
*धारा 391 दंड प्रक्रिया संहिता: अपीलीय न्यायालय की अतिरिक्त साक्ष्य लेने की शक्ति – एक विश्लेषण*
*लेखक: भारत सेन, अधिवक्ता, जिला न्यायालय, बैतूल (म.प्र.)* Mobile No 9827306273
*न्याय की खोज में अतिरिक्त साक्ष्य: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला*
हाल ही में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के एकलपीठ (न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास) ने मोह. इफ्तेखार रजा बनाम रत्नेश जैन (ACQA No. 284 of 2024, निर्णय दिनांक 12.03.2025) में दंड प्रक्रिया संहिता की *धारा 391* के बुनियादी सिद्धांतों पर प्रकाश डाला है। यह फैसला Negotiable Instruments Act की धारा 138 के अंतर्गत acquittal appeal में अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करने और मामले को remand करने के संदर्भ में अत्यंत उपयोगी है।
### धारा 391 CrPC के बुनियादी सिद्धांत
धारा 391 CrPC अपीलीय न्यायालय (Sessions Court, High Court या Supreme Court) को अपील के दौरान अतिरिक्त साक्ष्य लेने की शक्ति प्रदान करती है। यह शक्ति *न्याय की विफलता को रोकने* के लिए है, न कि किसी पक्ष को अपनी कमजोरी पूरी करने का अवसर देने के लिए।
*मुख्य बिंदु:*
– अपीलीय न्यायालय स्वयं अतिरिक्त साक्ष्य ले सकता है या साक्ष्य लेने के लिए मामले को निचली अदालत को भेज सकता है।
– अतिरिक्त साक्ष्य तभी स्वीकार किया जाना चाहिए जब वह *न्यायपूर्ण निर्णय* के लिए आवश्यक हो और बिना उसके न्याय की विफलता हो सकती हो।
– यह शक्ति *सीमित* है और लापरवाही या जानबूझकर छोड़े गए साक्ष्य को पूरक बनाने के लिए नहीं है।
### बचाव पक्ष (Accused) धारा 391 का प्रयोग कब कर सकता है?
बचाव पक्ष अपील में (खासकर acquittal appeal का जवाब देते हुए या अपनी अपील में) अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत कर सकता है, यदि:
1. वह साक्ष्य *मूल मुकदमे के दौरान उपलब्ध नहीं था* या *उचित प्रयास के बावजूद प्राप्त नहीं हो सका*।
2. साक्ष्य *मामले की सच्चाई* को उजागर करने वाला हो और न्याय के हित में आवश्यक हो।
3. ट्रायल कोर्ट ने oral evidence तो लिया, लेकिन documentary proof की कमी के कारण acquittal दिया हो, और नए दस्तावेज उस कमी को सही-सही भरने वाले हों।
*छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस मामले में* बचाव पक्ष (अपीलार्थी) ने ट्रायल के दौरान underlying transaction (आम तौर पर cheque के पीछे का लेन-देन) के संबंध में oral evidence दी थी, लेकिन documentary proof (agreement to sell, bank statement और आरोपी द्वारा दायर पुलिस शिकायत) अपील चरण में प्रस्तुत किए। उच्च न्यायालय ने इन्हें “glaring lacuna” नहीं माना, बल्कि *just adjudication* के लिए आवश्यक माना।
### अपीलीय न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य कब स्वीकार कर सकता है?
न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार कर सकता है जब:
– साक्ष्य *crucial* हो और बिना इसके सच्चाई का पता नहीं चल सकता।
– ट्रायल कोर्ट ने acquittal आंशिक रूप से documentary proof की कमी के कारण दिया हो।
– साक्ष्य filling lacuna नहीं, बल्कि *truth-seeking* की प्रक्रिया को पूरा कर रहा हो।
*संदर्भित landmark judgments:*
– Zahira Habibullah H. Sheikh v. State of Gujarat (2004) 4 SCC 158 – न्याय की खोज में अतिरिक्त साक्ष्य की अनुमति।
– Ajitsinh Chehuji Rathod v. State of Gujarat, 2024 INSC 63 – समान सिद्धांतों की पुष्टि।
### मामले को Remand Back कब किया जा सकता है?
जब अपीलीय अदालत अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार कर लेती है, तो कई बार उचित रणनीति यह होती है कि:
– Acquittal order को set aside किया जाए।
– नए दस्तावेजों को record पर लिया जाए।
– मामले को ट्रायल कोर्ट को *fresh decision* के लिए भेज दिया जाए, जिसमें दोनों पक्षों को नए साक्ष्यों पर evidence lead करने, cross-examination करने और arguments करने का पूरा अवसर दिया जाए।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ठीक यही किया। न्यायमूर्ति व्यास ने स्पष्ट किया कि जब underlying transaction पर oral evidence पहले से मौजूद हो और नए दस्तावेज उसकी पुष्टि करते हों, तो remand करना उचित है ताकि दोनों पक्षों को न्याय मिल सके।
### व्यावहारिक सलाह (अधिवक्ताओं के लिए)
1. *ट्रायल स्टेज पर* जितना संभव हो, सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज पेश कर दें।
2. यदि कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य छूट गया हो, तो अपील में * affidavit* के साथ स्पष्ट कारण बताएं कि वह क्यों पहले नहीं पेश किया जा सका।
3. *धारा 391* का आवेदन सोच-समझकर करें – यह “second innings” नहीं है, बल्कि न्याय की अंतिम खोज का साधन है।
4. Negotiable Instruments Act के मामलों में cheque के पीछे का लेन-देन साबित करना सबसे महत्वपूर्ण होता है। Documentary evidence (agreement, bank statements, correspondence) की कमी अक्सर acquittal का कारण बनती है।
*निष्कर्ष:*
धारा 391 CrPC न्यायिक प्रक्रिया को कठोर नहीं, बल्कि लचीला बनाती है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह फैसला पुनः स्थापित करता है कि *technicalities* से ऊपर उठकर *सच्चाई और न्याय* को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह फैसला अधिवक्ताओं और न्यायार्थियों दोनों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगा, खासकर Section 138 NI Act के अपीलों में।
*न्याय की जीत हो।*
*भारत सेन*
अधिवक्ता
जिला न्यायालय, बैतूल (म.प्र.)
(समाचार पत्रों/विधि पत्रिकाओं के लिए विशेष लेख)