
*लेखक: अधिवक्ता भारत सेन*
*जिला न्यायालय, बैतूल (मध्य प्रदेश)*
नई आपराधिक प्रक्रिया व्यवस्था के अंतर्गत *भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023* 1 जुलाई 2024 से लागू हो चुकी है। यह संहिता पुराने *दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC, 1973)* की जगह ले चुकी है। BNSS में जमानत संबंधी प्रावधान *अध्याय XXXV (धारा 478 से 496)* के अंतर्गत आते हैं। इनमें कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जो विचाराधीन कैदियों (undertrial prisoners) को राहत देने के साथ-साथ जांच एजेंसियों को भी समयबद्धता की अनुशासन देते हैं।
ये प्रावधान *अनुच्छेद 21* के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करते हुए जमानत को “नियम” और जेल को “अपवाद” बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं। आइए, मुख्य प्रावधानों का सरल और व्यावहारिक विश्लेषण करें:
### 1. जमानत की परिभाषा और प्रकार (Section 2(1)(b))
BNSS की धारा 2(1)(b) में *“जमानत”* को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है:
“जमानत का अर्थ है किसी अपराध के आरोपी या संदिग्ध व्यक्ति को कानून की हिरासत से रिहा करना, जब किसी अधिकारी या न्यायालय द्वारा बांड या जमानत बांड के निष्पादन पर कुछ शर्तें लगाई जाती हैं।”
*मुख्य प्रकार की जमानत:*
– *जमानतीय अपराध (Bailable Offence)* — धारा 478: आरोपी को जमानत का अधिकार है। गरीब व्यक्ति को व्यक्तिगत बांड (personal bond) पर भी रिहा किया जा सकता है।
– *गैर-जमानतीय अपराध (Non-Bailable Offence)* — धारा 480: न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति। अपराध की गंभीरता, आरोपी का आपराधिक इतिहास, गवाहों पर प्रभाव आदि को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाता है।
– *अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail)* — धारा 482 (पुरानी धारा 438 CrPC): गिरफ्तारी की आशंका होने पर सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय से पहले से जमानत मांगी जा सकती है। BNSS में कुछ सरलीकरण किया गया है — सार्वजनिक अभियोजक को अनिवार्य सुनवाई और आवेदक की उपस्थिति की अनिवार्यता को हटा दिया गया है, जिससे प्रक्रिया तेज हुई है।
– *डिफॉल्ट/स्टेट्यूटरी जमानत (Default Bail)* — धारा 187(3): जांच एजेंसी यदि चार्जशीट समय पर दाखिल नहीं करती, तो आरोपी को स्वतः जमानत का अधिकार हो जाता है।
– *अंडरट्रायल कैदियों के लिए विशेष राहत* — धारा 479: जेलों की भीड़भाड़ कम करने के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान।
### 2. डिफॉल्ट जमानत (Default/Statutory Bail) – धारा 187(3)
यह BNSS का सबसे मजबूत प्रावधान है, जो जांच में देरी को दंडित करता है:
– *60 दिन* — उन अपराधों में जहां अधिकतम सजा 7 वर्ष तक है।
– *90 दिन* — गंभीर अपराधों में (मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 10 वर्ष से अधिक सजा वाले मामलों में)।
यदि इस अवधि में चार्जशीट दाखिल नहीं होती, तो आरोपी बांड देकर जमानत पाने का हकदार हो जाता है। यह अधिकार “इंडिफेंसिबल” (अटल) है।
*नया बदलाव:* पुलिस हिरासत अब 15 दिन तक हो सकती है, जिसे न्यायिक हिरासत की शुरुआती अवधि (40 या 60 दिन) में बांटकर लिया जा सकता है। इससे डिफॉल्ट जमानत की गणना प्रभावित हो सकती है, इसलिए वकीलों को सतर्क रहना चाहिए।
### 3. विचाराधीन कैदियों (Undertrial Prisoners) के लिए क्रांतिकारी प्रावधान – धारा 479
यह धारा जेलों में लंबे समय से बंद निर्दोषों या छोटे अपराधियों के लिए बड़ी राहत है:
– पहली बार अपराध करने वाले (first-time offenders) को *अधिकतम सजा के एक तिहाई (1/3)* समय पूरा करने पर *व्यक्तिगत बांड* पर रिहा किया जा सकता है।
– अन्य मामलों में *अधिकतम सजा के आधे (1/2)* समय पूरा करने पर जमानत का अधिकार।
– जेल अधीक्षक को भी ऐसे कैदियों की पहचान कर न्यायालय को रिपोर्ट देने का दायित्व दिया गया है।
– केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को ई-जेल पोर्टल के माध्यम से इन कैदियों की शीघ्र पहचान करने के निर्देश दिए हैं।
*विश्लेषण:* यह प्रावधान जेलों की भीड़ कम करने और अनावश्यक हिरासत रोकने में सहायक है। बेतुल जैसे जिला न्यायालयों में वकील भाइयों को इस धारा का सक्रिय उपयोग करना चाहिए, खासकर छोटे-मोटे अपराधों और पहली बार फंसने वाले युवाओं के मामलों में।
### 4. अन्य महत्वपूर्ण बदलाव और स्पष्टीकरण
– *जमानत शर्तें:* BNSS में “bail bond” और “personal bond” की स्पष्ट परिभाषा जोड़ी गई है। न्यायालय अब शर्तें लगाते समय कारण दर्ज करेगा।
– *बहु-आरोप मामलों में सख्ती:* यदि कोई व्यक्ति कई अलग-अलग अपराधों में आरोपी है, तो जमानत मिलना कठिन हो सकता है।
– *अग्रिम जमानत में लचीलापन:* BNSS ने न्यायालय को अधिक विवेक दिया है, लेकिन कुछ मामलों (जैसे नाबालिगों से संबंधित बलात्कार) में सख्ती बरती गई है।
– *समयबद्धता:* उच्च न्यायालयों और सत्र न्यायालयों को जमानत याचिकाओं का शीघ्र निपटारा करने पर जोर।
### 5. व्यावहारिक सलाह (जिला न्यायालय स्तर पर)
– जमानत याचिका दायर करते समय *धारा 479* का उल्लेख अवश्य करें यदि आरोपी undertrial है और समयावधि पूरी कर चुका है।
– डिफॉल्ट जमानत के लिए *धारा 187(3)* का सख्ती से पालन करवाएं — समय की गणना सावधानीपूर्वक करें।
– अग्रिम जमानत में धारा 482 का उपयोग करते समय आरोपी की भूमिका, अपराध की प्रकृति और फर्जी मुकदमे की आशंका को स्पष्ट तथ्यों से साबित करें।
– सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसलों (जैसे अशोक धनकड़ मामले) को BNSS प्रावधानों के साथ जोड़कर तर्क दें।
### निष्कर्ष
BNSS जमानत प्रावधानों में *दोहरी दृष्टि* अपनाई गई है — एक ओर निर्दोषों और छोटे अपराधियों को तेज राहत, दूसरी ओर गंभीर अपराधों में जांच एजेंसियों को मजबूत करने के साथ समयबद्धता। यह संहिता “जमानत नियम है, जेल अपवाद” के सिद्धांत को व्यावहारिक रूप देने की कोशिश है।
परंतु सफलता न्यायालयों, वकीलों और पुलिस के समन्वय पर निर्भर करेगी। यदि इन प्रावधानों का सही क्रियान्वयन हुआ, तो भारतीय जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आएगी और न्याय व्यवस्था अधिक मानवीय एवं कुशल बनेगी।
सभी सहयोगी अधिवक्ता बंधुओं से अपील है कि BNSS की धारा 478-496 और 187, 479 का गहन अध्ययन करें तथा जिला स्तर पर इनका प्रभावी उपयोग करें।
*भारत सेन*
अधिवक्ता
जिला न्यायालय, बैतूल (म.प्र.)





