
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
भारत में शिक्षा व्यवस्था को एकसमान बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 2011 का एक महत्वपूर्ण फैसला आया था, जिसने ‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा, एक पाठ्यक्रम’ की अवधारणा को मजबूती प्रदान की। यह फैसला स्टेट ऑफ तमिलनाडु बनाम के. श्याम सुंदर (9 अगस्त, 2011) में दिया गया था। इस फैसले में कोर्ट ने बच्चों के शिक्षा के अधिकार को गुणवत्तापूर्ण और भेदभाव-रहित बनाने पर जोर दिया। हालांकि, कांग्रेस नीत केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए राइट टू एजुकेशन (RTE) एक्ट, 2009 में दिए गए कुछ छूटों ने इस दृष्टिकोण को कमजोर कर दिया, खासकर मदरसों को इससे बाहर रखकर। इस लेख में हम इस फैसले की पृष्ठभूमि, इसके महत्व और RTE के माध्यम से इसे कैसे विफल किया गया, इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
#### फैसले की पृष्ठभूमि और मुख्य बिंदु
तमिलनाडु में शिक्षा की असमानता को दूर करने के लिए 2010 में तमिलनाडु यूनिफॉर्म सिस्टम ऑफ स्कूल एजुकेशन एक्ट (समाचीर कल्वी) लागू किया गया था। इस एक्ट का उद्देश्य राज्य के सभी स्कूलों में एक समान पाठ्यक्रम (कॉमन सिलेबस), पाठ्यपुस्तकें और परीक्षा प्रणाली लागू करना था। इससे पहले, राज्य में चार अलग-अलग बोर्ड (स्टेट बोर्ड, मैट्रिकुलेशन, एंग्लो-इंडियन और ओरिएंटल) थे, जिनके अलग-अलग सिलेबस और किताबें होने से छात्रों में असमानता थी।
2011 में AIADMK सरकार के आने के बाद, इस एक्ट को अमल में लाने में देरी करने के लिए एक संशोधन विधेयक (अमेंडमेंट एक्ट, 2011) पारित किया गया, जो सेक्शन 3 के तहत कार्यान्वयन को स्थगित कर रहा था। इस पर मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, और हाईकोर्ट ने संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि बच्चे का शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21A) केवल मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक विस्तारित होता है, जिसमें कोई भेदभाव न हो। कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को दोषपूर्ण माना और निर्देश दिया कि यूनिफॉर्म सिस्टम के तहत छपी किताबें वितरित की जाएं और कक्षाएं शुरू की जाएं। इस फैसले को ‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ की दिशा में एक कदम माना गया, क्योंकि यह शिक्षा में समानता पर जोर देता था, हालांकि यह राज्य स्तर पर था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि असमान बोर्डों से शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है, और एक कॉमन सिलेबस से ‘कॉमन कल्चर’ का निर्माण होता है।
#### कांग्रेस नीत RTE एक्ट: कैसे हुआ फैसले का विफल होना?
RTE एक्ट, 2009 कांग्रेस नीत UPA सरकार के दौरान लागू किया गया था, जो अनुच्छेद 21A को लागू करने का मुख्य माध्यम था। यह एक्ट 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है, लेकिन इसमें कुछ प्रावधान ऐसे थे जो सुप्रीम कोर्ट के 2011 फैसले की भावना को कमजोर करते थे।
– *एक्जेम्प्शन का प्रावधान*: RTE की धारा 1(5) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह एक्ट मदरसों, वैदिक पाठशालाओं और मुख्य रूप से धार्मिक शिक्षा देने वाली संस्थाओं पर लागू नहीं होगा। यह छूट 2012 के संशोधन के माध्यम से और मजबूत की गई। इससे शिक्षा की समानता का लक्ष्य अधूरा रह गया, क्योंकि मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे RTE के लाभों (जैसे मिड-डे मील, यूनिफॉर्म, प्रशिक्षित शिक्षक) से वंचित हो गए।
– *माइनॉरिटी संस्थाओं को बाहर रखना: 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने *प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट केस में पुष्टि की कि RTE माइनॉरिटी संस्थाओं (अनुच्छेद 30(1) के तहत) पर लागू नहीं होता। यह RTE के मूल ढांचे पर आधारित था, जो कांग्रेस सरकार ने तैयार किया था। परिणामस्वरूप, मदरसों जैसी संस्थाएं RTE के मानकों (जैसे TET क्वालिफाइड टीचर्स, इंफ्रास्ट्रक्चर) से मुक्त हो गईं, जिससे शिक्षा में असमानता बनी रही।
कांग्रेस पर आरोप है कि RTE को लागू करते हुए उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थाओं को छूट देकर राजनीतिक लाभ उठाया, जिससे ‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ की अवधारणा कमजोर हुई। NCPCR जैसी संस्थाएं आज भी तर्क देती हैं कि मदरसों में शिक्षा RTE के अनुरूप नहीं है, और बच्चे वैज्ञानिक शिक्षा से वंचित हैं। यदि RTE में ये छूटें न होतीं, तो 2011 फैसले की भावना पूरे देश में लागू हो सकती थी।
#### मदरसों को RTE से बाहर क्यों रखा गया?
मदरसों को RTE से बाहर रखने का मुख्य कारण अनुच्छेद 30(1) है, जो अल्पसंख्यकों को अपनी संस्थाएं स्थापित और संचालित करने का अधिकार देता है। कांग्रेस सरकार ने RTE में धारा 1(5) जोड़कर मदरसों को धार्मिक शिक्षा पर फोकस करने की छूट दी, ताकि वे RTE के सख्त नियमों (जैसे 25% गरीब बच्चों का एडमिशन, इंफ्रास्ट्रक्चर मानक) से बच सकें।
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इससे मदरसों में पढ़ने वाले लाखों बच्चे मुख्यधारा की शिक्षा से दूर रह गए। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में मदरसा एक्ट 2004 को हाईकोर्ट ने असंवैधानिक माना था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे बरकरार रखा, पर RTE अनुपालन पर जोर दिया। कांग्रेस की नीति से मदरसों को अलग रखकर, शिक्षा की समानता का लक्ष्य विफल हो गया, क्योंकि ये संस्थाएं RTE के लाभों से वंचित रहीं।
#### निष्कर्ष: शिक्षा में समानता की चुनौतियां
सुप्रीम कोर्ट का 2011 फैसला शिक्षा में क्रांतिकारी था, जो ‘एक राष्ट्र, एक शिक्षा’ की दिशा दिखाता था। लेकिन RTE के छूट प्रावधानों ने इसे कमजोर कर दिया, जिससे मदरसों जैसी संस्थाएं मुख्यधारा से अलग रहीं। आज NEP 2020 जैसी नीतियां समान शिक्षा की ओर कदम बढ़ा रही हैं, लेकिन RTE की कमियां अभी भी बहस का विषय हैं। शिक्षा को राजनीति से ऊपर उठाकर ही सच्ची समानता हासिल की जा सकती है।





