
वरिष्ठ अघिवक्ता भारत सेन
*न्यायपालिका में संघर्ष-हित का प्रश्न: केजरीवाल मामले में CBI की दलील और एक गंभीर बहस*
(एक ज्ञानवर्धक विशेष लेख)
हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण कानूनी विकास हुआ है, जिसने न्यायपालिका में *संघर्ष-हित (conflict of interest)* को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर गहन चर्चा छेड़ दी है। CBI ने अदालत में कहा कि यदि अरविंद केजरीवाल की दलील स्वीकार कर ली गई, तो देश भर के उन जजों को, जिनके रिश्तेदार केंद्र या राज्य सरकार के पैनल वकीलों के रूप में नियुक्त हैं, सरकारी मामलों या राजनीतिक नेताओं से जुड़े मुकदमों की सुनवाई से रोक दिया जाना चाहिए। यह तर्क न केवल केजरीवाल के रिक्यूसल (recusal) याचिका का जवाब था, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
### पृष्ठभूमि: दिल्ली आबकारी नीति (Excise Policy) मामला
यह विवाद दिल्ली आबकारी नीति घोटाले से जुड़े CBI के एक मामले में उभरा है। AAP प्रमुख और पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर CBI ने आरोप लगाए हैं। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें कुछ आरोपों से डिस्चार्ज कर दिया था, जिसके खिलाफ CBI ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा की बेंच से रिक्यूसल की मांग की। 13 अप्रैल को उन्होंने खुद अदालत में दलीलें पेश कीं। 14 अप्रैल को उन्होंने एक अतिरिक्त शपथ-पत्र (affidavit) दायर किया, जिसमें नया मुद्दा उठाया गया – जज के परिवार और केंद्र सरकार के बीच कथित संबंध।
### केजरीवाल की दलील: “प्रत्यक्ष संघर्ष-हित का आभास”
केजरीवाल ने शपथ-पत्र में दावा किया कि जस्टिस शर्मा के पुत्र ईशान शर्मा (सुप्रीम कोर्ट के ग्रुप A पैनल काउंसल) और पुत्री शांभवी शर्मा (दिल्ली उच्च न्यायालय के गवर्नमेंट प्लीडर तथा सुप्रीम कोर्ट के ग्रुप C पैनल) केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं। ये वकील सरकारी मुकदमों में सरकार की ओर से पैरवी करते हैं और काम का आवंटन सॉलिसिटर जनरल (वर्तमान में तुषार मेहता) के कार्यालय से होता है – जो इसी मामले में CBI की ओर से पेश हो रहे हैं।
केजरीवाल का तर्क था कि यह “प्रत्यक्ष और गंभीर संघर्ष-हित का आभास” पैदा करता है। उन्होंने RTI उत्तर और सार्वजनिक रिकॉर्ड का हवाला दिया, जिसमें बताया गया कि इन बच्चों को सरकारी काम मिलता है। उनका कहना था कि जब जज के निकटतम परिवार के सदस्य उसी सरकार से लाभान्वित हो रहे हैं, जिसकी एजेंसी (CBI) मुकदमा लड़ रही है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
### CBI की प्रतिक्रिया: “सभी जज अयोग्य हो जाएंगे”
16 अप्रैल को CBI ने लिखित जवाब दाखिल किया। उसने केजरीवाल के आरोप को “देरी से उठाया गया, संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश” करार दिया। CBI ने स्पष्ट किया कि जज के बच्चे इस मामले में कभी शामिल नहीं थे और वे स्वतंत्र वकील हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात – CBI ने चेतावनी दी कि यदि केजरीवाल की लॉजिक मानी गई, तो:
– देश भर के जज, जिनके रिश्तेदार केंद्र/राज्य सरकार या PSU के किसी पैनल पर हैं, सरकारी मामलों या राजनीतिक नेताओं के मुकदमों से दूर रख दिए जाएंगे।
– इससे न्यायालयों का कामकाज ठप हो जाएगा।
CBI का कहना था कि यह तर्क “अव्यावहारिक” है और पूरे न्यायिक तंत्र को प्रभावित करेगा।
### संघर्ष-हित का कानूनी और नैतिक आयाम
भारतीय न्यायपालिका में *रिक्यूसल* का सिद्धांत *“प्रत्यक्ष या वास्तविक पूर्वाग्रह” (real likelihood of bias)* पर आधारित है, न कि केवल “आभास” पर। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों (जैसे केजरीवाल बनाम CBI से पहले के मामले और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम संजय सिंह) में कहा गया है कि जज को तब रिक्यूसल करना चाहिए जब कोई “उचित व्यक्ति” को पूर्वाग्रह का आभास हो।
हालांकि, *परिवार के सदस्यों की सरकारी नियुक्ति* को लेकर कोई स्पष्ट, बाध्यकारी कोड ऑफ एथिक्स नहीं है। कई जजों के रिश्तेदार वकील होते हैं और सरकारी पैनल पर नाम जुड़ना सामान्य माना जाता है। CBI की दलील ने यही तथ्य उजागर किया कि यह समस्या “व्यापक” है।
*ज्ञानवर्धक बिंदु:*
– *एम्पैनलमेंट* क्या है? केंद्र सरकार कानून मंत्रालय के माध्यम से वकीलों को पैनल पर नियुक्त करती है। इन वकीलों को सरकारी मुकदमों का काम मिलता है, जिससे आय होती है। यह सम्मानजनक होता है, लेकिन पारदर्शिता जरूरी है।
– *न्यायिक स्वतंत्रता vs जवाबदेही*: जजों की नियुक्ति, आचार संहिता और परिवार के हितों की घोषणा पर सुप्रीम कोर्ट और संसद दोनों स्तरों पर चर्चा होती रही है। 2023-24 में जजों की संपत्ति और हितों की घोषणा को लेकर भी बहस हुई थी।
– *आपसी संतुलन*: यदि हर छोटे संबंध को संघर्ष-हित मान लिया जाए, तो योग्य जजों की कमी हो सकती है। लेकिन यदि इसे नजरअंदाज किया जाए, तो जनता में न्याय व्यवस्था का विश्वास घटेगा।
### निष्कर्ष: पारदर्शिता और विश्वास की जरूरत
यह मामला केवल एक जज या एक नेता का नहीं है। यह पूरे न्यायिक तंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न है। CBI की दलील ने अनजाने में एक बड़े सवाल को सामने ला दिया – क्या न्यायपालिका को अपने आंतरिक संघर्ष-हितों पर एक स्पष्ट, लिखित और बाध्यकारी आचार संहिता (judicial code of conduct) की जरूरत है? जिसमें जजों के निकटतम परिवार के सरकारी/निजी हितों की घोषणा अनिवार्य हो।
अंततः, न्याय केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं – उसे *निष्पक्ष दिखना* भी चाहिए। जनता का विश्वास ही लोकतंत्र का आधार है। इस बहस से अगर एक सकारात्मक परिणाम निकला, तो वह होगा – न्यायपालिका में और अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक मजबूती।
*स्रोत आधारित तथ्य*: यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड, अदालती दस्तावेजों और समाचार रिपोर्टों पर आधारित है। न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है; अंतिम फैसला अदालत ही करेगी।
यह लेख पाठकों को तथ्यों से अवगत कराने और स्वयं सोचने-समझने के लिए प्रेरित करने का प्रयास है। न्याय व्यवस्था हम सबकी जिम्मेदारी है – उस पर सवाल उठाना उतना ही जरूरी है जितना उसका सम्मान करना।





