
वरिष्ठ अधिवक्ता भरत सेन
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो जाति प्रमाणपत्र और आरक्षण की दिशा में एक नया मानदंड स्थापित कर सकता है। इस फैसले के अनुसार, यदि भविष्य में यह सिद्ध हो जाता है कि उच्च जाति के पुरुष और अनुसूचित जाति की महिला से जन्मी बच्ची सामाजिक और कानूनी रूप से अनुसूचित जाति का हिस्सा है, तो वह एससी प्रमाणपत्र पाने की पात्र होगी।
यह निर्णय सामाजिक न्याय और समानता के महत्व को ध्यान में रखते हुए आया है। अदालत ने कहा है कि जाति प्रमाण-पत्र जारी करने में केवल पिता की जाति को मान्यता देना पर्याप्त नहीं हो सकता, खासकर ऐसे परिवारों में जहाँ माता अनुसूचित जाति से आती हैं। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि जाति के निर्धारण में मातृ पक्ष के सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत के इस फैसले का अर्थ है कि उच्च जाति के पिता और अनुसूचित जाति की मां की संतान, चाहे वह लड़की हो या लड़का, एससी प्रमाणपत्र के लिए आवेदन कर सकती है, जिससे उन्हें आरक्षण का लाभ मिलेगा। इससे ऐसे विभिन्न परिवारों के बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा होगी, जिन्होंने वर्तमान व्यवस्था में अपनी जाति के कारण आरक्षण के लाभ नहीं प्राप्त कर पा रहे थे।
यह निर्णय शिक्षा, सरकारी नौकरियों और अन्य सामाजिक कल्याण योजनाओं में अनुसूचित जाति के लाभों को अधिक न्यायसंगत ढंग से प्रदान करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस फैसले से जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता को कम करने में मदद मिलेगी।
सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार संगठन भी इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं और इसे दलित महिलाओं के उत्पीड़न के विरुद्ध एक न्यायपूर्ण कदम बता रहे हैं।
अभी इस फैसले के आधार और विस्तृत कानूनी प्रक्रियाओं पर काम जारी है, और आने वाले समय में उच्च न्यायालयों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इस दिशानिर्देश को लागू करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं।