
ब्यूरो रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों में तेजी से निपटारे के लिए जारी किए नए दिशानिर्देश
**नई दिल्ली, 23 जनवरी 2026:** भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चेक बाउंस मामलों की बड़ी संख्या में लंबित पड़ी शिकायतों को देखते हुए महत्वपूर्ण दिशानिर्देश जारी किए हैं। ये दिशानिर्देश नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत दायर मामलों में समन की सेवा, ऑनलाइन भुगतान सुविधा, प्रक्रियात्मक सुधार और समझौते की प्रक्रिया को सरल बनाने पर केंद्रित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संजबीज तारी बनाम किशोर एस. बोर्कर और अन्य (2025) आईबीसीएलएडॉटइन 385 एससी मामले में ये निर्देश जारी किए, जिसमें कहा गया कि चेक बाउंस के मामलों में सजा का उद्देश्य बदला लेना नहीं, बल्कि धन का भुगतान सुनिश्चित करना और चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, देशभर में चेक बाउंस के लाखों मामले लंबित हैं, और इनमें से अधिकांश में देरी का मुख्य कारण आरोपी को समन की सेवा है। इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य मामलों को तेजी से निपटाना है, ताकि न्यायिक प्रक्रिया अधिक कुशल बने। आइए विस्तार से समझते हैं इन दिशानिर्देशों को और उनकी व्याख्या:
#### 1. **समन की सेवा में सुधार (Service of Summons)**
– **दिशानिर्देश:** धारा 138 के सभी मामलों में समन की सेवा पारंपरिक तरीकों तक सीमित नहीं रहेगी। शिकायतकर्ता को ‘दस्ती’ समन (हाथ से सेवा) भी जारी किया जाएगा, यानी शिकायतकर्ता खुद आरोपी को समन दे सकता है। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से समन की सेवा की जाएगी, जैसे ई-मेल, मोबाइल नंबर या व्हाट्सएप के जरिए। यह भारत नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 64 और 530 के तहत लागू होगा। शिकायत दाखिल करते समय शिकायतकर्ता को आरोपी के ई-मेल, मोबाइल या मैसेजिंग डिटेल्स प्रदान करने होंगे, साथ में एक हलफनामा कि ये डिटेल्स सही हैं।
– **व्याख्या:** यह सुधार इसलिए जरूरी है क्योंकि कई मामले महानगरों में दाखिल होते हैं, जहां आरोपी अन्य जगहों पर रहते हैं। इलेक्ट्रॉनिक सेवा से समय की बचत होगी और देरी कम होगी। अगर शिकायतकर्ता गलत हलफनामा देता है, तो अदालत उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।
#### 2. **समन सेवा का हलफनामा (Affidavit of Service)**
– **दिशानिर्देश:** शिकायतकर्ता को अदालत में समन सेवा का हलफनामा दाखिल करना होगा। अगर यह झूठा पाया गया, तो कानूनी कार्रवाई होगी।
– **व्याख्या:** यह सुनिश्चित करता है कि सेवा की प्रक्रिया पारदर्शी और विश्वसनीय हो, जिससे फर्जी दावों पर रोक लगे।
#### 3. **ऑनलाइन भुगतान सुविधा (Online Payment Facilities)**
– **दिशानिर्देश:** प्रत्येक जिला अदालत के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को समर्पित ऑनलाइन भुगतान सुविधा बनानी होगी, जैसे सुरक्षित क्यूआर कोड या यूपीआई लिंक। समन में स्पष्ट उल्लेख होगा कि आरोपी चेक की राशि शुरुआती चरण में ही ऑनलाइन भुगतान कर सकता है। भुगतान की पुष्टि पर, अदालत धारा 147 एनआई एक्ट या सीआरपीसी की धारा 255/बीएनएसएस की धारा 278 के तहत समझौता या केस बंद करने का आदेश दे सकती है।
– **व्याख्या:** यह समझौते को प्रोत्साहित करता है और मामलों को शुरुआत में ही निपटाने में मदद करता है। इससे अदालतों पर बोझ कम होगा और पीड़ित को जल्दी न्याय मिलेगा।
#### 4. **शिकायत में सारांश फाइलिंग (Filing of Synopsis)**
– **दिशानिर्देश:** हर शिकायत में एक निर्धारित फॉर्मेट में सारांश (synopsis) दाखिल करना होगा, जो इंडेक्स के ठीक बाद रखा जाएगा (एनेक्सर देखें)।
– **व्याख्या:** इससे अदालत को मामले की त्वरित समझ मिलेगी, जिससे प्रक्रिया तेज होगी।
#### 5. **समन जारी करने की आवश्यकता नहीं (No Need for Pre-Cognizance Summons)**
– **दिशानिर्देश:** कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले से सहमत होते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनआई एक्ट विशेष कानून है, इसलिए संज्ञान लेने से पहले (बीएनएसएस की धारा 223) आरोपी को समन जारी करने की जरूरत नहीं।
– **व्याख्या:** यह प्रक्रिया को सरल बनाता है और अनावश्यक देरी रोकता है।
#### 6. **समरी ट्रायल में रूपांतरण (Conversion to Summons Trial)**
– **दिशानिर्देश:** धारा 143 एनआई एक्ट के तहत समरी ट्रायल को प्राथमिकता दी जाए। ट्रायल कोर्ट को रूपांतरण के लिए पर्याप्त कारण रिकॉर्ड करने होंगे। संज्ञान लेने के बाद, अदालत आरोपी से कुछ सवाल पूछ सकती है, जैसे: क्या चेक आपके खाते का है? क्या हस्ताक्षर आपके हैं? क्या आपने चेक जारी किया? क्या आप पर देयता थी? आदि। आरोपी के जवाब रिकॉर्ड कर यह तय किया जाएगा कि मामला समरी ट्रायल के योग्य है या नहीं।
– **व्याख्या:** इससे ट्रायल तेज होगा और अनावश्यक जटिलताएं कम होंगी।
#### 7. **अंतरिम जमा का आदेश (Interim Deposit under Section 143A)**
– **दिशानिर्देश:** जहां उपयुक्त हो, अदालत जल्द से जल्द अंतरिम जमा का आदेश दे सकती है।
– **व्याख्या:** यह आरोपी पर दबाव बनाता है कि वह जल्द भुगतान करे, जिससे समझौता आसान हो।
#### 8. **भौतिक अदालतों में सुनवाई (Physical Courtrooms for Resolution)**
– **दिशानिर्देश:** समन सेवा के बाद मामले भौतिक अदालतों में रखे जाएं, जहां समझौते की संभावना अधिक हो। व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट केवल जरूरी मामलों में दी जाए। समन सेवा से पहले डिजिटल कोर्ट में लिस्टिंग हो सकती है।
– **व्याख्या:** भौतिक अदालतें अनौपचारिक बातचीत को बढ़ावा देती हैं, जिससे समझौते आसान होते हैं।
#### 9. **शाम की अदालतों में सीमा (Evening Courts Jurisdiction)**
– **दिशानिर्देश:** शाम की अदालतों में चेक राशि की सीमा यथार्थवादी होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, दिल्ली में 25,000 रुपये की सीमा बहुत कम है; हाईकोर्ट को इसे बढ़ाना चाहिए।
– **व्याख्या:** इससे छोटे मामलों का तेज निपटारा होगा।
#### 10. **डैशबोर्ड और मॉनिटरिंग (Dashboard and Monitoring)**
– **दिशानिर्देश:** दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के जिला न्यायाधीशों को धारा 138 मामलों का डैशबोर्ड बनाना होगा, जिसमें लंबित मामले, मासिक निपटारा दर, समझौते की प्रतिशतता आदि शामिल हों। मासिक समीक्षा और त्रैमासिक रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेजनी होगी। चीफ जस्टिस को कमेटी गठित कर मॉनिटरिंग करनी होगी, जिसमें अनुभवी मजिस्ट्रेट की नियुक्ति, मध्यस्थता, लोक अदालत आदि शामिल हैं।
– **व्याख्या:** यह प्रणालीगत सुधार सुनिश्चित करता है और लंबित मामलों को ट्रैक करता है।
#### **समझौते के संशोधित दिशानिर्देश (Modified Compounding Guidelines)**
– **दिशानिर्देश:** दामोदर एस. प्रभु मामले (2017) के दिशानिर्देशों को संशोधित किया गया:
– साक्ष्य रिकॉर्डिंग से पहले भुगतान पर कोई जुर्माना नहीं।
– साक्ष्य के बाद लेकिन फैसले से पहले: 5% जुर्माना लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को।
– सेशन कोर्ट या हाईकोर्ट में अपील/रिवीजन में: 7.5% जुर्माना।
– सुप्रीम कोर्ट में: 10% जुर्माना।
– अगर शिकायतकर्ता अधिक मांग करे, तो अदालत आरोपी को दोषी मानने की सलाह दे सकती है और सीआरपीसी/बीएनएसएस या प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट के तहत लाभ दे सकती है।
– **व्याख्या:** ब्याज दरों में कमी को देखते हुए ये बदलाव किए गए हैं। यह समझौते को प्रोत्साहित करता है और मामलों को जल्द निपटाता है।
ये दिशानिर्देश न्यायिक प्रक्रिया को आधुनिक और कुशल बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे चेक की विश्वसनीयता बढ़ेगी और व्यापारिक लेन-देन में विश्वास मजबूत होगा। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्टों को इनका सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा है।






