
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
*नई दिल्ली:* सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में दोहराया है कि अदालतें नियमित जमानत (regular bail) या अग्रिम जमानत (anticipatory bail) देते समय किसी भी आरोपी पर धनराशि जमा करने की शर्त नहीं लगा सकतीं। कोर्ट ने इसे “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” करार देते हुए कहा कि जमानत का फैसला केस के तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए, न कि आरोपी की आर्थिक क्षमता या राशि जमा करने की इच्छा पर।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने एक मामले में की, जिसमें झारखंड हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत देते समय याचिकाकर्ताओं (पिता-पुत्र) पर लगभग 9 लाख 12 हजार 926 रुपये की शेष राशि जमा करने की शर्त लगाई थी। यह राशि एक व्यावसायिक विवाद से जुड़ी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इन आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि यदि आरोपियों की गिरफ्तारी होती है तो उन्हें बिना किसी ऐसी शर्त के जमानत पर रिहा किया जाए।
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा, “यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस कोर्ट द्वारा बार-बार यह कहे जाने के बावजूद कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी राशि के जमा करने से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से 9,12,926.84 रुपये जमा करने को कहा। हमने अपने पिछले फैसले में बिल्कुल साफ किया था कि यदि जमानत देने का मामला बनता है तो अदालत उचित आदेश पारित करे, यदि नहीं बनता तो याचिका खारिज कर दे, लेकिन धनराशि जमा करने जैसी सशर्त आदेश पारित करके विवेकाधिकार का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।”
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्णयों पर आधारित है, जैसे गजानन दत्तात्रेय गोरे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) में, जहां कोर्ट ने कहा था कि जमानत याचिकाओं का निपटारा केवल मेरिट (तथ्यों) पर होना चाहिए, न कि आरोपी द्वारा दिए गए किसी वादे या आर्थिक आश्वासन पर। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसी प्रथा से आपराधिक न्याय प्रणाली प्रभावित हो सकती है और इसका दुरुपयोग निपटारे या समझौते कराने के लिए किया जा सकता है।
यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता (आर्टिकल 21) के अधिकार को मजबूत करता है और स्पष्ट करता है कि जमानत एक अधिकार है, न कि आर्थिक क्षमता पर निर्भर रैनसम (फिरौती)। कोर्ट ने निचली अदालतों और हाईकोर्टों को निर्देश दिया कि वे भविष्य में ऐसी शर्तें लगाने से बचें।
यह फैसला कानूनी विशेषज्ञों और नागरिकों के बीच सराहा जा रहा है, क्योंकि इससे गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर आरोपियों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी।





