
वरिष्ठ अधिवक्ता भरत सेन
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को शादी के उपहारों की वापसी का हक, 1986 के मुस्लिम महिला कानून के तहत
**नई दिल्ली, 10 दिसंबर 2025 (स्पेशल रिपोर्ट)**: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को मजबूत करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत तलाकशुदा महिलाओं को शादी के समय उनके माता-पिता द्वारा दिए गए नकद, सोना या अन्य उपहारों को पति से वापस प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है। यह फैसला न केवल महिलाओं की गरिमा को बहाल करता है, बल्कि तलाक के बाद उनकी आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।
#### मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला रौसनारा बेगम बनाम उनके पूर्व पति के मामले में आया, जहां शादी 2005 में हुई थी, लेकिन 2009 में दोनों अलग हो गए और 2011 में तलाक हो गया। रौसनारा ने कोलकाता हाईकोर्ट में धारा 3 के तहत याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने शादी के रजिस्टर में दर्ज 17.67 लाख रुपये की राशि की वापसी की मांग की। इसमें 7 लाख रुपये नकद और 30 भोरी (लगभग 330 ग्राम) सोना शामिल था, जो उनके पिता द्वारा दूल्हे को उपहार के रूप में दिया गया था।
हाईकोर्ट ने इस दावे को मात्र सिविल विवाद मानते हुए खारिज कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ—जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह—ने इसे पलट दिया। अदालत ने कहा कि 1986 का अधिनियम महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है, और इसे संकीर्ण व्याख्या नहीं दी जा सकती। धारा 3(1)(द) के अनुसार, शादी से पहले, दौरान या बाद में महिलाओं को दिए गए किसी भी संपत्ति या उपहार पर उनका अधिकार सुरक्षित रहता है।
#### सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
अदालत ने अपने फैसले में जोर दिया कि ये उपहार महिलाओं के भविष्य की सुरक्षा के लिए दिए जाते हैं, और तलाक के बाद इन्हें वापस न लौटाना अधिनियम के उद्देश्य के विरुद्ध है। जस्टिस करोल ने कहा, “यह कानून महिलाओं की गरिमा, स्वायत्तता और आर्थिक स्थिरता को सुनिश्चित करने के लिए है। कोर्ट को ऐसी व्याख्या करनी चाहिए जो इस सामाजिक उद्देश्य को पूरा करे।” अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए पूर्व पति को उपहार लौटाने का आदेश दिया।
यह फैसला 1939 के मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम से लेकर 2019 के मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम तक के कानूनी विकास की कड़ी का हिस्सा है, जो मुस्लिम महिलाओं को समानता और सम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करने की दिशा में एक कदम है।

महिला अधिकार कार्यकर्ता रिजवाना खान
विशेषज्ञों की राय
महिला अधिकार कार्यकर्ता रिजवाना खान, जो मध्य प्रदेश राज्य के जिला बैतूल से हैं, ने इस फैसले को “मुस्लिम महिलाओं के लिए क्रांतिकारी कदम” बताया। उन्होंने कहा, “यह फैसला न केवल आर्थिक न्याय देता है, बल्कि साबित करता है कि व्यक्तिगत कानूनों में भी महिलाओं के हक को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह तलाकशुदा महिलाओं को सशक्त बनाएगा और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ेगा।” कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इससे देशभर में सैकड़ों मामले प्रभावित होंगे, और तलाकशुदा महिलाएं अब बिना हिचकिचाहट अपने हक के लिए कोर्ट जा सकेंगी।
#### व्यापक प्रभाव
यह फैसला मुस्लिम समुदाय में शादी के रीति-रिवाजों पर भी सवाल खड़े करता है, जहां दहेज या उपहार प्रथा आम है। सरकार और सामाजिक संगठनों को अब जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है ताकि महिलाएं अपने अधिकारों से अवगत हों। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला अन्य समुदायों के लिए भी नजीर बन सकता है, जहां तलाक के बाद संपत्ति के बंटवारे में महिलाओं को अक्सर नुकसान होता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा, जो सुनिश्चित करेगा कि तलाक कोई अभिशाप न बने। अधिक जानकारी के लिए अधिनियम की धारा 3 का अध्ययन करें या कानूनी सलाह लें।
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