
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
*सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: दिल्ली के 51 निजी अस्पतालों को गरीबों के मुफ्त इलाज न देने पर अवमानना नोटिस – क्या है पूरा मामला और आपका क्या अधिकार?*
*नई दिल्ली, 9 मार्च 2026:* सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली के 51 प्रमुख निजी अस्पतालों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के मरीजों को मुफ्त इलाज न देने पर कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने इन अस्पतालों को *अवमानना का नोटिस* जारी किया है। अस्पतालों को कारण बताओ कि कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करने पर उन पर अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए और उन्हें दी गई सरकारी रियायतें (सस्ती जमीन) क्यों न वापस ली जाएं।
यह फैसला गरीबों के स्वास्थ्य अधिकार को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अदालत ने दिल्ली सरकार, दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA), भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) और नगर निगम (MCD) को भी लापरवाही बरतने पर फटकार लगाई। अगली सुनवाई *24 मार्च 2026* को होगी।
### पृष्ठभूमि: सस्ती जमीन के बदले गरीबों का हक
दिल्ली में 1990 के दशक से कई निजी अस्पतालों को सरकारी एजेंसियों (DDA, L&DO, MCD) ने *रियायती दरों* पर जमीन आवंटित की थी। बदले में 2012 की सरकारी नीति और 9 जुलाई 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में साफ शर्त रखी गई थी:
– *OPD (आउट पेशेंट डिपार्टमेंट)* में *25%* मरीजों को *मुफ्त* इलाज और दवाएं।
– *IPD (इन पेशेंट डिपार्टमेंट)* में *10%* बेड *मुफ्त* रखने होंगे।
यह शर्त इसलिए लगाई गई क्योंकि सार्वजनिक संसाधन (जमीन) का इस्तेमाल निजी संस्थान कर रहे थे। इसका मकसद था कि अमीर-गरीब के बीच स्वास्थ्य सेवाओं का फर्क कम हो। 2018 के फैसले में अदालत ने कहा था कि हर अस्पताल को नियमित रिपोर्ट देनी होगी। लेकिन कई अस्पतालों ने इसकी अनदेखी की।
नवंबर 2025 की जांच में *14 अस्पताल* और अक्टूबर-दिसंबर 2025 की जांच में *37 अस्पताल* डिफॉल्टर पाए गए। कुल *51 अस्पताल*। DGHS (निदेशालय स्वास्थ्य सेवाएं) की रिपोर्ट और अस्पतालों की अपनी रिपोर्ट से पता चला कि:
– कई अस्पतालों में OPD में सिर्फ *1-10%* तक ही EWS मरीजों का इलाज हुआ (25% की जगह)।
– IPD में लगभग सभी ने 10% बेड का कोटा पूरा नहीं किया।
### कौन-कौन से अस्पताल शामिल?
सुप्रीम कोर्ट ने 51 अस्पतालों की सूची कोर्ट आदेश में दी है। प्रमुख नामों में शामिल हैं:
– सर गंगा राम अस्पताल
– बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल
– फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंस्टीट्यूट
– मूलचंद खैराती राम अस्पताल
– विमहंस अस्पताल
– मैक्स स्मार्ट अस्पताल
– सेंटर फॉर साइट
– राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर (रोहिणी)
ये सभी अस्पताल सस्ती जमीन लेकर चला रहे हैं, लेकिन गरीब मरीजों का हक नहीं दे रहे।
### कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने साफ कहा – “*सस्ती जमीन तो ले ली, अब गरीबों को मुफ्त इलाज नहीं दे रहे*।” दिल्ली सरकार और जमीन देने वाली एजेंसियों पर भी नाराजगी जताई कि वे “कैजुअली” (लापरवाही से) व्यवहार कर रही हैं। कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई।
अदालत ने दिल्ली के स्वास्थ्य सचिव को *नोडल अधिकारी* नियुक्त किया है। अब वे:
– सभी अस्पतालों को अवमानना नोटिस सर्व करेंगे।
– डिफॉल्टर अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई करेंगे।
– DDA, L&DO और MCD से सहयोग लेंगे।
– हर लापरवाही की रिपोर्ट कोर्ट को देंगे।
दिल्ली सरकार ने हाल ही में (2 जनवरी 2026) EWS की आय सीमा *2.20 लाख* से बढ़ाकर *5 लाख रुपये* सालाना कर दी है, ताकि ज्यादा गरीब परिवार लाभ उठा सकें।
### शिक्षाप्रद पहलू: आपका अधिकार और महत्व
यह मामला सिर्फ अस्पतालों की लापरवाही नहीं, बल्कि *स्वास्थ्य के अधिकार* (अनुच्छेद 21) से जुड़ा है। भारत जैसे देश में जहां महंगे इलाज से लाखों परिवार कंगाल हो जाते हैं, यह नीति गरीबों को अच्छे अस्पतालों में मुफ्त इलाज दिलाने का माध्यम है।
*EWS मरीज कौन है?*
– परिवार की सालाना आय 5 लाख रुपये से कम।
– एसडीएम कार्यालय से *आय प्रमाण पत्र* लें (आसानी से मिल जाता है)।
– अस्पताल में जाकर “EWS कोटा” या “मुफ्त इलाज” बताएं।
*आप कैसे लाभ उठाएं?*
1. अस्पताल में सरकारी लियाजन अधिकारी तैनात हैं – वे मदद करेंगे।
2. अगर मना करें तो स्वास्थ्य विभाग या कोर्ट में शिकायत करें।
3. 2018 के सुप्रीम कोर्ट आदेश के तहत कोई भी EWS मरीज मुफ्त इलाज का हकदार है।
*यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण?*
– निजी अस्पतालों को याद दिलाता है कि *सार्वजनिक हित* सबसे ऊपर है।
– गरीबों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिलेंगी।
– सरकारी एजेंसियों को जवाबदेह बनाता है।
– समाज में स्वास्थ्य न्याय की मिसाल कायम करता है।
### आगे क्या?
24 मार्च को अगली सुनवाई में अस्पतालों को जवाब देना होगा। अगर दोषी पाए गए तो न सिर्फ जुर्माना या सजा हो सकती है, बल्कि रियायती जमीन वापस ली जा सकती है। यह पूरे देश के लिए सबक है – निजी संस्थानों को भी सामाजिक जिम्मेदारी निभानी होगी।
*निष्कर्ष:* सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साबित किया कि कानून सबके लिए बराबर है। गरीबों का स्वास्थ्य कोई charity नहीं, बल्कि *संवैधानिक अधिकार* है। यदि आप या आपके किसी परिचित को मुफ्त इलाज की जरूरत है, तो डरें नहीं – अपना हक मांगें। स्वास्थ्य विभाग की हेल्पलाइन या स्थानीय कोर्ट में संपर्क करें।
यह खबर न सिर्फ समाचार है, बल्कि जागरूकता का माध्यम भी। स्वस्थ समाज तभी बनेगा जब हर व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण इलाज मिले – अमीर हो या गरीब।
(स्रोत: सुप्रीम कोर्ट आदेश, लाइव लॉ, मेडिकल डायलॉग्स और समाचार एजेंसियां – 4 मार्च 2026)





