
ब्यूरो रिपोर्ट
*सतपुड़ा ताप विद्युत गृह सारणी में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी का मामला पहुँचा राज्य सूचना आयोग*
*धारा 8(1)(d) का हवाला देकर मजदूरों और भुगतान से जुड़े दस्तावेज रोके जाने पर बढ़ा विवाद*राज्य सूचना आयोग ने जारी किया सुनवाई पत्र*
Madhya Pradesh State Information Commission में Satpura Thermal Power Station से जुड़ा सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का मामला पहुंच गया है।
आरटीआई कार्यकर्ता दीनदयाल गुर्जर द्वारा दायर द्वितीय अपील को स्वीकार करते हुए राज्य सूचना आयोग ने सुनवाई के लिए पत्र जारी कर दिया है। आयोग द्वारा आगामी 3 जुलाई को प्रकरण की सुनवाई निर्धारित की गई है, जिससे प्लांट प्रशासन और संबंधित अधिकारियों में हलचल तेज हो गई है।
*मजदूरों और भुगतान से जुड़ी जानकारी मांगी गई थी*
दीनदयाल गुर्जर द्वारा सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत ठेका मजदूरों की सूची, पीसीआर रिकॉर्ड, ईपीएफ चालान, भुगतान स्लिप तथा ठेकेदारों को किए जा रहे भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई थी।
लेकिन आरोप है कि सी-ऑफिस में पदस्थ अधिकारी श्री पंवार द्वारा सूचना अधिकारियों को धारा 8(1)(d) का हवाला देते हुए जानकारी देने से रोक दिया गया। अधिकारियों का कहना था कि मांगी गई जानकारी “निजता” और “व्यावसायिक गोपनीयता” की श्रेणी में आती है।
*सार्वजनिक धन की जानकारी को बताया निजी*
आरटीआई कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकारी कंपनी में मजदूरों को किए जा रहे भुगतान, ईपीएफ जमा राशि और ठेका प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक हित से जुड़े होते हैं। ऐसे में इन्हें निजी बताकर रोकना कई सवाल खड़े करता है।
सूत्रों के अनुसार, प्लांट में मजदूरों की संख्या, भुगतान प्रक्रिया और ईपीएफ रिकॉर्ड में गड़बड़ियों की आशंका लंबे समय से जताई जा रही है। आरोप है कि इन्हीं संभावित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को छुपाने के लिए जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही।
*प्रथम अपील खारिज, अब आयोग से उम्मीद*
सूचना नहीं मिलने पर दीनदयाल गुर्जर द्वारा प्रथम अपील की गई थी, जिसे मुख्य अभियंता कार्यालय ने खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने मामला राज्य सूचना आयोग तक पहुंचाया।
अब आयोग द्वारा सुनवाई तय किए जाने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि मजदूरों और सार्वजनिक धन से जुड़े मामलों की सच्चाई सामने आ सकती है।
*पारदर्शिता बनाम गोपनीयता का सवाल*
सरकारी उपक्रम में मजदूरों और सार्वजनिक भुगतान से जुड़े दस्तावेजों को “निजी जानकारी” बताकर रोकना अब बहस का विषय बन गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि सूचना के अधिकार कानून के बावजूद जानकारी नहीं दी जाएगी, तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल हो जाएगा।
अब सभी की नजरें 3 जुलाई को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि मांगी गई जानकारी सार्वजनिक की जाएगी या नहीं