
प्रस्तुत है अधिवक्ता भारत सेन (जिला न्यायालय, बैतूल) की ओर से समाचार पत्र के लिए एक विशेष लेख:
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## न्याय का सिद्धांत: जब ‘अकाट्य प्रमाण’ झूठे आरोपों को ध्वस्त कर दें
— एडवोकेट भारत सेन, जिला न्यायालय बैतूल
हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2026 INSC 322) के मामले में ‘क्वैशिंग’ (Quashing) यानी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के कानून पर एक मील का पत्थर निर्णय दिया है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (CCTV फुटेज) जैसे अकाट्य प्रमाण (Unimpeachable Evidence) आरोपों को पूरी तरह गलत साबित करते हैं, तो अदालतों को मुकदमे को शुरुआती स्तर पर ही रद्द कर देना चाहिए।
## क्या था मामला?
यह विवाद कोलकाता के एक अपार्टमेंट परिसर में रहने वाले पड़ोसियों के बीच झगड़े से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता ने सजल बोस और अन्य पर मारपीट, गाली-गलौज और गंभीर धमकियों के आरोप लगाते हुए IPC की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज कराई थी। हालाँकि, जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, तो तथ्यों ने एक अलग ही कहानी बयां की।
## सर्वोच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप
न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के ही रिकॉर्ड का हिस्सा रहे CCTV फुटेज का बारीकी से अध्ययन किया। फुटेज में साफ दिखा कि:
* आरोपी (अपीलकर्ता) घटना स्थल पर मारपीट के दौरान मौजूद ही नहीं थे।
* वे घटना के काफी बाद वहां पहुंचे और केवल स्थिति को शांत करने (Pacify) की कोशिश कर रहे थे।
* शिकायतकर्ता के आरोप ‘अस्पष्ट’ और ‘सामान्य’ (Vague and Omnibus) थे, जिनमें किसी विशिष्ट भूमिका का जिक्र नहीं था।
## क्वैशिंग कानून पर कोर्ट की बड़ी बातें
अदालत ने भजन लाल और केसरवानी मामलों के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि:
1. प्रक्रिया का दुरुपयोग रोकना: यदि किसी मामले को जारी रखना केवल आरोपी को परेशान करने और न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने जैसा है, तो उसे रद्द करना अनिवार्य है।
2. विश्वसनीय इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य: यदि CCTV फुटेज जैसे निष्पक्ष साक्ष्य आरोपों की बुनियाद को ही खत्म कर देते हैं, तो आरोपी को लंबे और थकाऊ ट्रायल से गुजरने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
3. निर्दोष की सुरक्षा: आपराधिक कानून को व्यक्तिगत रंजिश निकालने या बदला लेने का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
## निष्कर्ष
यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए एक राहत की खबर है जो झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए आरोपों का सामना कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह संदेश दिया है कि न्याय केवल सजा देने में नहीं, बल्कि निर्दोष को अकारण प्रताड़ना से बचाने में भी निहित है।




