
ब्यूरो रिपोर्ट
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court) ने ग्राम रोजगार सहायक (GRS) की नियुक्ति रद्द करने के आदेश को बरकरार रखते हुए एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि किसी सरकारी नौकरी या नियुक्ति की नींव ही धोखाधड़ी पर टिकी हो, तो उस पद पर कोई भी वैध अधिकार या दावा कायम नहीं रह सकता।
जस्टिस विवेक कुमार सिंह की पीठ ने खारिज की याचिका
यह अहम आदेश माननीय जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से दायर की गई रिट पिटीशन को खारिज करते हुए दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फर्जी या जालसाजी किए गए सरकारी अभिलेखों (Documents) के आधार पर किसी भी व्यक्ति को शासकीय सेवा में बने रहने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जा सकती।
रजिस्टर में हेरफेर कर अंतिम तिथि के बाद कराया था आवेदन
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि याचिकाकर्ता ने ग्राम रोजगार सहायक पद की भर्ती प्रक्रिया के दौरान तय की गई आखिरी तारीख (Deadline) के बाद अपना आवेदन फॉर्म जमा करवाया था। इस फॉर्म को स्वीकार्य और वैध दिखाने के लिए उसने ग्राम पंचायत के आधिकारिक पावती और आवक-जावक रजिस्टर में कूटकरण (जालसाजी) करते हुए तारीखों और रिकॉर्ड के साथ हेरफेर किया था।
शुरुआत से ही अवैध थी नियुक्ति
उच्च न्यायालय ने दस्तावेजों और जांच रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए कहा कि चूंकि अभ्यर्थी ने भर्ती के नियमों का उल्लंघन किया और रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ की, इसलिए उसकी नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया पहले दिन से ही शून्य और अवैध (Void ab initio) थी। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी के जरिए हासिल की गई किसी भी प्रशासनिक या वैधानिक राहत को कानून के दायरे में संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट के इस सख्त फैसले के बाद अब प्रशासनिक विभागों में फर्जी दस्तावेजों या हेरफेर के सहारे नौकरी पाने वाले अन्य संदेहास्पद मामलों पर भी गाज गिरनी तय मानी जा रही है।






