
ब्यूरो रिपोर्ट
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विवादित जमीन बेचने और कोर्ट के स्टे ऑर्डर (अंतरिम निषेधाज्ञा) का उल्लंघन करने के मामले में सख्त कार्रवाई की है। भिंड जिले की एक कृषि भूमि से जुड़े विवाद में कोर्ट ने खरीदार को जेल भेजने का आदेश दिया है, साथ ही वकील सहित अन्य लोगों को भी सजा सुनाई है।
*मामले का विवरण:*
भिंड जिले में एक कृषि भूमि पर सह-मालिकों (को-शेयरर्स) के बीच विवाद चल रहा था। 2023 में दाखिल दूसरे अपील (सेकंड अपील) में हाईकोर्ट ने 7 नवंबर 2023 को अंतरिम आदेश जारी कर संपत्ति की स्थिति यथावत (स्टेटस क्वो) बनाए रखने का निर्देश दिया था। इस स्टे ऑर्डर के बावजूद, 6 दिसंबर 2023 को सह-मालिकों ने विवादित जमीन एक महिला नीतू कुशवाह को बेच दी और कब्जा भी सौंप दिया।
*कोर्ट की कार्रवाई:*
जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया की एकल पीठ ने इस उल्लंघन को अवमानना मानते हुए पांच लोगों को दोषी ठहराया। कोर्ट ने खास तौर पर एक अभियुक्त पर नाराजगी जताई, जो खुद एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट था और पूरी तरह जानता था कि कोर्ट के आदेश की अवहेलना के क्या कानूनी परिणाम होंगे। उसके चचेरे भाई भी हाईकोर्ट (ग्वालियर बेंच) में प्रैक्टिस करते हैं। कोर्ट ने कहा कि पूरे गांव को अपील और स्टे ऑर्डर की जानकारी थी, इसलिए खरीदार नीतू भी अनजान नहीं हो सकती।
*सजाएं:*
– *खरीदार नीतू कुशवाह* को *डेढ़ महीने* (1.5 महीने) के सिविल कारावास की सजा।
– गवाह *गया प्रसाद कुशवाह* और *पुष्पेंद्र कुशवाह* को *तीन-तीन महीने* की सिविल जेल।
– *शिवरतन सिंह* को भी *तीन महीने* की सिविल जेल।
– विक्रेता में शामिल प्रैक्टिसिंग एडवोकेट (हरिमोहन सिंह) को स्वास्थ्य कारणों (हृदय और गुर्दे की बीमारी) से जेल नहीं भेजा गया, लेकिन उसे नीतू को बिक्री राशि चेक से लौटाने का आदेश दिया गया।
सभी को 18 मार्च तक ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने भिंड कलेक्टर को रिसीवर नियुक्त कर संपत्ति कुर्क करने, कब्जा लेकर खेती कराने और आय जमा करने का आदेश दिया। साथ ही नीतू का नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाकर स्थिति यथावत बहाल करने को कहा।
*कोर्ट की फटकार:*
कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की कि सजा का उद्देश्य डिटरेंस (निवारक) होना चाहिए, न कि बेईमान लोगों को बचाना। खासकर जब आरोपी में एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हो, जो जानबूझकर कोर्ट की अवमानना करता है। कोर्ट ने कहा, “सेंटेंसिंग पॉलिसी उन लोगों के खिलाफ डिटरेंट के रूप में होनी चाहिए जो जानबूझकर न्यायिक आदेशों का अपमान करते हैं, विशेष रूप से जब उनमें से एक प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हो और उसका चचेरा भाई हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करता हो।”
यह मामला न्यायिक आदेशों की गरिमा बनाए रखने और अवमानना के खिलाफ कोर्ट के सख्त रवैये का उदाहरण है। (स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस और अन्य कानूनी रिपोर्ट्स)





