
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
*नई दिल्ली, 19 जनवरी 2026:* भारत की सर्वोच्च अदालत ने आर्बिट्रेशन और कंसीलियेशन एक्ट, 1996 के तहत न्यायिक हस्तक्षेप की सीमित दायरे को एक बार फिर रेखांकित करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। मामले में, रामेश कुमार जैन बनाम भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बाल्को) (2025 INSC 1457) में, सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए आर्बिट्रल अवार्ड को बहाल कर दिया। यह फैसला 18 दिसंबर 2025 को जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजरिया की डिवीजन बेंच द्वारा सुनाया गया, जिसमें आर्बिट्रेशन अवार्ड को केवल ‘पेटेंट इललीगैलिटी’ (स्पष्ट अवैधता) के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है, इस पर जोर दिया गया।
#### मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बाल्को कंपनी द्वारा जारी की गई एक टेंडर से शुरू हुआ, जिसमें माइनिंग और बॉक्साइट के परिवहन के लिए बोलियां आमंत्रित की गई थीं। बाल्को, जो वेदांता ग्रुप की एक इकाई है, ने माइनपत खदानों से कोरबा स्थित अपने एल्यूमिना प्लांट तक 3,70,000 मीट्रिक टन (एमटी) बॉक्साइट की माइनिंग और ट्रांसपोर्टेशन के लिए टेंडर निकाला। रामेश कुमार जैन ने सबसे कम बोली लगाई- 697 रुपये प्रति एमटी। बातचीत के बाद, यह दर 634.20 रुपये प्रति एमटी पर तय हुई और अनुबंध 2,22,000 एमटी के लिए 11 दिसंबर 1999 को हस्ताक्षरित हुआ। कार्य की समयसीमा 18 महीने थी, यानी मई 2001 तक, लेकिन इसे सितंबर 2001 तक बढ़ाया गया।
अनुबंधित मात्रा पूरी होने के बाद, बाल्को ने 5 जनवरी 2002 को जैन से अतिरिक्त कार्य जारी रखने का अनुरोध किया। कंपनी ने कहा कि अतिरिक्त कार्य की दर बाद में आपसी सहमति से तय की जाएगी। जैन ने सहमति दी और जून 2001 से मार्च 2002 तक अतिरिक्त 1,95,000 एमटी बॉक्साइट की सप्लाई की। हालांकि, अतिरिक्त कार्य के भुगतान पर विवाद हो गया। जैन ने दावा किया कि अतिरिक्त कार्य के लिए उचित मुआवजा मिलना चाहिए, जबकि बाल्को ने अनुबंध की दर पर ही भुगतान करने से इनकार कर दिया।
#### आर्बिट्रेशन और निचली अदालतों का सफर
विवाद बढ़ने पर, जैन ने आर्बिट्रेशन क्लॉज का उपयोग किया और हाईकोर्ट में सेक्शन 11(6) के तहत आवेदन दाखिल किया। हाईकोर्ट ने 12 अप्रैल 2007 को एकमात्र आर्बिट्रेटर की नियुक्ति की। आर्बिट्रेटर ने 15 जुलाई 2012 को फैसला सुनाया, जिसमें जैन को कुल 3,71,80,584 रुपये (अतिरिक्त कार्य, ट्रकों की संख्या पर प्रतिबंध, और अन्य दावों के लिए) प्लस वैधानिक ब्याज प्रदान किया गया। आर्बिट्रेटर ने इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 की सेक्शन 70 (क्वांटम मेरुइट) का उपयोग करते हुए कहा कि जहां अनुबंध में दर तय नहीं है, वहां लाभ उठाने वाले को उचित मुआवजा देना पड़ता है, ताकि अनुचित संवर्धन न हो।
बाल्को ने सेक्शन 34 के तहत कमर्शियल कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने 2 जनवरी 2017 को अवार्ड को बरकरार रखा। बाल्को ने सेक्शन 37 के तहत हाईकोर्ट में अपील की, जहां 3 मई 2023 को अवार्ड को रद्द कर दिया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेटर ने अनुबंध को ‘राइटिंग’ किया और फैक्ट्स की गलत व्याख्या की, जो पेटेंट इललीगैलिटी है।
#### सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार की और हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा:
– आर्बिट्रेशन एक्ट में न्यायिक हस्तक्षेप न्यूनतम है (सेक्शन 5)। सेक्शन 34 और 37 के तहत केवल स्पष्ट आधारों पर हस्तक्षेप संभव है, जैसे पब्लिक पॉलिसी के खिलाफ होना या पेटेंट इललीगैलिटी।
– सेक्शन 37 की अपील सेक्शन 34 की सीमाओं से अधिक नहीं हो सकती। कोर्ट अपील में फैक्ट्स या लॉ की पुन: जांच नहीं कर सकता।
– पेटेंट इललीगैलिटी का मतलब स्पष्ट, जड़ तक जाने वाली अवैधता है, जैसे अनुबंध की शर्तों के खिलाफ जाना या सबूतों का पूर्ण अभाव। लेकिन ‘गलत लॉ का एप्लीकेशन’ या ‘सबूतों की पुन: सराहना’ इसमें नहीं आता।
– इस मामले में, आर्बिट्रेटर ने क्वांटम मेरुइट का सही उपयोग किया, क्योंकि अनुबंध में अतिरिक्त कार्य की दर तय नहीं थी। यह अनुबंध को बदलना नहीं, बल्कि खाली जगह भरना है ताकि बाल्को अनुचित लाभ न उठाए।
– आर्बिट्रेटर सबूतों का मास्टर है (सेक्शन 19)। अवार्ड में ‘कुछ’ सबूत होने पर हस्तक्षेप नहीं। यहां अवार्ड में तर्कसंगत निष्कर्ष है, कोई विकृति नहीं।
कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपनी व्याख्या थोपकर सेक्शन 37 की सीमाएं लांघीं। इसलिए, कमर्शियल कोर्ट का फैसला बहाल किया गया।
#### फैसले का प्रभाव
यह फैसला आर्बिट्रेशन को मजबूत करता है, जो व्यावसायिक विवादों के तेज निपटारे के लिए महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अदालतें आर्बिट्रल अवार्ड में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचेंगी, जिससे निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा। बाल्को जैसे बड़े कॉर्पोरेट्स को भी याद दिलाया गया कि अतिरिक्त कार्य के लिए उचित भुगतान जरूरी है।
यह मामला माइनिंग सेक्टर में अनुबंधों की व्याख्या पर भी असर डालेगा, जहां अतिरिक्त कार्य आम हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आर्बिट्रेशन लॉ के विकास में मील का पत्थर साबित होगा।
### फैसले की व्याख्या: विशेषज्ञ भारत सेन, एडवोकेट की राय
भारत सेन, एक वरिष्ठ एडवोकेट और आर्बिट्रेशन लॉ के विशेषज्ञ (BETUL आधारित, 20+ वर्षों का अनुभव), ने इस फैसले पर अपनी राय देते हुए कहा: “यह फैसला आर्बिट्रेशन एक्ट के मूल सिद्धांतों की पुष्टि करता है- न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप। सेक्शन 34 और 37 के तहत कोर्ट्स को अपील कोर्ट की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए; वे केवल स्पष्ट अवैधताओं की जांच कर सकते हैं। इस मामले में, हाईकोर्ट ने गलती की जब उसने आर्बिट्रेटर के फैक्ट्स की व्याख्या को पलट दिया। आर्बिट्रेटर ने क्वांटम मेरुइट (सेक्शन 70, कॉन्ट्रैक्ट एक्ट) का सही उपयोग किया, जो तब लागू होता है जब अनुबंध में कोई शर्त खाली हो और एक पक्ष ने लाभ उठाया हो।
मेरी राय में, यह फैसला ठेकेदारों के लिए राहत है, खासकर माइनिंग और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में, जहां अतिरिक्त कार्य बिना तय दर के होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘पेटेंट इललीगैलिटी’ का मतलब ‘नो एविडेंस’ है, न कि ‘वीक एविडेंस’। अगर आर्बिट्रेटर का तर्क समझ में आता है, तो हस्तक्षेप नहीं। यह भारत के आर्बिट्रेशन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाएगा, क्योंकि निवेशक तेज और अंतिम निपटारे चाहते हैं। हालांकि, पार्टियां अनुबंध में स्पष्ट शर्तें रखें ताकि विवाद कम हों। कुल मिलाकर, यह प्रो-आर्बिट्रेशन फैसला है जो न्यायिक अतिवाद को रोकता है।”



