
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 274: समन मामलों में ‘डिस्चार्ज’ का नया सवेरा
पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 251 के तहत, समन मामलों (जैसे NI Act की धारा 138) में जब अभियुक्त अदालत में पेश होता था, तो मजिस्ट्रेट केवल उसे अपराध का सारांश सुनाता था। अरविंद केजरीवाल बनाम जीएनसीटी दिल्ली (2014) जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि समन मामलों में ‘डिस्चार्ज’ करने की शक्ति मजिस्ट्रेट के पास नहीं है। यदि परिवाद में तकनीकी खामी भी हो, तब भी अभियुक्त को पूरे विचारण (Trial) से गुजरना पड़ता था।
. BNSS की धारा 274: क्या बदलाव आया?
BNSS 2023 की धारा 274 अब मजिस्ट्रेट को यह शक्ति देती है कि यदि वह आरोपों को “निराधार” (Groundless) पाता है, तो वह अभियुक्त को आरोप तय करने के चरण पर ही मुक्त (Discharge) कर सकता है।
* प्रावधान: यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि परिवाद या दस्तावेजों के आधार पर कोई अपराध नहीं बनता, तो वह कारणों को दर्ज करते हुए अभियुक्त को डिस्चार्ज कर देगा। यह प्रावधान अभियुक्त को अनावश्यक और शोषणकारी मुकदमों से बचाने के लिए ‘सुरक्षा कवच’ है।
चेक बाउंस के मामलों में अक्सर ऐसी जटिलताएं होती हैं जहाँ प्रथम दृष्टया अपराध नहीं बनता। धारा 274 के तहत अब निम्नलिखित आधारों पर आवेदन पेश किया जा सकता है:
* तकनीकी दोष: यदि मांग सूचना पत्र (Demand Notice) में चेक नंबर या तारीख गलत है, तो वैधानिक नोटिस की वैधता समाप्त हो जाती है।
* अत्यधिक मांग: यदि नोटिस में चेक राशि से बहुत अधिक राशि की मांग की गई है जो देय नहीं है, तो यह कानूनन गलत है।
* हक का अभाव (Title Dispute): यदि राशि किसी संपत्ति के हक त्याग (Relinquishment) के बदले दी जा रही है, लेकिन वह हक ही विवादित है, तो यह ‘विधिक रूप से प्रवर्तनीय ऋण’ (Legally Enforceable Debt) की श्रेणी में नहीं आता।
* सहकारी संस्थाएं एवं साझेदारी फर्म: जैसा कि उल्लेख किया, यदि सहकारी अधिकरण (Cooperative Tribunal) ने अभी तक ऋण का निर्धारण नहीं किया है या सिविल कोर्ट ने साझेदारी में अंश का निर्धारण नहीं हुआ है, तो आपराधिक न्यायालय सिविल प्रकृति के इन जटिल ‘हक निर्धारण’ (Adjudication of Rights) के कार्यों को नहीं कर सकता।
उच्च न्यायालयों का यह रुख रहा है कि NI Act की धारा 138 केवल ‘ऋण की वसूली’ का जरिया नहीं है, बल्कि यह ‘विश्वास के उल्लंघन’ को दंडित करती है।
* यदि किसी मामले में हक (Title) या साझेदारी के अंश का निर्धारण होना बाकी है, तो मजिस्ट्रेट को धारा 274 के तहत यह विचार करना होगा कि क्या चेक किसी ‘निर्धारित’ ऋण के लिए था या केवल एक सुरक्षा (Security) मात्र था।
* कई मामलों में कोर्ट ने माना है कि “Debt must be due and determined” (ऋण देय और निर्धारित होना चाहिए)। यदि ऋण का अस्तित्व ही सिविल वाद या अधिकरण के निर्णय पर टिका है, तो आपराधिक विचारण समय की बर्बादी है।
कई मामले गलत दर्ज हो जाते हैं जैसा कि परिवाद पत्र के साथ साक्ष्य का शपथ पत्र पेश नहीं किया गया था उसके स्थान पर परिवाद में पैरवी के लिए अधिवक्ता नियुक्ति का शपथ पत्र पेश किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2021 में दिशा निर्देश दिए हैं जिसमें साक्ष्य का शपथ पत्र व अन्य साक्षीगण का शपथ पत्र परिवाद के साथ ही प्रस्तुत किया जाना हैं दूसरे शब्दो में आरोपी को समन किए जाने के पूर्व ही प्रस्तुत किया जाना हैं।
BNSS की धारा 274 न्यायपालिका के बोझ को कम करने और अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा करने के बीच एक संतुलन है। अब अभियुक्त को केवल इसलिए ट्रायल नहीं झेलना पड़ेगा क्योंकि शिकायत दर्ज हो गई है। धारा 138 के मामलों में जहाँ ‘वाद कारण’ (Cause of Action) तकनीकी या कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण है, वहाँ धारा 274 के तहत आवेदन पेश करना एक प्रभावी कानूनी उपचार है।