
— अधिवक्ता भारत सेन*
*जिला न्यायालय, बैतूल (मध्य प्रदेश)*
(समाचार पत्र विशेष लेख)
भारत में मध्यस्थता (Arbitration) को एक विश्वसनीय, तेज और कम खर्चीला विवाद समाधान तंत्र बनाने के लिए पिछले एक दशक में कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। *मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996* में 2015, 2019 और 2021 के संशोधनों के बाद अब *मध्यस्थता एवं सुलह (संशोधन) विधेयक, 2024* का मसौदा (Draft Arbitration and Conciliation (Amendment) Bill, 2024) अक्टूबर 2024 में जारी किया गया, जिस पर सार्वजनिक परामर्श भी हुआ। यह मसौदा संस्थागत मध्यस्थता को बढ़ावा देने, न्यायालयी हस्तक्षेप को कम करने और प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने पर केंद्रित है।
बैतुल जैसे जिला स्तर के ऋणियों, छोटे उद्यमियों और आम नागरिकों के लिए ये संशोधन विशेष रूप से प्रासंगिक हैं, क्योंकि फाइनेंस कंपनियों के साथ होने वाले विवादों में मध्यस्थता खंड अक्सर एकतरफा होता है। आइए हालिया विकास और प्रस्तावित बदलावों पर विस्तार से चर्चा करें।
### 1. पिछले प्रमुख संशोधन (2015, 2019 और 2021)
– *2015 संशोधन*: UNCITRAL मॉडल लॉ के अनुरूप अधिनियम को आधुनिक बनाया गया। मध्यस्थता की समय-सीमा 12 माह (अधिकतम 6 माह बढ़ोतरी) निर्धारित की गई। न्यायालयी हस्तक्षेप को सीमित किया गया और “पेटेंट इलिगैलिटी” (Patent Illegality) को घरेलू अवार्ड चुनौती का आधार बनाया।
– *2019 संशोधन*: मध्यस्थता परिषद् ऑफ इंडिया (Arbitration Council of India) का प्रावधान जोड़ा गया। अर्बिट्रेटर की योग्यता और शुल्क निर्धारण के नियम बनाए गए। संस्थागत मध्यस्थता को प्रोत्साहन दिया गया।
– *2021 संशोधन*: धारा 36 के तहत अवार्ड के प्रवर्तन (Execution) पर रोक लगाने के लिए अदालत को कुछ शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं, खासकर धोखाधड़ी या भ्रष्टाचार के प्रथम दृष्टया सबूत होने पर। यह संशोधन अवार्ड के शीघ्र प्रवर्तन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया गया था, हालांकि कुछ मामलों में यह विवादास्पद भी रहा।
इन संशोधनों का उद्देश्य भारत को वैश्विक मध्यस्थता केंद्र (Arbitration Hub) बनाने का था।
### 2. 2024 का प्रस्तावित संशोधन विधेयक: मुख्य विशेषताएं
अक्टूबर 2024 में जारी *ड्राफ्ट बिल* विशेषज्ञ समिति (Dr. T.K. Viswanathan समिति, फरवरी 2024 रिपोर्ट) की सिफारिशों पर आधारित है। इसके प्रमुख प्रस्ताव निम्नलिखित हैं:
– *अधिनियम का नाम परिवर्तन: “मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996” को “मध्यस्थता अधिनियम, 1996” (Arbitration Act, 1996) करने का प्रस्ताव। सुलह (Conciliation) संबंधी प्रावधानों को अलग कर **मध्यस्थता अधिनियम, 2023* के साथ जोड़ा जाएगा, जिससे कानून अधिक स्पष्ट और विशेषीकृत हो जाएगा।
– *आपातकालीन मध्यस्थता (Emergency Arbitration) का वैधानिक मान्यता*: नई धारा 9A जोड़कर संस्थागत मध्यस्थता के तहत आपातकालीन मध्यस्थ की नियुक्ति और अंतरिम राहत को कानूनी मान्यता दी जाएगी। इससे मुख्य मध्यस्थ मंडल बनने से पहले ही पक्षकारों को तत्काल राहत मिल सकेगी।
– *न्यायालयी हस्तक्षेप में कमी*: धारा 9 (अंतरिम राहत) और धारा 17 में संशोधन प्रस्तावित हैं, ताकि अदालतों का दखल कम हो और मध्यस्थ मंडल की प्राथमिकता बनी रहे। धारा 37 (अपील) के तहत समय-सीमा भी निर्धारित करने का प्रस्ताव है।
– *समय-सीमा का कड़ाई से पालन*: विभिन्न चरणों (जैसे धारा 11 में अर्बिट्रेटर नियुक्ति, धारा 34 की चुनौती आदि) के लिए सख्त समय-सीमा (60 दिन, 30 दिन आदि) प्रस्तावित की गई है, जिससे प्रक्रिया तेज होगी।
– *अपीलेट आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल (Appellate Arbitral Tribunal)*: संस्थागत मध्यस्थता के तहत धारा 34 की चुनौतियों को सुनने के लिए अपीलेट ट्रिब्यूनल बनाने का विचार, जिससे अदालतों पर बोझ कम होगा।
– *पेटेंट इलिगैलिटी का विस्तार*: अंतर्राष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता (ICA) में भी “पेटेंट इलिगैलिटी” को चुनौती का आधार बनाने का प्रस्ताव, जिससे घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में समानता आएगी।
– *अन्य सुधार*: सीट (Seat) और वेन्यू (Venue) की स्पष्ट परिभाषा, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ावा, मध्यस्थ शुल्क निर्धारण में संस्थाओं की भूमिका मजबूत करना आदि।
ये बदलाव “Ease of Doing Business” और “Enforcement of Contracts” को मजबूत करने के उद्देश्य से हैं।
### 3. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले और उनके प्रभाव
2024-2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी मध्यस्थता कानून को आकार दिया है:
– *Gayatri Balasamy v. ISG Novasoft (2025)*: पांच न्यायाधीशों की बेंच ने धारा 34 और 37 के तहत अदालतों को अवार्ड में सीमित संशोधन (Modification) का अधिकार दिया, लेकिन केवल स्पष्ट त्रुटि, गणितीय गलती या पेटेंट इलिगैलिटी के मामलों में। यह फैसला पूर्ण रद्द करने या नए मध्यस्थता की बजाय कुशल समाधान को प्राथमिकता देता है।
– *एकतरफा नियुक्ति पर सख्ती*: Perkins Eastman (2019) और CORE (2024) जैसे पुराने फैसलों की भावना को बनाए रखते हुए अदालत ने निष्पक्षता पर जोर दिया है।
– अन्य फैसलों में गैर-हस्ताक्षरकर्ता पक्षों को शामिल करने (Group of Companies Doctrine), गोपनीयता और अवार्ड की प्रवर्तनीयता पर स्पष्टता लाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में केंद्र सरकार से 2024 के विधेयक पर तेजी से कार्रवाई करने की अपील की है।
### 4. बैतुल के ऋणियों के लिए निहितार्थ
फाइनेंस कंपनियों द्वारा दिल्ली या अन्य दूर के स्थानों का मध्यस्थता खंड डालने की प्रथा अभी भी जारी है। प्रस्तावित संशोधन *आपातकालीन राहत, **समय-सीमा* और *संस्थागत मध्यस्थता* को मजबूत करके छोटे ऋणियों को बेहतर सुरक्षा देंगे। धारा 34 की चुनौती में “पेटेंट इलिगैलिटी” और “प्रकृति न्याय” के उल्लंघन (जैसे अनुचित सूचना या एकतरफा नियुक्ति) अभी भी मजबूत आधार बने रहेंगे।
बैतुल के निवासियों को सलाह है कि अनुबंध में मध्यस्थता खंड पढ़ें, स्थानीय अदालत का अधिकार क्षेत्र तर्क दें और अवार्ड मिलते ही 90 दिनों के अंदर चुनौती दें।
### निष्कर्ष
मध्यस्थता के हालिया और प्रस्तावित संशोधन भारत को एक आधुनिक, पक्षकार-अनुकूल मध्यस्थता गंतव्य बनाने की दिशा में सकारात्मक कदम हैं। हालांकि, इनका सफल क्रियान्वयन संस्थागत मध्यस्थता की क्षमता, प्रशिक्षित मध्यस्थों की उपलब्धता और न्यायालयों की अनुशासनबद्धता पर निर्भर करेगा।
*अधिवक्ता भारत सेन* की ओर से बैतुल के नागरिकों से अपील — जागरूक रहें, अनुबंधों में सावधानी बरतें और मध्यस्थता प्रक्रिया के दुरुपयोग के विरुद्ध अपने अधिकारों की रक्षा करें। कानून का उद्देश्य न्याय है, न कि शक्तिशाली पक्ष की मनमानी।
*अधिवक्ता भारत सेन*
जिला न्यायालय, बैतुल (म.प्र.)
(मध्यस्थता एवं वाणिज्यिक कानून विशेषज्ञ)
(यह लेख सामान्य सूचना के उद्देश्य से है। नवीनतम विकास के लिए आधिकारिक अधिसूचना और व्यक्तिगत मामले में योग्य वकील से परामर्श अवश्य लें।)





