
लेखक: Bharat Sen Advocate
कवर स्टोरी: सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला – विवाह का झूठा वादा बनाम सहमति: 3 साल के रिश्ते को बलात्कार का ठप्पा नहीं!
**नई दिल्ली, 9 दिसंबर 2025 (स्पेशल रिपोर्ट)**
**लेखक: Bharat Sen Advocate
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से भारतीय न्याय व्यवस्था में सहमति (कंसेंट) की परिभाषा को मजबूत किया है। 24 नवंबर 2025 को दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले (2025 INSC 1351) में, न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने महाराष्ट्र के एक मामले में एफआईआर और चार्जशीट रद्द कर दी, जहां एक महिला ने अपने पूर्व प्रेमी पर विवाह का झूठा वादा देकर बलात्कार का आरोप लगाया था। अदालत ने साफ कहा कि लंबे समय तक चले सहमति वाले रिश्ते को बाद में टूटने पर बलात्कार का नाम देकर अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। यह फैसला न केवल व्यक्तिगत रिश्तों की जटिलताओं पर रोशनी डालता है, बल्कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराध की परिभाषा को भी परिष्कृत करता है।
#### पृष्ठभूमि: एक लंबा रिश्ता, जो बदला बन गया
मामला महाराष्ट्र का है, जहां याचिकाकर्ता समाधान सिताराम मन्मोठे (एक वकील) पर उनकी पूर्व क्लाइंट (शिकायतकर्ता) ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376, 376(2)(न) और 507 के तहत बलात्कार का आरोप लगाया। शिकायतकर्ता एक शिक्षित और विवाहित महिला थीं, जिनका समाधान के साथ तीन साल तक चला रिश्ता था। अदालत के अनुसार, दोनों के बीच शारीरिक संबंध कई बार स्थापित हुए, बिना किसी विरोध या शिकायत के। रिश्ता सहमति से चला, लेकिन ब्रेकअप के बाद शिकायतकर्ता ने पैसे की मांग की, जो समाधान ने ठुकरा दी। इसके तीन महीने बाद एफआईआर दर्ज हुई।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, “यह रिश्ता सहमति पर आधारित था। लंबे समय तक चले कार्यशील रिश्ते में शारीरिक अंतरंगता को बाद में कटुता के कारण बलात्कार का नाम नहीं दिया जा सकता।” अदालत ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता ने रिश्ते के दौरान विवाह के विचार का विरोध किया था, फिर भी स्वेच्छा से संबंध बनाए रखे। यह मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायतकर्ता विवाहित होने के बावजूद इस रिश्ते में सक्रिय रूप से शामिल रहीं।
#### सहमति की परिभाषा: झूठे वादे का जाल या स्वेच्छा का फैसला?
फैसले का केंद्र बिंदु आईपीसी की धारा 375 और 376 है, जहां सहमति को झूठे विवाह वादे से प्रभावित बताने का दावा किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि “झूठे विवाह वादे से सहमति रद्द करने के लिए शारीरिक संबंध सीधे उस वादे से जुड़े होने चाहिए, न कि अन्य परिस्थितियों से प्रभावित।” यहां, तीन साल का लंबा रिश्ता सहमति पर टिका था, और महिला ने अपनी मर्जी से अंतरंगता निभाई। न्यायालय ने जोर दिया कि आरोपी को शुरू से ही धोखा देने का इरादा (माला फाइड इंटेंशन) साबित होना चाहिए, जो महज वासना संतुष्टि के लिए हो। इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “ऐसे मामलों में अभियोजन जारी रखना बलात्कार अपराध की गंभीरता को तुच्छ बनाता है।” अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि पैसे की मांग पूरी न होने पर आपराधिक मुकदमा चलाना अदालतों का दुरुपयोग है। यह फैसला उन सैकड़ों मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां ब्रेकअप के बाद झूठे आरोप लगाए जाते हैं।
#### धारा 376(2)(न): दोहराव वाले बलात्कार की सजा का दुरुपयोग
फैसले में आईपीसी की धारा 376(2)(न) पर विशेष टिप्पणी की गई, जो एक ही महिला पर बार-बार बलात्कार के लिए सख्त सजा का प्रावधान करती है। अदालत ने कहा कि इस धारा का उद्देश्य धोखे या जबरदस्ती से शुरू हुए अपराधों को रोकना है, जहां महिला असुरक्षित हो। लेकिन यहां, तीन साल का सहमति वाला रिश्ता था, जो बाद में विफल हो गया। “ऐसे में धारा 376(2)(न) लागू करने का कोई आधार नहीं,” अदालत ने फैसला सुनाया। यह प्रावधान अब केवल वास्तविक आक्रामक मामलों तक सीमित रहेगा।
#### वकील-क्लाइंट रिश्ता: फिड्यूशरी ड्यूटी का गलत इस्तेमाल?
हाईकोर्ट ने मामले को खारिज करने से इनकार करते हुए कहा था कि वकील (समाधान) और क्लाइंट (शिकायतकर्ता) के बीच ‘फिड्यूशरी रिलेशनशिप’ (विश्वासपूर्ण संबंध) था, इसलिए ट्रायल जरूरी है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया। एफआईआर की साफ भाषा से सहमति साबित होती है, और हाईकोर्ट ने आवेदन में सहमति का स्पष्ट उल्लेख न होने पर गलत जोर दिया। अदालत ने कहा, “शिकायतकर्ता एक वयस्क और शिक्षित महिला हैं, जिनकी शादीशुदा स्थिति के बावजूद इच्छा स्पष्ट थी।” यह फैसला पेशेवर रिश्तों में व्यक्तिगत सीमाओं पर भी बहस छेड़ेगा।
#### व्यापक प्रभाव: न्याय व्यवस्था में बदलाव की उम्मीद
यह फैसला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत एफआईआर रद्द करने की प्रक्रिया को मजबूत करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे झूठे बलात्कार मामलों में कमी आएगी, और असली पीड़ितों को न्याय मिलेगा। महिला अधिकार कार्यकर्ता नेहा सिंह कहती हैं, “यह फैसला सहमति को सशक्त बनाता है, लेकिन हमें शिक्षा और जागरूकता पर जोर देना होगा ताकि रिश्ते मजबूत आधार पर टिकें।” वहीं, कानूनी विशेषज्ञ राजेश कुमार ने कहा, “यह ब्रेकअप को बदले की भावना से जोड़ने वालों के लिए चेतावनी है।”
सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल इस मामले को बंद किया, बल्कि पूरे सिस्टम को एक संदेश दिया: न्याय भावनाओं का शिकार नहीं बनेगा। समाधान मन्मोठे के वकील ने कहा, “यह जीत न केवल मेरे मुवक्किल की है, बल्कि उन हजारों पुरुषों की जो झूठे आरोपों का शिकार होते हैं।”
यह कवर स्टोरी न केवल एक फैसले की व्याख्या करती है, बल्कि समाज में रिश्तों, सहमति और न्याय की जटिल परतों को उजागर करती है। क्या यह फैसला झूठे मामलों पर अंकुश लगाएगा, या सहमति की परिभाषा को और सख्त करेगा? बहस जारी है।