
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
# परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881: चेक बाउंस मामलों में आरोपी के लिए मार्गदर्शन
परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) भारत में चेक, प्रॉमिसरी नोट और बिल ऑफ एक्सचेंज जैसे वित्तीय दस्तावेजों को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण कानून है। इस अधिनियम की धारा 138 विशेष रूप से चेक बाउंस (चेक अनादरण) के मामलों से संबंधित है, जहां चेक जारीकर्ता को दंडित किया जा सकता है यदि चेक पर्याप्त धनराशि की कमी या अन्य कारणों से लौटा दिया जाता है। यह अधिनियम व्यापारिक लेन-देन को सुगम बनाने के लिए बनाया गया था, लेकिन आजकल इसका दुरुपयोग ऋण वसूली के लिए किया जा रहा है, विशेषकर सरकारी बैंक, फाइनेंस कंपनियां और कोऑपरेटिव सोसाइटियां द्वारा। इस लेख में हम चेक बाउंस मामलों में आरोपी (ऋणी) को मार्गदर्शन प्रदान करेंगे, ताकि वे अपने अधिकारों को समझ सकें और उचित बचाव कर सकें। ध्यान दें कि यह सामान्य जानकारी है; व्यक्तिगत मामलों के लिए योग्य वकील से सलाह लें।
## चेक बाउंस कानून का पृष्ठभूमि और दुरुपयोग
परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 138 के तहत, यदि कोई चेक पर्याप्त धनराशि की कमी के कारण बाउंस होता है, तो चेक प्राप्तकर्ता (पेमेंट लेने वाला) मांग सूचना पत्र (डिमांड नोटिस) भेज सकता है। यदि 15 दिनों में भुगतान नहीं होता, तो वह अदालत में शिकायत दर्ज करा सकता है। आरोपी को दो साल तक की जेल या जुर्माना (चेक राशि का दोगुना) हो सकता है।
हालांकि, इस कानून का मूल उद्देश्य व्यापारिक लेन-देन में विश्वास बनाए रखना था, न कि ऋण वसूली। सरकारी बैंक, फाइनेंस कंपनियां और कोऑपरेटिव सोसाइटियां अक्सर ऋण देते समय रिक्त (ब्लैंक) चेक सुरक्षा के रूप में ले लेती हैं। यदि ईएमआई (मासिक किश्त) में चूक होती है, तो वे चेक भरकर बाउंस करवाती हैं और मुकदमा दायर कर देती हैं। यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है: जो व्यक्ति मासिक ईएमआई नहीं चुका सकता, वह लाखों रुपये का चेक कैसे जारी कर सकता है? क्या यह कानून आर्थिक मंदी या अन्य कारणों से बर्बाद हो चुके ऋणियों को जेल भेजने के लिए बनाया गया है?
वास्तव में, चेक बाउंस कानून ऋण वसूली का साधन नहीं है। बैंक और वित्तीय संस्थाओं को ईएमआई वसूली के लिए पेमेंट एंड सेटलमेंट एक्ट 2007 के तहत कार्रवाई करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि सुरक्षा के रूप में लिए गए ब्लैंक चेक पर धारा 138 लागू नहीं होती, यदि यह साबित हो कि चेक ऋण के बदले नहीं जारी किया गया था।
## आरोपी के लिए उपलब्ध बचाव के उपाय
अधिनियम में आरोपी के लिए पर्याप्त बचाव की व्यवस्था है। आरोपी को निर्दोष साबित करने का बोझ होता है, लेकिन यह दस्तावेजों और सबूतों पर आधारित होता है। यहां कुछ प्रमुख कदम दिए गए हैं:
### 1. मांग सूचना पत्र (डिमांड नोटिस) का जवाब दें
– यदि बैंक या फाइनेंस कंपनी ने वकील के माध्यम से नोटिस भेजा है, तो इसका जवाब जरूर दें। जवाब में स्पष्ट करें कि चेक कब, कहां और क्यों जारी किया गया था।
– जवाब देने से पहले:
– अपना बैंक स्टेटमेंट चेक करें।
– ऋण प्रदान करने वाली संस्था से ऋण खाते का स्टेटमेंट और अनुबंध पत्र मांगें।
– पिछले 10 वर्षों के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का अध्ययन करें (जैसे, सुप्रीम कोर्ट का फैसला कि ब्लैंक चेक पर धारा 138 लागू नहीं यदि यह सुरक्षा के लिए लिया गया हो)।
– सटीक जवाब के लिए आपके पास स्वयं का बैंक स्टेटमेंट, ऋण स्टेटमेंट और अनुबंध पत्र होना चाहिए। इससे आप साबित कर सकते हैं कि चेक ऋण के बदले नहीं था या राशि गलत भरी गई है।
### 2. योग्य वकील का चयन करें
– सबसे बड़ी गलती: सामान्य सिविल, राजस्व या क्रिमिनल वकील को चुनना। चेक बाउंस मामले विशेष होते हैं, जहां बचाव दस्तावेजों पर आधारित होता है।
– चुनें: परक्राम्य लिखत अधिनियम के विशेषज्ञ वकील, जो आरोपी पक्ष की पैरवी में अभ्यस्त हों। ऐसे वकील मिलना कठिन है, लेकिन आवश्यक है।
– फोकस: जमानत पर नहीं, दोषमुक्ति पर। जमानत आसानी से मिल जाती है, लेकिन दोषमुक्ति के लिए विशेष रणनीति चाहिए।
– विशेषज्ञ वकील लिखित तर्क (Written Arguments) प्रस्तुत करते हैं, जो सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों पर आधारित होते हैं। उनकी विधिक भाषा और लेखन शैली विशिष्ट होती है।
### 3. अदालती प्रक्रिया में बचाव की रणनीति
– **प्रतिपरीक्षण (Cross-Examination):** यह सामान्य क्रिमिनल मामलों की तरह नहीं होता। बचाव पक्ष दस्तावेजों को प्रमाणित करने और संभाव्य प्रतिरक्षा (Probable Defence) स्थापित करने के लिए प्रतिपरीक्षण करता है।
– आरोपी को अपना बचाव प्रमाणित करना होता है। सर्वोत्तम बचाव दस्तावेजों (जैसे बैंक स्टेटमेंट, अनुबंध) पर आधारित होता है।
– सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दें, जैसे:
– चेक यदि सुरक्षा के लिए लिया गया हो, तो धारा 138 लागू नहीं (इंद्रजीत सिंह बनाम पंजाब नेशनल बैंक, 2013)।
– यदि चेक ब्लैंक था और बाद में भरा गया, तो आरोपी निर्दोष (अपर्णा ए. शाह बनाम शेटकास्ट इंजीनियरिंग, 2013)।
– बैंक की ओर से विशेषज्ञ वकील होते हैं, इसलिए आरोपी को भी विशेषज्ञ चुनना चाहिए ताकि समान स्तर पर लड़ाई हो।
## महत्वपूर्ण सलाह और सावधानियां
– **ऋण वसूली का गलत उपयोग न होने दें:** यदि मामला केवल ऋण वसूली का है, तो अदालत में यह तर्क दें कि धारा 138 का दुरुपयोग हो रहा है। कई हाईकोर्ट फैसलों में ऐसे मामले खारिज किए गए हैं।
– **समय सीमा का ध्यान रखें:** नोटिस मिलने पर 30 दिनों में शिकायत दर्ज होनी चाहिए। यदि देरी हो, तो बचाव का आधार बन सकता है।
– **दस्तावेजों की तैयारी:** हमेशा बैंक स्टेटमेंट, ऋण अनुबंध और चेक जारी करने के प्रमाण रखें।
– **नैतिक पक्ष:** यह कानून व्यापारियों की रक्षा के लिए है, न कि ऋणियों को सताने के लिए। यदि आप आर्थिक संकट में हैं, तो कानूनी सहायता लें और समझौता (Settlement) का प्रयास करें।
निष्कर्षतः, परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 एक शक्तिशाली कानून है, लेकिन इसमें आरोपी के लिए न्यायपूर्ण बचाव की गुंजाइश है। सही जानकारी, दस्तावेज और विशेषज्ञ वकील से आप दोषमुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप चेक बाउंस मामले में फंसे हैं, तो तुरंत योग्य वकील से संपर्क करें और अपने अधिकारों का उपयोग करें। याद रखें, कानून न्याय के लिए है, दुरुपयोग के लिए नहीं।
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