
– भरत सेन, अधिवक्ता (जिला न्यायालय, बैतुल)
बैतुल। नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत मुकदमा दर्ज होने पर आरोपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती धारा 143-A के तहत लगने वाला ‘अंतरिम मुआवजा’ (Interim Compensation) होता है। इसके तहत कोर्ट आरोपी को आदेश दे सकता है कि वह केस के फैसले से पहले ही चेक राशि का 20% हिस्सा शिकायतकर्ता को भुगतान करे। लेकिन जागरूक कानूनी रणनीति अपनाकर न केवल केस जीता जा सकता है, बल्कि इस 20% के बोझ से भी बचा जा सकता है।
धारा 143-A: अंतरिम मुआवजे से कैसे बचें?
सुप्रीम कोर्ट के नवीनतम दिशा-निर्देशों के अनुसार, 20% अंतरिम मुआवजा देना अनिवार्य (Mandatory) नहीं है, बल्कि यह अदालत के विवेक (Discretionary) पर निर्भर करता है। अधिवक्ता भरत सेन के अनुसार, आरोपी निम्नलिखित आधारों पर कोर्ट में इसका विरोध कर सकता है:
1. प्रथम दृष्टया दोषपूर्ण शिकायत: यदि शिकायत में तकनीकी कमियां हैं (जैसे नोटिस देरी से भेजना या चेक की तारीख में हेराफेरी), तो कोर्ट से मुआवजे की मांग को खारिज करने की अपील की जा सकती है।
2. कर्ज का अस्तित्व न होना: यदि आरोपी शुरुआती चरण में ही यह ठोस संकेत दे दे कि कोई कानूनी कर्ज था ही नहीं (जैसे चोरी हुआ चेक या खोया हुआ चेक), तो कोर्ट मुआवजे के आदेश पर रोक लगा सकता है।
3. आर्थिक तंगी: यदि आरोपी की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, तो मानवीय आधार पर इसे कम करने या रद्द करने की दलील दी जा सकती है।
आरोपी के पास अन्य मज़बूत कानूनी बचाव (Defence):
* वित्तीय क्षमता (Financial Capacity) पर प्रहार: यदि शिकायतकर्ता ने बहुत बड़ी राशि का दावा किया है, तो आरोपी कोर्ट में यह सवाल उठा सकता है कि क्या शिकायतकर्ता के पास इतना पैसा देने की औकात (Capacity) थी? यदि शिकायतकर्ता इसे साबित नहीं कर पाता, तो केस वहीं कमज़ोर हो जाता है।
* इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) का महत्व: यदि शिकायतकर्ता ने दिए गए कर्ज को अपने ITR में नहीं दिखाया है, तो माननीय सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों के अनुसार, आरोपी इसे अपने बचाव में ‘प्रोबेबल डिफेंस’ के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
* सुरक्षा चेक (Security Cheque) का दुरुपयोग: यदि चेक केवल सुरक्षा के लिए दिया गया था और उसे बिना किसी सूचना के भर दिया गया है, तो उचित साक्ष्यों के माध्यम से आरोपी बरी हो सकता है।
* सक्षम गवाह और जिरह (Cross-Examination): धारा 138 के केस में शिकायतकर्ता से की गई ‘जिरह’ सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि जिरह के दौरान शिकायतकर्ता के बयानों में विरोधाभास पाया जाता है, तो कानून का ‘अनुमान’ (Presumption) खत्म हो जाता है।
सावधानी ही बचाव है
जिला न्यायालय बैतुल के अधिवक्ता भरत सेन का कहना है कि समन मिलने पर डरें नहीं। कानून निर्दोष को अपनी बात रखने का पूरा मौका देता है। सही समय पर सही कानूनी सलाह और साक्ष्यों का संकलन आपको झूठे मुकदमों और अनावश्यक वित्तीय बोझ से बचा सकता है।



