
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
कांग्रेस पार्टी ने स्वतंत्रता आन्दोनल के दौरान हिन्दु मुसलिम एकता का नारा दिया और देश का विभाजन हो गया *आचार्य रजनीश (ओशो) का तर्क बहुत स्पष्ट, तार्किक और गहरा है।* उन्होंने इसे अपने प्रवचनों में (खासकर देख कबीरा रोया के प्रवचन-27 और प्रवचन-11 में) विस्तार से समझाया है।
### ओशो का मूल तर्क क्या है?
1920 के बाद गांधीजी के सामने देश को एक करने का सवाल था। उन्होंने *“हिंदू-मुस्लिम एकता”* का नारा दिया। ओशो कहते हैं कि *यह बुनियादी भूल (मूलगामी गलती) थी*।
उन्होंने कहा:
> “गांधी ने देश की एकता के लिए एक नारा दिया—हिंदू-मुस्लिम एकता का… लेकिन गांधी से बुनियादी भूल हो गई। जैसे ही गांधी ने यह कहा, हिंदू-मुस्लिम एकता, वैसे ही मुसलमान और हिंदू को अतिरिक्त महत्व मिल गया जो खतरनाक सिद्ध हुआ… वह शब्द बहुत खतरनाक था। *उसी शब्द के बीज ने पाकिस्तान का रूप लिया। वही शब्द विकसित हुआ और पाकिस्तान तक पहुँच गया*।”
### लॉजिक (तर्क) क्यों यह नारा गलत था?
1. *यह नारा विभाजन को ही मान्यता देता है*
“हिंदू-मुस्लिम एकता” कहने का मतलब ही यह होता है कि *हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग समुदाय हैं*, जिन्हें जोड़ने की जरूरत है। इससे दोनों को “सेल्फ-कॉन्शस” (स्वयं-जागरूक) बना दिया गया। मुसलमानों को लगने लगा कि “हमारी एकता के बिना भारत कुछ भी नहीं कर सकता। हम बहुत महत्वपूर्ण हैं।”
इसी चेतना ने मुस्लिम लीग और जिन्ना को ताकत दी। उन्होंने कहा—“हम दो अलग राष्ट्र हैं।”
2. *धार्मिक पहचान को प्राथमिकता मिल गई, राष्ट्रीय पहचान को नहीं*
ओशो कहते हैं कि सवाल *“भारतीय एकता”* का था, *“हिंदू-मुस्लिम एकता”* का कभी नहीं।
कांग्रेस ने हिंदू और मुस्लिम को दो अलग ब्लॉक मान लिया और उन्हें “भाई-भाई” कहकर जोड़ने की कोशिश की। इससे धार्मिक विभाजन को *राजनीतिक मान्यता* मिल गई।
नतीजा: *धार्मिक पहचान राजनीति में हावी हो गई, जबकि **राष्ट्रीय पहचान (भारतीयता)* कमजोर पड़ गई।
3. *अन्य समुदायों को नजरअंदाज कर दिया*
भारत में ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, सिख, आदिवासी भी थे। लेकिन नारा सिर्फ हिंदू-मुस्लिम का था। इससे यह संदेश गया कि *भारत सिर्फ हिंदू और मुस्लिम का देश है*। बाकी सब हाशिए पर चले गए।
4. *गांधी की अपनी हिंदू पहचान भी समस्या थी*
ओशो कहते हैं कि गांधी हमेशा कहते रहे—“मैं हिंदू हूँ”। मरते वक्त भी उन्होंने हिंदू संस्कार की वसीयत की।
अगर गांधी हिम्मत करके कह देते कि *“मैं सिर्फ मनुष्य हूँ, मैं भारतीय हूँ, न हिंदू न मुस्लिम”*, तो इतिहास अलग होता। लेकिन गांधी की हिंदू पहचान ने जिन्ना को “मुस्लिम नेता” बनने का मौका दे दिया।
### राष्ट्रीय एकता के लिए “भारतीयता” का नारा क्यों जरूरी था?
ओशो का मूल दर्शन यह है कि *सच्ची एकता तब होती है जब हम धार्मिक लेबल से ऊपर उठ जाएँ*।
– *“भारतीयता”* का नारा देने का मतलब:
*सबसे पहले हम भारतीय हैं*, फिर हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि।
धर्म व्यक्तिगत मामला है, *राष्ट्र का आधार नहीं*।
जो व्यक्ति पहले खुद को हिंदू या मुस्लिम कहता है और फिर भारतीय, वह भारतीय एकता को तोड़ता है।
– “हिंदू-मुस्लिम एकता” ने धार्मिक विभाजन को *स्वीकार* कर लिया और फिर जोड़ने की कोशिश की।
जबकि “भारतीयता” ने धार्मिक विभाजन को *नकार* दिया होता।
ओशो स्पष्ट कहते हैं:
> “जरूरत इस बात की थी कि हम कहते—भारतीय एकता; न हिंदू का सवाल है, न मुसलमान का। और हम इस बात पर जोर देते कि जो आदमी हिंदू होने का दावा करता है और मुसलमान होने का दावा करता है, वह भारतीय एकता को तोड़ता है।”
### निष्कर्ष (ओशो के अनुसार)
“हिंदू-मुस्लिम एकता” का नारा *राजनीतिक चालाकी* थी, लेकिन *अवैज्ञानिक* और *खतरनाक*। उसने विभाजन के बीज बो दिए।
*सच्ची राष्ट्रीय एकता* तभी संभव है जब हम *“भारतीय”* को सर्वोच्च पहचान बनाएँ। धर्म को राजनीति से अलग रखें। व्यक्ति को मनुष्य के रूप में देखें, न कि हिंदू-मुस्लिम के रूप में।
यही वजह है कि ओशो कहते हैं—*एक छोटे से शब्द के चुनाव ने हिंदुस्तान को दो टुकड़ों में बाँट दिया*। आज भी अगर हम वही पुरानी गलती दोहराते हैं तो फिर से समस्याएँ खड़ी होंगी।
*सच्ची भारतीयता* का मतलब है: *सबसे पहले भारत, फिर धर्म*। यही एकता का सबसे मजबूत आधार है।



