
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: आरक्षित वर्ग के मेरिटोरियस उम्मीदवारों को जनरल कैटेगरी की सीटें मिलेंगी, आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव
**नई दिल्ली, 05 जनवरी 2026**: सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के उम्मीदवार सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के कट-ऑफ अंकों से अधिक अंक प्राप्त करते हैं, तो उन्हें जनरल कैटेगरी की सीटों पर नियुक्ति या प्रवेश का पूर्ण अधिकार होगा। इसका मतलब है कि ऐसे मेरिटोरियस उम्मीदवारों को उनकी आरक्षित सीट के अलावा जनरल सीट पर भी विचार किया जाएगा।
यह फैसला सरकारी नौकरियों, केंद्रीय सेवाओं (UPSC, SSC आदि), सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सरकारी शिक्षण संस्थानों (IIT, IIM, मेडिकल कॉलेज आदि) में चयन प्रक्रिया को गहराई से प्रभावित करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आरक्षण का उद्देश्य मजबूत होगा और वास्तव में योग्य उम्मीदवारों को दोहरा लाभ मिलने की बजाय अधिक अवसर प्राप्त होंगे।
**केस विवरण**
**केस का नाम**: जनहित अभियान बनाम भारत संघ एवं अन्य
**केस नंबर**: रिट पिटिशन (सिविल) नंबर 1248/2023
**खंडपीठ**: मुख्य न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ (न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, बी.आर. गवई, सूर्य कांत एवं जे.बी. पारदीवाला)
**फैसले की तारीख**: 03 जनवरी 2026
#### मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला विभिन्न राज्यों और केंद्र सरकार की भर्ती प्रक्रियाओं में आरक्षण के कार्यान्वयन को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का समूह था। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि कई भर्ती प्रक्रियाओं में आरक्षित वर्ग के ऐसे उम्मीदवार जो जनरल मेरिट में आते हैं, उन्हें केवल आरक्षित कोटे में ही समायोजित किया जाता है, जिससे जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों के अवसर कम हो जाते हैं और आरक्षण की 50% सीमा का उल्लंघन होता है।
इससे पहले इंद्रा साहनी (1992), जर्नलिस्ट कुमार जैन (2022) और अन्य फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने “मेरिटोरियस रिजर्व्ड कैंडिडेट्स” को जनरल कैटेगरी में समायोजित करने का सिद्धांत स्थापित किया था, लेकिन विभिन्न राज्यों और संस्थानों में इसका एकसमान कार्यान्वयन नहीं हो रहा था। EWS कोटे (2019 से लागू) के मामले में भी असमंजस था।
#### सुप्रीम कोर्ट का फैसला और मुख्य टिप्पणियां
संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए निम्नलिखित प्रमुख बिंदु स्पष्ट किए:
1. **मेरिट पर जनरल सीट का अधिकार**:
यदि कोई SC/ST/OBC/EWS उम्मीदवार जनरल कैटेगरी के निर्धारित कट-ऑफ अंकों से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे “अपनी मेरिट” (own merit) पर जनरल कैटेगरी की सीट आवंटित की जाएगी। उसे आरक्षित कोटे का लाभ अलग से नहीं मिलेगा, बल्कि उसकी आरक्षित सीट अगले योग्य आरक्षित उम्मीदवार को जाएगी। इससे आरक्षण की कुल 50% सीमा का उल्लंघन नहीं होगा।
2. **समान अवसर और सामाजिक न्याय**:
कोर्ट ने कहा कि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करना है, न कि मेरिटोरियस उम्मीदवारों को दंडित करना। पीठ ने टिप्पणी की:
> “आरक्षण एक सक्षम उपकरण है, लेकिन यह मेरिट को कुचलने का माध्यम नहीं बन सकता। ऐसे उम्मीदवार जो बिना किसी छूट के जनरल मेरिट में आते हैं, उन्हें जनरल कैटेगरी में समायोजित करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के समानता के सिद्धांत के अनुरूप है।”
3. **EWS कोटे पर स्पष्टता**:
पहली बार EWS उम्मीदवारों के लिए भी यही नियम लागू किया गया। कोर्ट ने कहा कि EWS भी अन्य आरक्षित वर्गों की तरह ही मेरिटोरियस उम्मीदवारों को जनरल सीट पर समायोजित किया जाएगा।
4. **राज्यों और संस्थानों के लिए निर्देश**:
सभी भर्ती एजेंसियों (UPSC, राज्य PSC, SSC, NEET, JEE आदि) को इस फैसले के अनुसार चयन सूची तैयार करने के निर्देश दिए गए। पुरानी भर्तियों में जहां गलती हुई है, वहां सुधार के लिए तीन महीने की समय-सीमा दी गई।
#### फैसले का दूरगामी असर
– **सकारात्मक प्रभाव**: आरक्षित वर्ग के योग्य उम्मीदवारों को अधिक अवसर मिलेंगे। जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों को भी न्याय मिलेगा क्योंकि आरक्षण की सीमा प्रभावी रूप से बनी रहेगी।
– **चुनौतियां**: कुछ राज्यों में जहां आरक्षण 50% से अधिक है, वहां अतिरिक्त समायोजन की समस्या हो सकती है। सामाजिक संगठनों ने इसे “क्रिमी लेयर” को लाभ पहुंचाने वाला बताया है।
– **राजनीतिक प्रतिक्रियाएं**: विपक्षी दलों ने इसे आरक्षण विरोधी करार दिया, जबकि सरकार ने सामाजिक न्याय को मजबूत करने वाला फैसला बताया। दलित और पिछड़ा वर्ग के संगठनों में मिश्रित प्रतिक्रिया है—कुछ ने स्वागत किया, कुछ ने creamy layer अलग करने की मांग की।
यह फैसला आरक्षण व्यवस्था में पारदर्शिता और मेरिट को बढ़ावा देने की दिशा में एक मजबूत कदम है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे सरकारी सेवाओं में गुणवत्ता बढ़ेगी और सामाजिक समानता का संतुलन बना रहेगा।
(स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का पूर्ण फैसला, दिनांक 03 जनवरी 2026)