
* भारत सेन, अधिवक्ता
जिला न्यायालय, बैतूल (म.प्र.) मो: 9827306273
बैतूल। चेक बाउंस (धारा 138, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट) के मुकदमों को आमतौर पर लेनदारों (शिकायतकर्ताओं) के लिए बहुत मजबूत माना जाता है। कानूनन यह मान लिया जाता है कि अगर चेक पर हस्ताक्षर आपके हैं, तो आपने कर्ज चुकाने के लिए ही वह चेक दिया होगा। इस “कानूनी धारणा” (Statutory Presumption) के डर से कई बार निर्दोष आरोपी भी घबरा जाते हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में ‘एन. विजय कुमार बनाम विश्वनाथ राव एन.’ (2025 INSC 537) के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपियों के अधिकार और बचाव के तरीके को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। यह निर्णय उन सभी लोगों के लिए एक बड़ा सबक और मार्गदर्शक है जो चेक बाउंस के झूठे या सुरक्षा (Security) के तौर पर दिए गए चेक के मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
कानून की दोधारी तलवार: धारणा और उसका खंडन
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 118(a) और 139 के तहत अदालत शुरुआत में यह मानकर चलती है कि चेक किसी वैध कर्ज या देनदारी को चुकाने के लिए ही जारी किया गया था। इसे ‘भार’ (Onus) कहा जाता है जो आरोपी के सिर पर होता है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस फैसले में साफ किया कि यह धारणा अंतिम सत्य नहीं है, इसका खंडन (Rebuttal) किया जा सकता है।
आरोपी को ‘संदेह से परे’ साबित करने की जरूरत नहीं
अदालत में अक्सर आरोपी इस भ्रम में रहते हैं कि उन्हें खुद को बिल्कुल बेगुनाह साबित करने के लिए बहुत भारी सबूत देने होंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने इस भ्रम को दूर करते हुए स्पष्ट किया:
1. संभावनाओं की प्रबलता (Preponderance of Probabilities): शिकायतकर्ता को तो अपना केस “संदेह से परे” (Beyond Reasonable Doubt) साबित करना होता है, लेकिन आरोपी को केवल एक “संभावित बचाव” (Probable Defence) पेश करना होता है। यानी आरोपी को अदालत में सिर्फ इतना संदेह पैदा करना है कि शिकायतकर्ता का दावा झूठा लग रहा है।
2. गवाह बॉक्स में आना जरूरी नहीं: कोर्ट ने कहा कि आरोपी को अपना बचाव साबित करने के लिए खुद गवाह के रूप में कटघरे में खड़े होने की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है।
कैसे ढह जाता है शिकायतकर्ता का केस? (शिफ्टिंग ऑफ बर्डन)
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, जैसे ही आरोपी अपनी दलीलों, जिरह (Cross-examination) या परिस्थितियों से शिकायतकर्ता के दावे पर कोई वाजिब संदेह खड़ा कर देता है, वैसे ही कानून की वह शुरुआती धारणा (कि चेक कर्ज का ही था) तुरंत समाप्त हो जाती है। इसके बाद गेंद वापस शिकायतकर्ता के पाले में आ जाती है। अब शिकायतकर्ता को नए सिरे से, बिना किसी कानूनी धारणा के सहारे, यह साबित करना होगा कि उसने वास्तव में वह कर्ज दिया था। अगर वह दस्तावेज या गवाह पेश नहीं कर पाता, तो केस खारिज हो जाएगा।
इस केस से क्या सबक लें आरोपी? (बचाव के ६ अचूक मंत्र)
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने जिन परिस्थितियों के आधार पर आरोपी को बरी किया, वे हर आरोपी के लिए एक बेहतरीन कानूनी सबक हैं:
* सुरक्षा चेक का स्टैंड लें (Security Cheque): यदि चेक किसी पुराने छोटे कर्ज या सुरक्षा के तौर पर दिया गया था, तो शुरू से अंत तक अपने इस स्टैंड पर कायम रहें।
* लेन-देन के समय पर सवाल उठाएं: यदि कथित लोन के उद्देश्य (जैसे फिल्म निर्माण या कोई व्यापार) और चेक बैंक में लगाने की तारीख के बीच बहुत लंबा समय बीत चुका है, तो इस ‘टाइम लैप्स’ को अदालत के सामने मजबूती से रखें।
* लिखित समझौतों (MoU) का सहारा लें: यदि पहले कभी कोई आंशिक भुगतान या समझौता हुआ हो, तो उसके दस्तावेज संभाल कर रखें।
* चेक मिसयूज होने से पहले पुलिस शिकायत: यदि आपका चेक खो गया है, चोरी हुआ है या कोई उसका गलत इस्तेमाल कर रहा है, तो उसके बैंक में लगने से पहले ही पुलिस में शिकायत (Police Complaint) दर्ज कराएं। इस केस में आरोपी की पुलिस शिकायत उसके पक्ष में सबसे बड़ा हथियार बनी।
* शिकायतकर्ता के पास सबूतों की कमी: यदि शिकायतकर्ता ने आपको लाखों का लोन देने का दावा किया है, लेकिन उसके पास कोई डायरी, प्रॉमिसरी नोट, बैंक एंट्री या आईटीआर (ITR) का रिकॉर्ड नहीं है, तो जिरह के दौरान इस कमजोरी को उजागर करें।
* निचली अदालत के फैसले का सम्मान: सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) ने साक्ष्यों को देखकर आरोपी को बरी कर दिया है, तो अपीलीय अदालत को तब तक उस फैसले को नहीं पलटना चाहिए जब तक कि वह फैसला कानूनन पूरी तरह गलत न हो।
निष्कर्ष: घबराएं नहीं, सही रणनीति से लड़ें
बैतूल जिला न्यायालय और देश की अन्य अदालतों में ऐसे हजारों मामले लंबित हैं जहाँ सुरक्षा के लिए दिए गए ब्लैंक चेक का दुरुपयोग किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला देश के हर उस नागरिक के लिए राहत की खबर है जो विधिक प्रक्रिया के चक्रव्यूह में फंसा है। कानून अंधा नहीं है; यह सिर्फ सही और तार्किक तरीके से पेश किए गए सबूतों और मजबूत पैरवी की मांग करता है। सजग रहें, अपने अधिकारों को जानें और अदालत में सही कानूनी रणनीति के साथ अपना बचाव प्राप्त करें। चैक बाउंस के मामलों में अन्य सिविल या क्रिमिनल मामलों की तरह पैरवी नहीं की जाती हैं, इसलिए विशेषज्ञ अधिवक्ता को नियुक्त करना चाहिए ।






