
ब्यूरो रिपोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरण-पोषण बकाया की वसूली में पति के खिलाफ एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी करने की प्रथा को *अवैध* और *अमानवीय* घोषित कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भरण-पोषण का डिफॉल्टर स्वतः अपराधी नहीं माना जा सकता, और वसूली की प्रक्रिया में गिरफ्तारी को पहला कदम नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला *संविधान के अनुच्छेद 21* (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार), *CrPC* की धाराओं और *सुप्रीम कोर्ट* के दिशानिर्देशों के अनुरूप है।
### मामले का नाम और विवरण
मामला: *मोहम्मद शहजाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य* (Mohammad Shahzad vs. State of U.P. and 2 Others)।
यह याचिका *धारा 528 BNSS* (जो पहले CrPC की धारा 482 के समकक्ष है) के तहत दायर की गई थी।
*न्यायाधीश*: जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला।
*फैसला की तारीख*: 16 जनवरी 2026 (कुछ रिपोर्टों में जनवरी अंत या फरवरी 2026 के आसपास प्रकाशित)।
### मामले की पृष्ठभूमि
अलीगढ़ की फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता मोहम्मद शहजाद के खिलाफ भरण-पोषण की बकाया राशि वसूलने के लिए *वसूली वारंट* और *गिरफ्तारी वारंट* एक साथ जारी कर दिए थे। यह आदेश 25 सितंबर 2025 का था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि भरण-पोषण की वसूली के लिए सीधे गिरफ्तारी वारंट जारी करना गैरकानूनी है। राज्य पक्ष ने भी स्वीकार किया कि *धारा 125(3)* और *128 CrPC* के तहत प्रक्रिया का पालन किए बिना गिरफ्तारी वारंट नहीं जारी किया जा सकता।
### हाईकोर्ट के प्रमुख अवलोकन और तर्क
– कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण देने में चूक करने वाले व्यक्ति को *अपराधी* की तरह नहीं माना जा सकता। उसकी *व्यक्तिगत गरिमा और स्वतंत्रता* को अदालतों द्वारा अत्यधिक उत्साह में कुचला नहीं जा सकता, भले ही बकाया जानबूझकर न चुकाया गया हो।
– *CrPC धारा 125(3)* के अनुसार, पहले बकाया राशि की वसूली *जुर्माने की वसूली* की तरह (धारा 421 CrPC) की जानी चाहिए—यानी संपत्ति कुर्की और बिक्री के माध्यम से। यदि वसूली विफल हो जाए या आंशिक हो, तब जाकर *जेल* की सजा पर विचार किया जा सकता है।
– *धारा 421 CrPC* की प्रोविजो में स्पष्ट है कि वसूली के लिए गिरफ्तारी या हिरासत नहीं की जा सकती।
– एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी करना *CrPC* में कहीं वर्णित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों (विशेषकर *राजनेश बनाम नेहा* मामले, 2021) में भी ऐसी प्रथा की अनुमति नहीं है।
– फैमिली कोर्ट *CPC* (सिविल प्रक्रिया संहिता) के प्रावधानों को लागू नहीं कर सकती जहां CrPC स्पष्ट नियम देता है।
– यह प्रथा *अनुच्छेद 21* का उल्लंघन है, क्योंकि बिना उचित प्रक्रिया के व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीनी जा रही है। कोर्ट ने इसे *अधिकार क्षेत्र का अतिलंघन* भी बताया।
### महत्वपूर्ण उद्धरण (कोर्ट से)
– “व्यक्ति की व्यक्तिगत गरिमा और स्वतंत्रता को अदालतों द्वारा भरण-पोषण आदेश लागू करने के अत्यधिक उत्साह में कुचला नहीं जा सकता।”
– “धारा 125(3) CrPC स्पष्ट रूप से इंगित करती है कि पहले वसूली के प्रयास किए जाएं… एक साथ वसूली और गिरफ्तारी वारंट जारी करना CrPC में कल्पित नहीं है।”
– “यह प्रथा न केवल कानून के खिलाफ है, बल्कि अमानवीय भी है।”
### अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने अलीगढ़ फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को वापस भेज दिया। निर्देश दिए गए कि:
1. पहले नोटिस जारी किया जाए।
2. यदि कारण न बताया जाए, तो *धारा 421 CrPC* के तहत वसूली वारंट जारी किया जाए।
3. वसूली विफल होने पर ही जेल की सजा पर विचार किया जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट्स में यह प्रथा (एक साथ गिरफ्तारी वारंट जारी करना) तुरंत बंद की जाए।
### महत्व और प्रभाव
यह फैसला *पुरुष अधिकारों, **कानूनी दुरुपयोग* रोकने और *लिंग-तटस्थ न्याय* की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि भरण-पोषण जैसे *सिविल दायित्व* को *आपराधिक सजा* में न बदला जाए, और *उचित प्रक्रिया* (due process) का पालन हो। कई मीडिया रिपोर्टों और कानूनी विशेषज्ञों ने इसे पुरुषों के लिए राहतभरा फैसला बताया है, जो अक्सर झूठे या अत्यधिक दावों से प्रभावित होते हैं।
यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था में संतुलन बहाल करने वाला है, जहां महिलाओं के अधिकारों के साथ-साथ पुरुषों की गरिमा और स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे।