश दिया है। जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की एकल पीठ ने कहा कि यदि जांच में पाया जाता है कि FIR झूठी सूचना पर आधारित थी, तो जांच अधिकारी (IO) को **भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS)** की धारा 215(1)(a) (CrPC की धारा 195(1)(a) के समकक्ष) के तहत सूचना देने वाले व्यक्ति के खिलाफ औपचारिक लिखित शिकायत दर्ज करनी होगी। ऐसा न करने पर पुलिस अधिकारी **भारतीय न्याय संहिता (BNS)** की धारा 199(b) के तहत अभियोजन और विभागीय कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे।
**मामले की पृष्ठभूमि और केस विवरण:**
– **केस टाइटल:** उमे फरवा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (Umme Farva vs. State of U.P. and Another)
– **केस संदर्भ:** 2026 LiveLaw (AB) 25
– **फैसला तिथि:** 14 जनवरी 2026
– **याचिका:** अलीगढ़ की एक महिला उमे फरवा ने अपने पूर्व पति द्वारा सोशल मीडिया पर धमकी देने के आरोप में दर्ज FIR को चुनौती दी थी। जांच में आरोप झूठे पाए गए और क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हुई, लेकिन मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया था। हाईकोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया और झूठी FIR के दुरुपयोग पर व्यापक निर्देश जारी किए।
**अदालत के प्रमुख निर्देश और तर्क:**
जस्टिस गिरी ने फैसले में स्पष्ट किया कि पुलिस तंत्र के दुरुपयोग को रोकने के लिए ये कदम जरूरी हैं। मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
– जांच पूरी होने पर यदि **क्लोजर रिपोर्ट** (फाइनल रिपोर्ट) आरोपी को निर्दोष ठहराती है और FIR झूठी, फर्जी या भ्रामक सूचना पर आधारित पाई जाती है, तो IO को अनिवार्य रूप से सूचना देने वाले (informant) और गवाहों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करानी होगी।
– यह शिकायत **BNS की धारा 212 और 217** (पुरानी IPC की धारा 177 और 182 के समकक्ष – झूठी सूचना देकर लोक सेवक को गुमराह करना) के तहत होगी।
– मजिस्ट्रेट को भी निर्देश: क्लोजर रिपोर्ट के साथ पूरी केस डायरी प्राप्त करने के बाद ही उसे स्वीकार करें, और IO से झूठी सूचना के खिलाफ लिखित परिवाद मांगें। बिना ऐसा किए रिपोर्ट पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता।
– डीजीपी को आदेश: सभी पुलिस अधिकारियों (कमीशनर, SSP, SP, IO, SHO, सर्कल ऑफिसर, ADSP, SP, पब्लिक प्रॉसीक्यूटर) को ये निर्देश जारी करें कि क्लोजर रिपोर्ट के साथ शिकायत दर्ज करना अनिवार्य है।
– गैर-अनुपालन पर: पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही, BNS धारा 199(b) के तहत मुकदमा और विभागीय कार्रवाई होगी। कोर्ट ने 60 दिनों के अंदर इन निर्देशों को लागू करने का समय दिया है।
– अदालत ने कहा: “ऐसी प्रक्रिया से कानूनी प्रावधान व्यर्थ नहीं होने चाहिए। झूठी FIR से व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होता है और पुलिस तंत्र का दुरुपयोग रोकना जरूरी है।”
**फैसले के प्रभाव:**
यह आदेश झूठी FIR की बढ़ती प्रवृत्ति पर लगाम कसने वाला माना जा रहा है, खासकर वैवाहिक विवादों, व्यक्तिगत दुश्मनी या अन्य मामलों में जहां पुलिस को गुमराह किया जाता है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इससे आरोपी पक्ष को राहत मिलेगी और झूठे आरोप लगाने वालों पर डर पैदा होगा। हालांकि, पुलिस पर अतिरिक्त जिम्मेदारी बढ़ने से कार्यभार बढ़ सकता है।
यह फैसला नए आपराधिक कानूनों (BNSS और BNS) के लागू होने के बाद झूठी FIR रोकने की दिशा में एक मजबूत कदम है।
(स्रोत: Live Law, The Indian Express, Times of India, Verdictum, LawBeat आदि कानूनी रिपोर्ट्स)






