
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में दिए गए कई महत्वपूर्ण फैसलों में हिंदू संयुक्त परिवार (HUF) और पैतृक संपत्ति की बिक्री को लेकर स्पष्ट व्यवस्था दी है। कोर्ट ने दोहराया है कि *कर्ता (Karta)* संयुक्त परिवार की संपत्ति को मनमाने ढंग से किसी को भी नहीं बेच सकता। खासकर परिवार के बाहर बिक्री तभी वैध मानी जाएगी जब वह *कानूनी आवश्यकता (legal necessity)* या संपत्ति के हित में साबित हो। अन्यथा अन्य सहभागी (coparceners) उसे चुनौती दे सकते हैं और बिक्री अवैध घोषित हो सकती है।
### मुख्य कानूनी स्थिति (2026 के फैसलों के आधार पर)
– *कर्ता की शक्ति सीमित है*: हिंदू कानून के तहत कर्ता परिवार की संयुक्त संपत्ति का प्रबंधक है, पूर्ण मालिक नहीं। वह संपत्ति तभी बेच या हस्तांतरित कर सकता है जब:
– परिवार की कानूनी आवश्यकता (जैसे कर्ज चुकाना, बेटी की शादी का खर्च, शिक्षा, बीमारी आदि) हो, या
– संपत्ति के बेहतर प्रबंधन/लाभ के लिए हो।
बिना इन आधारों के बिक्री अन्य सदस्यों के हितों को बांधती नहीं है।
– *परिवार के एक सदस्य को या बाहर बेचना: यदि कर्ता संपत्ति को सिर्फ एक बेटे/रिश्तेदार को दे दे और अन्य को छोड़ दे, या परिवार के बाहर बेच दे, तो खरीदार/प्राप्तकर्ता को **कानूनी आवश्यकता साबित करनी पड़ती है*। सामान्य या अस्पष्ट कारण पर्याप्त नहीं। 5 फरवरी 2026 के फैसले (मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए) में सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे सेल डीड को अवैध माना जहां आवश्यकता साबित नहीं हुई।
– *बंटवारे के बाद स्थिति अलग: यदि संपत्ति का बंटवारा हो चुका है और प्रत्येक का हिस्सा अलग-अलग हो गया है, तो वह हिस्सा **स्व-अर्जित* माना जाता है। उस स्थिति में व्यक्ति अपने हिस्से को परिवार के बाहर बेच सकता है। लेकिन अविभाजित संयुक्त संपत्ति में एक व्यक्ति पूरे संपत्ति को नहीं बेच सकता।
– *वारिसों के बीच स्थिति (इंटेस्टेट उत्तराधिकार): हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत जब संपत्ति बिना वसीयत के वारिसों को मिलती है, तो वे **tenants-in-common* होते हैं (जॉइंट फैमिली नहीं)। एक वारिस दूसरे के हिस्से को कर्ता बनकर नहीं बेच सकता। वह सिर्फ अपने हिस्से का ही लेन-देन कर सकता है।
### व्यावहारिक असर
– खरीदारों को सावधानी बरतनी चाहिए। संयुक्त परिवार की संपत्ति खरीदते समय कानूनी आवश्यकता का सबूत और अन्य सदस्यों की सहमति/चुनौती की संभावना जांचें।
– परिवार के सदस्यों के लिए: बिना सहमति या आवश्यकता के बिक्री को अदालत में चुनौती दी जा सकती है।
– यह व्यवस्था परिवार के सदस्यों के अधिकारों की रक्षा करती है और मनमानी बिक्री पर रोक लगाती है।
*नोट*: यह कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है कि परिवार के बाहर बिक्री हमेशा अवैध होगी। यदि कानूनी आवश्यकता साबित हो जाए तो बिक्री वैध रहती है। प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है। संपत्ति विवाद जटिल होते हैं, इसलिए किसी भी लेन-देन से पहले योग्य वकील से सलाह लें।
(समाचार स्रोत: सुप्रीम कोर्ट के 2026 के विभिन्न निर्णयों पर आधारित, जैसे Dorairaj मामले और अन्य संबंधित फैसलों से।)




