
वरिष्ठ अधिवक्ता भरत सेन
कवर स्टोरी: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – वन अधिनियम की धारा 52 के दुरुपयोग पर लगाम, आदिवासी सेल्बेस्टर कूजूर को न्याय की जीत!
**बिलासपुर, 10 दिसंबर 2025 (स्पेशल रिपोर्ट)**
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 52 के तहत जब्ती की प्रक्रिया पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाकर न्याय की नई मिसाल कायम की है। 7 सितंबर 2021 को दिए गए फैसले (सीआरएमपी नंबर 619/2014, सेल्बेस्टर कूजूर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य) में अदालत ने याचिकाकर्ता सेल्बेस्टर कूजूर के खिलाफ दर्ज वन अपराध की कार्यवाही को रद्द कर दिया। कूजूर, जो जशपुर जिले के एक आदिवासी समुदाय से हैं, पर लगाए गए आरोपों को अदालत ने ‘साक्ष्यहीन’ और ‘दुर्भावनापूर्ण’ करार दिया। यह फैसला न केवल व्यक्तिगत राहत है, बल्कि वन क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों पर लगने वाले झूठे वन अपराध मामलों के खिलाफ एक मजबूत संदेश है, जहां अक्सर जब्ती की आड़ में निर्दोषों को फंसाया जाता है।
#### पृष्ठभूमि: एक साधारण आदिवासी की जंग, जो वन कानून के जाल में फंस गई
मामला 2014 का है, जब जशपुर जिले के वन विभाग ने सेल्बेस्टर कूजूर पर भारतीय वन अधिनियम की धारा 52 के तहत कार्रवाई की। आरोप था कि कूजूर ने वन उत्पाद (जैसे लकड़ी या अन्य वन संपदा) का अवैध परिवहन किया, जिसके कारण उनकी संपत्ति (जैसे वाहन या उपकरण) जब्त कर ली गई। धारा 52 वन अपराध में शामिल संपत्ति की जब्ती की अनुमति देती है, जब वन उत्पाद के संबंध में अपराध होने का संदेह हो। कूजूर ने दावा किया कि वे निर्दोष हैं और यह कार्रवाई एक पुराने विवाद से उपजी दुर्भावना का नतीजा है।
एफआईआर दर्ज होने के बाद कूजूर को गिरफ्तारी का डर सता रहा था, और उन्होंने उच्च न्यायालय में सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका दायर की, जिसमें जब्ती रद्द करने और कार्यवाही रोकने की मांग की गई। अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि जब्ती के लिए कोई ठोस कारण या साक्ष्य नहीं था – न तो कोई वन उत्पाद बरामद हुआ, न ही कोई गवाह या मेडिकल/फोरेंसिक प्रमाण। इसके अलावा, वन अधिकारी के बयान में विरोधाभास थे। उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने 7 साल बाद फैसला सुनाया: “धारा 52 का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। जब्ती तभी वैध है जब वन अपराध का स्पष्ट सबूत हो, अन्यथा यह न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
#### धारा 52 की व्याख्या: जब्ती का अधिकार, लेकिन दुरुपयोग पर रोक
फैसले का केंद्र बिंदु भारतीय वन अधिनियम की धारा 52 है, जो कहती है कि “यदि वन उत्पाद के संबंध में अपराध होने का कारण हो, तो संपत्ति जब्त की जा सकती है।” अदालत ने स्पष्ट किया कि “यह धारा वन संरक्षण के लिए है, न कि निर्दोषों को प्रताड़ित करने के लिए। जब्ती के लिए ‘उचित विश्वास’ का आधार होना जरूरी है, जो यहां गायब था।” कूजूर के वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता एक साधारण किसान हैं, जो वन क्षेत्र में रहते हैं, और यह केस उनकी आजीविका को नष्ट कर रहा था।
न्यायमूर्ति ने जोर दिया कि आदिवासी क्षेत्रों में वन अधिकारियों द्वारा धारा 52 का अक्सर दुरुपयोग होता है, जैसे अवैध कटाई या परिवहन के नाम पर। “राज्य को वन संरक्षण और नागरिक अधिकारों में संतुलन बनाना चाहिए,” अदालत ने टिप्पणी की। इस फैसले से कूजूर की जब्त संपत्ति वापस मिली, और उनके खिलाफ कार्यवाही बंद हो गई।
#### आदिवासी अधिकार और वन कानून: व्यापक प्रभाव
यह फैसला छत्तीसगढ़ के वन बहुल इलाकों जैसे जशपुर, सरगुजा और बस्तर के लिए महत्वपूर्ण है, जहां आदिवासी समुदाय वन अधिनियम के तहत अक्सर शिकार बनते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे धारा 52 के दुरुपयोग में कमी आएगी, और वन विभाग को साक्ष्य-आधारित कार्रवाई पर जोर देना पड़ेगा। आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता रामेश्वर कंवर कहते हैं, “यह फैसला वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006 को मजबूत करता है, जो आदिवासियों को वन संसाधनों पर अधिकार देता है। धारा 52 का गलत इस्तेमाल FRA का उल्लंघन है।”
कानूनी विशेषज्ञ डॉ. सुनील तिवारी ने कहा, “सीआरएमपी जैसे प्रावधान न्याय सुनिश्चित करते हैं। यह मिसाल उन मामलों के लिए बनेगा जहां जब्ती बिना आधार के की जाती है।” फैसले के बाद सेल्बेस्टर कूजूर ने कहा, “मैं निर्दोष था, अब न्याय मिला है। यह अन्य आदिवासियों के लिए उम्मीद की किरण है।”
#### मुख्य बिंदु: अदालत की टिप्पणियां
– **धारा 52 का दुरुपयोग:** जब्ती के लिए साक्ष्य जरूरी, दुर्भावना से प्रेरित कार्रवाई रद्द।
– **आदिवासी संरक्षण:** वन क्षेत्रों में निर्दोषों को फंसाने पर रोक, FRA का सम्मान।
– **तत्काल राहत:** याचिकाकर्ता की संपत्ति वापस, जांच बंद।
– **राज्य की जिम्मेदारी:** वन विभाग को उचित प्रक्रिया का पालन करने का निर्देश।
यह कवर स्टोरी न केवल एक फैसले की व्याख्या करती है, बल्कि छत्तीसगढ़ के वन और आदिवासी इलाकों में कानून के दुरुपयोग की चुनौतियों को उजागर करती है। क्या यह फैसला वन अपराधों पर सख्ती बढ़ाएगा या दुरुपयोग रोकेगा? बहस जारी है।