
ब्यूरो रिपोर्ट
## मृतक पेई (Deceased Payee) का बैंक खाता और धारा 138 NI Act का दुरुपयोग: आरोपी के पास उपलब्ध विधिक संरक्षण और बचाव के रास्ते
लेखक:
भारत सेन, अधिवक्ता
जिला एवं सत्र न्यायालय, बैतूल (मध्य प्रदेश)
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## प्रस्तावना (Introduction)
परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 के मुकदमे देश और जिला न्यायालय बैतूल में तेजी से बढ़ रहे हैं। कानूनी रूप से यह स्थापित सत्य है कि यदि चेक के धारक (Payee) की मृत्यु हो जाती है, तो उसके कानूनी उत्तराधिकारी (Legal Heirs) केस दायर करने के अधिकारी हैं। लेकिन, जब उत्तराधिकारी मूल बैंकिंग नियमों का उल्लंघन करके मृत व्यक्ति के खाते में चेक क्लीयरेंस के लिए लगाते हैं, तो वे एक गंभीर प्रक्रियात्मक और कानूनी भूल (Procedural & Legal Default) कर बैठते हैं। यह लेख …
[19:14, 11/05/2026] Bharat Sen Adv: लेख (Legal Article)
## मृतक पेई (Deceased Payee) का बैंक खाता और धारा 138 NI Act का दुरुपयोग: आरोपी के पास उपलब्ध विधिक संरक्षण और बचाव के रास्ते
लेखक:
भारत सेन, अधिवक्ता
जिला एवं सत्र न्यायालय, बैतूल (मध्य प्रदेश)
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## प्रस्तावना (Introduction)
परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 के मुकदमे देश और जिला न्यायालय बैतूल में तेजी से बढ़ रहे हैं। कानूनी रूप से यह स्थापित सत्य है कि यदि चेक के धारक (Payee) की मृत्यु हो जाती है, तो उसके कानूनी उत्तराधिकारी (Legal Heirs) केस दायर करने के अधिकारी हैं। लेकिन, जब उत्तराधिकारी मूल बैंकिंग नियमों का उल्लंघन करके मृत व्यक्ति के खाते में चेक क्लीयरेंस के लिए लगाते हैं, तो वे एक गंभीर प्रक्रियात्मक और कानूनी भूल (Procedural & Legal Default) कर बैठते हैं। यह लेख इसी बारीकी और आरोपी (Accused) के पास उपलब्ध मजबूत विधिक बचाव के रास्तों पर प्रकाश डालता है।
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## 1. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की गाइडलाइन और मृतक खाता (Deceased Account Guidelines)
भारतीय बैंकिंग प्रणाली में किसी व्यक्ति की मृत्यु होते ही उसका खाता कानूनी रूप से ‘ऑपरेटिव’ (सक्रिय) नहीं रहता।
* अनिवार्य रोक (Operation Freeze): [रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की गाइडलाइंस] के अनुसार, जैसे ही किसी बैंक को खाताधारक की मृत्यु की सूचना मिलती है (या मृत्यु हो जाती है), खाते में सभी प्रकार के डेबिट (Withdrawals/Clearing) तत्काल प्रभाव से रोक दिए जाते हैं।
* बैंकिंग नियमों का उल्लंघन: यदि मृतक के परिजन बैंक को मृत्यु की सूचना दिए बिना, चेक को मृतक के एकल खाते (Single Account) में भुगतान हेतु पेश करते हैं, तो यह बैंकिंग प्रणाली के साथ धोखाधड़ी (Fraud on Banking System) की श्रेणी में आता है।
* RBI का नियम (Pipeline Flows): RBI के मास्टर सर्कुलर के अनुसार, मृत व्यक्ति के खाते में आने वाले ‘पाइपलाइन फ्लो’ (जैसे चेक) को बैंक द्वारा ‘खाताधारक मृत’ (Account Holder Deceased) की टिप्पणी के साथ वापस (Return) कर दिया जाना चाहिए, न कि ‘अपर्याप्त निधि’ (Insufficient Funds) के मेमो के साथ。
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## 2. धारा 138 NI Act के तहत तकनीकी खामी (Technical Loopholes in the Case)
धारा 138 के तहत अपराध के गठन के लिए ‘वैध रूप से लागू करने योग्य ऋण’ (Legally Enforceable Debt) और वैध बैंकिंग प्रक्रिया का होना अनिवार्य है।
* अवैध रिटर्न मेमो (Invalid Return Memo): यदि चेक दिनांक 16/04/2025 को पेश किया गया, जबकि खाताधारक की मृत्यु 22/03/2025 को हो चुकी थी, तो वह खाता कानूनी रूप से अस्तित्व में ही नहीं था। गलत प्रक्रिया अपनाकर लिया गया ‘फंड्स इनसफिशिएंट’ का मेमो इस केस की बुनियादी नींव (Cause of Action) को ही दूषित कर देता है।
* लेनदेन की अज्ञानता (Lack of Personal Knowledge): चूंकि ऋण ‘अज्ञात दिनांक’ को दिया गया था, इसलिए मृतक के परिजनों को इस कथित ऋण के बारे में कोई व्यक्तिगत जानकारी (Personal Knowledge) नहीं है। साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) के तहत ऐसी गवाही ‘अनुश्रुत साक्ष्य’ (Hearsay Evidence) मानी जाती है, जिसकी अदालत में कोई विधिक मान्यता नहीं होती।
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## 3. आरोपी पक्ष के पास उपलब्ध विकल्प और बचाव के रास्ते (Defence Strategies for Accused)
जिला न्यायालय बैतूल के न्यायालयों में इस तरह के मामलों में आरोपी निम्नलिखित विधिक विकल्पों और बचाव की रणनीतियों (Strategy) का उपयोग कर सकता है:
## A. शुरुआती स्तर पर विकल्प (Quashing and Pre-trial Options):
1. उन्मोचन आवेदन (Application for Discharge/Acquittal): आरोपी समन जारी होने के बाद धारा 251 CrPC / संबंधित नए नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों के तहत न्यायालय के समक्ष तर्क दे सकता है कि परिवाद पत्र में अपराध का कोई ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) मामला नहीं बनता, क्योंकि चेक प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया ही पूरी तरह गैर-कानूनी थी।
## B. मुख्य परीक्षण (Cross-Examination) के दौरान बचाव के रास्ते:
1. बैंकिंग गवाह को समन करना (Summoning Bank Witness): आरोपी को रक्षा साक्ष्य (Defence Evidence) के स्तर पर मृतक के बैंक मैनेजर को कोर्ट में समन करना चाहिए। बैंक रिकॉर्ड से यह साबित कराएं कि शिकायतकर्ताओं ने जानबूझकर बैंक से मृत्यु प्रमाण पत्र छुपाया ताकि वे चेक लगा सकें।
2. ऋण के अस्तित्व को चुनौती (Challenging the Debt): सुप्रीम कोर्ट के ‘रंगप्पा बनाम मोहन’ (Rangappa vs Mohan) मामले के अनुसार, आरोपी को केवल एक ‘संभावित बचाव’ (Probable Defence) स्थापित करना होता है। परिवाद में ‘अज्ञात दिनांक’ का होना आरोपी के लिए वरदान है। जिरह में यह स्थापित करें कि जब ऋण की कोई तारीख, गवाह या आईटीआर (ITR) एंट्री ही नहीं है, तो धारा 139 की विधिक उपधारणा (Presumption) स्वतः समाप्त हो जाती है।
3. उत्तराधिकार पर कानूनी सवाल: शिकायतकर्ताओं से जिरह के दौरान पूछें कि क्या उनके पास इस ऋण की वसूली के लिए सक्षम सिविल कोर्ट से [उत्तराधिकार प्रमाण पत्र (Succession Certificate)] प्राप्त है? इसके अभाव में आपराधिक कोर्ट के जरिए सीधे रिकवरी का प्रयास संदिग्ध हो जाता है।
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## निष्कर्ष (Conclusion)
कानून हमेशा न्याय और सही प्रक्रिया का समर्थन करता है। पेई की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारियों को अधिकार जरूर मिलते हैं, लेकिन वे बैंकिंग कानूनों को ताक पर रखकर मृत खाते का अवैध संचालन नहीं कर सकते। यदि जिला न्यायालय में ऐसा कोई मुकदमा विचाराधीन है, तो आरोपी पक्ष पूरी मजबूती से ऊपर दी गई आरबीआई की गाइडलाइंस और बैंकिंग अनियमितताओं को अपना मुख्य ढाल (Shield) बनाकर बाइज्जत बरी (Acquittal) हो सक





