
अधिवक्ता भारत सेन बैतूल
व्यवसाय हो या व्यक्तिगत लेनदेन, आज के दौर में चेक का इस्तेमाल आम बात है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका दिया गया एक चेक अगर बैंक से वापस (बाउंस) हो जाए, तो आपको जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है? कानून की भाषा में इसे ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138’ (Section 138 NI Act) के तहत एक गंभीर अपराध माना गया है।
अक्सर आम लोग कानूनी पेचीदगियों को समझ नहीं पाते। आइए भारतीय अदालतों के ऐतिहासिक फैसलों के नजरिए से बेहद आसान शब्दों में समझते हैं कि चेक बाउंस होने पर कानून क्या कहता है और आपके पास क्या अधिकार हैं।
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## 1. चेक बाउंस होने पर क्या सीधे केस दर्ज हो सकता है?
नहीं, पहले मौका दिया जाता है: कानून कहता है कि चेक बाउंस होने के तुरंत बाद मुकदमा नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक तय प्रक्रिया है:
* कानूनी नोटिस (Legal Notice): चेक बाउंस होने की जानकारी मिलने के 30 दिनों के भीतर आपको सामने वाले व्यक्ति को एक लिखित नोटिस भेजना होगा।
* 15 दिनों का समय: नोटिस मिलने के बाद आरोपी को पैसे चुकाने के लिए 15 दिनों का समय मिलता है।
* मुकदमे का आधार (Cause of Action): कुंजू विश्वनाथन बनाम रामकृष्णन (1998) मामले में कोर्ट ने कहा था कि अगर आरोपी इन 15 दिनों में भी भुगतान नहीं करता, तभी धारा 142 के तहत अदालत केस को स्वीकार (Cognizance) करती है और कानूनी कार्रवाई शुरू होती है।
## 2. क्या चेक बाउंस के मामले में हमेशा जेल जाना पड़ता है?
धारा 138 के तहत अपराध साबित होने पर 2 साल तक की जेल या चेक की राशि का दोगुना जुर्माना (या दोनों) हो सकता है। लेकिन अदालतों ने आम आदमी की सहूलियत के लिए कुछ नियम बनाए हैं:
* कोर्ट में हाजिरी से छूट: चूंकि यह एक समन मामला है, इसलिए आरोपी को पहली बार में ही अपराधी नहीं मान लिया जाता। श्रीमती जैन बाबू बनाम के.जे. जोसेफ (2008) मामले के अनुसार, आरोपी अपनी खराब सेहत या जरूरी कारणों से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 205 के तहत ‘व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट’ (Exemption) मांग सकता है। ऐसे में उसका वकील उसकी जगह कोर्ट में पेश हो सकता है।
* त्वरित सुनवाई (Summary Trial): ए. शक्तिवेल बनाम के.आर. नवनीत कृष्णन (2011) मामले में कोर्ट ने जोर दिया कि इन मामलों की सुनवाई संक्षिप्त (Summary Trial) होनी चाहिए, ताकि सालों-साल चक्कर न काटने पड़ें और पीड़ित को उसका पैसा जल्दी मिल सके।
## 3. कानून की नजर में ‘चेक’ का मतलब क्या है?
* केवल वास्तविक चेक ही मान्य: एस. देवन बनाम सी. कृष्ण मेनन (2010) मामले में साफ किया गया कि कानून केवल वास्तविक और वैध चेक (Genuine Instruments) की ही रक्षा करता है। अगर चेक जाली है, या धोखाधड़ी से लिया गया है, तो धारा 138 लागू नहीं होगी।
* अदालत का पहले से अनुमान: श्रीमती विमला देवी (2017) मामले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून यह मानकर चलता है कि चेक किसी वैध कर्ज या जिम्मेदारी को चुकाने के लिए ही दिया गया था। इसे ‘Rebuttable Presumption’ कहते हैं। इसका मतलब है कि अगर आरोपी का कहना है कि उसने चेक किसी कर्ज के बदले नहीं बल्कि सुरक्षा (Security) के लिए दिया था, तो यह साबित करने की जिम्मेदारी खुद आरोपी की होगी।
## 4. यदि कंपनी का चेक बाउंस हो जाए तो जिम्मेदार कौन?
अगर आपने किसी प्राइवेट लिमिटेड या पार्टनरशिप कंपनी के साथ सौदा किया है और कंपनी का चेक बाउंस हो गया है, तो कानून और सख्त हो जाता है। ओरके इंडस्ट्रीज लिमिटेड (1998) के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, धारा 141 के तहत सिर्फ कंपनी ही नहीं, बल्कि चेक जारी होने के समय कंपनी के कामकाज को संभालने वाले सभी निदेशक (Directors) और जिम्मेदार अधिकारी भी इस अपराध के भागीदार माने जाएंगे और उन सब पर केस चलेगा।
## 5. केस कहाँ दर्ज कराना चाहिए?
चेक बाउंस का केस किसी भी अदालत में दर्ज नहीं कराया जा सकता। कैनबैंक फाइनेंशियल सर्विसेज (1995) मामले के अनुसार, शिकायत केवल उसी उचित क्षेत्राधिकार वाली अदालत (Proper Court) में दर्ज होनी चाहिए, जहाँ आपका बैंक खाता है (यदि आपने चेक अपने खाते में जमा किया था)। गलत कोर्ट में किया गया केस खारिज हो सकता है।
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काम की बात (आम जनता के लिए सलाह):
1. चेक देते समय: हमेशा याद रखें कि खाते में पर्याप्त पैसे होने पर ही चेक जारी करें। किसी को भी ब्लैंक या सिक्योरिटी चेक देते समय लिखित समझौता जरूर करें।
2. चेक लेते समय: यदि चेक बाउंस होता है, तो 30 दिन के भीतर नोटिस भेजने की समय सीमा को कभी न चूकें, अन्यथा आप कानूनी रूप से कमजोर हो जाएंगे। चैक जारीकर्ता को नोटिस मिलता है तो उसका जवाब अवश्य ही देना चाहिए । चैक बाउंस के मामलों में पैरवी के लिए सदैव विशेषज्ञ अधिवक्ता नियुक्त करना चाहिए।