
ब्यूरो रिपोर्ट
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (धारा 138) एवं परिसीमा अधिनियम, 1963 का अंतर्संबंध: बचाव पक्ष (अभियुक्त) के कानूनी अधिकार और रणनीतियां
लेखक: भारत सेन, अधिवक्ता
जिला एवं सत्र न्यायालय, बैतूल (मध्य प्रदेश) मो0 न0 9827306273
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प्रस्तावना
न्यायिक विधा में एक सुप्रसिद्ध कानूनी कहावत है—”Vigilantibus non dormientibus jura subveniunt” अर्थात “कानून केवल जागरूक लोगों की सहायता करता है, सोने वालों की नहीं।”
बैंकिंग मुकदमों में, विशेष रूप से प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) या अन्य सावधि ऋणों (Term Loans) के मामलों में, वित्तीय संस्थान अक्सर ऋण की वसूली न होने पर अभियुक्तों के विरुद्ध परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act), 1881 की धारा 138 के तहत चेक बाउंस का आपराधिक मुकदमा दर्ज कराते हैं। ऐसे मामलों में, परिसीमा अधिनियम (Limitation Act), 1963 के प्रावधान बचाव पक्ष (आरोपी) के लिए एक अचूक और ढाल की तरह काम करने वाले कानूनी अधिकार प्रदान करते हैं। यह विशेष लेख जिला न्यायालय बैतूल और देश भर के न्यायालयों में बचाव पक्ष के हितों की रक्षा हेतु तैयार किया गया है।
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1. धारा 138 NI Act के तहत मूल सिद्धांत: वैध ऋण दायित्व (Legally Enforceable Debt)
धारा 138 के तहत किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए सबसे पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि बाउंस हुआ चेक “किसी वैध रूप से लागू करने योग्य ऋण या अन्य देनदारी” को चुकाने के लिए जारी किया गया हो (Explanation to Section 138)।
यदि कोई ऋण दीवानी कानून (Civil Law) के तहत समय-वर्जित (Time-Barred) हो चुका है, तो वह “वैध रूप से लागू करने योग्य” नहीं रह जाता। ऐसे काल-बाधित ऋण को चुकाने के लिए यदि कोई सुरक्षा चेक (Security Cheque) भरकर बैंक द्वारा लगाया जाता है, तो चेक बाउंस होने पर भी धारा 138 के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
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2. परिसीमा की गणना: अनुच्छेद 19 बनाम अनुच्छेद 113 (मासिक किस्तों के संदर्भ में)
जैसा कि माननीय उच्च न्यायालय ने सतीश कुमार बनाम रीना भौमिक मामले में स्पष्ट किया है, सावधि ऋणों (जैसे कि 60 मासिक किस्तों वाले ऋण) में परिसीमा की गणना लोन स्वीकृत होने की तारीख से नहीं की जाती:
• अनुच्छेद 19 (Limitation Act): यह केवल उन ऋणों पर लागू होता है जो “मांगने पर देय” (Payable on Demand) होते हैं।
• अनुच्छेद 113 (Residuary Article): निश्चित मासिक किस्तों (EMIs) वाले सावधि ऋणों में, जब ऋण चुकाने के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय होती है, तब यह अवशिष्ट प्रावधान लागू होता है। इसके तहत, मियाद (3 वर्ष) की गणना “वाद कारण उत्पन्न होने” (Cause of Action) यानी प्रथम डिफ़ॉल्ट (Default) की तिथि से होती है।
काल्पनिक उदाहरण से समझें:
यदि किसी ऋणी ने 60 किस्तों में से 30 किस्तें जून 2022 तक समय पर चुकाईं और 1 जुलाई 2022 (31वीं किस्त) को पहली चूक (Default) की, और उसके बाद कोई लेनदेन नहीं हुआ:
• बैंक के पास दीवानी न्यायालय में ऋण वसूली या वैध कानूनी कार्रवाई शुरू करने का अधिकार 1 जुलाई 2022 से उत्पन्न हुआ।
• परिसीमा अधिनियम के तहत, यह ऋण 30 जून 2025 को समय-वर्जित (Time-Barred) हो गया।
• यदि बैंक इसके बाद (जैसे वर्ष 2026 में) चेक प्रस्तुत करता है, तो ऋण कानूनी रूप से मृत (Dead Debt) माना जाएगा।
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3. माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के मार्गदर्शक निर्णय
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं को अपने लिखित तर्कों और जिरह (Cross-examination) में निम्नलिखित लैंडमार्क निर्णयों का हवाला अवश्य देना चाहिए:
1. कांचन वोपचा बनाम वी. एम. थॉमस (माननीय सर्वोच्च न्यायालय):
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 138 के तहत आपराधिक दायित्व तभी बनता है जब चेक के प्रस्तुतीकरण के दिन आरोपी पर कोई “वैध कानूनी देनदारी” मौजूद हो। यदि दीवानी कानून के तहत ऋण की वसूली की अवधि समाप्त हो चुकी है, तो उस चेक के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
2. सासेरीयल जोसेफ बनाम मुथुधम (माननीय सर्वोच्च न्यायालय):
इस मामले में कोर्ट ने माना कि एक समय-वर्जित ऋण (Time-Barred Debt) धारा 138 के स्पष्टीकरण के तहत “वैध रूप से लागू करने योग्य ऋण” नहीं है। यदि शिकायतकर्ता मियाद खत्म होने के बाद चेक लगाता है, तो आरोपी को दोषमुक्त किया जाना न्यायसंगत है।
3. सतीश कुमार बनाम रीना भौमिक (माननीय उच्च न्यायालय):
इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि सावधि ऋणों (Term Loans) में चूक (Default) की तारीख से परिसीमा की गणना की जानी चाहिए, न कि ऋण देने की तारीख से। यह निर्णय बैंक द्वारा मनमाने ढंग से समय-सीमा तय करने के प्रयासों पर रोक लगाता है।
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4. बैंक द्वारा अपनाए जाने वाले तरीके: परिसीमा अवधि को बढ़ाने का खेल
बैंकिंग संस्थान अक्सर अपनी प्रशासनिक लापरवाहियों को छुपाने और ऋण को जीवित (Live Debt) रखने के लिए कानूनी बारीकियों का सहारा लेते हैं। बचाव पक्ष के रूप में हमें इन तरीकों से सावधान रहना होगा और जिरह में इन्हें उजागर करना होगा:
• ऋण की पावती/ऋण नवीनीकरण पत्र (Acknowledgment of Debt – Section 18 Limitation Act):
बैंक 3 साल की अवधि समाप्त होने से ठीक पहले ऋणी को बुलाकर ‘बैलेंस कन्फर्मेशन लेटर’ या ‘रिवाइवल लेटर’ पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं। धारा 18 के अनुसार, जैसे ही ऋणी लिखित में अपने हस्ताक्षर द्वारा लोन की बात स्वीकार करता है, उसी तारीख से अगले 3 वर्ष के लिए परिसीमा की नई अवधि शुरू हो जाती है।
• आंशिक भुगतान का प्रलोभन (Part-Payment – Section 19 Limitation Act):
बैंक अधिकारी अक्सर ऋणी से कहते हैं कि “खाते को चालू रखने के लिए केवल ₹500 या ₹1,000 जमा कर दीजिए।” धारा 19 के अनुसार, यदि परिसीमा अवधि समाप्त होने से पहले खाते में कोई भी आंशिक भुगतान (चाहे वह बहुत छोटी राशि ही क्यों न हो) किया जाता है, तो उस भुगतान की तारीख से पुनः 3 वर्ष की नई अवधि मिल जाती है।
• चेक पर मनमाफिक तारीख भरना:
लोन स्वीकृत करते समय बैंक जो ब्लैंक सुरक्षा चेक लेते हैं, उन्हें वे लोन के एनपीए (NPA) होने के कई वर्षों बाद भी अपने विवेक से समकालीन तारीख डालकर बैंक में लगा देते हैं, ताकि यह दिखाया जा सके कि चेक हाल ही में जारी किया गया था।
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5. बचाव पक्ष (आरोपी) के हित में विशेष रणनीतिक सुझाव
जिला न्यायालय बैतूल के क्षेत्राधिकार एवं व्यापक कानूनी परिप्रेक्ष्य में, अभियुक्त पक्ष को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर अपनी पैरवी मजबूत करनी चाहिए:
1. प्रमाणित खाता विवरण (Certified Statement of Account) की मांग:
जिरह के दौरान बैंक अधिकारी से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 65B के तहत प्रमाणित खाता बही मांगें। अदालत को दिखाएं कि अंतिम वास्तविक भुगतान (जैसे 30वीं किस्त) कब हुआ था और उसके बाद 3 वर्ष की अवधि कब पूरी हुई।
2. विशेषज्ञ राय (Handwriting Expert):
यदि चेक पर हस्ताक्षर ऋणी के हैं, लेकिन तारीख और राशि बैंक के कर्मचारी द्वारा अलग स्याही या अलग लिखावट (Handwriting) में भरी गई है, तो न्यायालय के समक्ष भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 के तहत विशेषज्ञ जांच का आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। यह साबित करेगा कि चेक “सुरक्षा” के रूप में लिया गया था, न कि किसी तात्कालिक देनदारी को चुकाने के लिए।
3. बैंक के ‘रिकॉल नोटिस’ का मिलान:
यदि बैंक ने धारा 138 के वैधानिक नोटिस से पहले कोई ‘लोन रिकॉल नोटिस’ (Loan Recall Notice) भेजा था, तो उसमें दर्शाई गई बकाया राशि और चेक पर लिखी गई राशि का मिलान करें। यदि चेक की राशि वास्तविक देय राशि से एक रुपया भी अधिक है, तो स्थापित सिद्धांतों के तहत चेक अवैध हो जाता है।
निष्कर्ष
परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 एक अर्ध-आपराधिक (Quasi-Criminal) प्रावधान है। जहाँ बैंक वित्तीय शक्ति और तकनीकी दस्तावेजों से लैस होते हैं, वहीं एक आम नागरिक या मुद्रा लोन का छोटा व्यवसायी केवल कानून के सही ज्ञान से ही अपनी सुरक्षा कर सकता है। परिसीमा का नियम मात्र एक तकनीकी नियम नहीं है, बल्कि यह न्याय का वह सिद्धांत है जो नागरिकों को अंतहीन मुकदमों के उत्पीड़न से बचाता है।





