
ब्यूरो रिपोर्ट
*”हस्ताक्षरकर्ता के हस्ताक्षर भिन्न” के आधार पर चेक बाउंस केस में आरोपी महिला बरी, अधिवक्ता भारत सेन के मजबूत बचाव से मिली राहत*
*समाचार (विस्तृत और आरोपी पक्ष पर केंद्रित):*
बेतूल, मध्य प्रदेश। एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसले में *प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट रितु प्रजापति* ने *नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138* (चेक बाउंस) के तहत दर्ज मामले में आरोपी *कंचन गौर* (पत्नी राजकुमार गौर, निवासी तिलक वार्ड, टिकारी, बेतूल) को *पूर्णतः दोषमुक्त* घोषित कर दिया है। यह फैसला 29 जनवरी 2026 को सुनाया गया।
मामले में शिकायतकर्ता *दुर्गाप्रसाद तिलारे* (मोती वार्ड, टिकारी, बेतूल) ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने 22 दिसंबर 2020 को उन्हें *1,36,000 रुपये* का चेक (चेक नंबर 000037, HDFC बैंक, गंज शाखा, बेतूल) दिया था, जो कथित उधार राशि के बदले में था। चेक बैंक में जमा करने पर 24 दिसंबर 2020 को *”हस्ताक्षरकर्ता के हस्ताक्षर भिन्न हैं”* (Drawer’s signature differs) के कारण रिजेक्ट हो गया। शिकायतकर्ता ने 16 जनवरी 2021 को रजिस्टर्ड नोटिस भेजा, लेकिन भुगतान नहीं हुआ। उन्होंने दावा किया कि आरोपी ने जनवरी 2020 में ब्यूटी पार्लर के लिए सामान खरीदने हेतु नकद उधार लिया था और जानबूझकर गलत हस्ताक्षर करके धोखा दिया।
### आरोपी का मजबूत बचाव और अधिवक्ता भारत सेन की भूमिका
आरोपी कंचन गौर की ओर से *अधिवक्ता भरत सेन* (जिला न्यायालय, बेतूल में प्रैक्टिस करने वाले अनुभवी वकील, जिनकी विशेषज्ञता नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट के मामलों में है) ने अत्यंत प्रभावी और तथ्यपरक बचाव पेश किया। अधिवक्ता भरत सेन ने निम्नलिखित प्रमुख तर्क दिए, जो अदालत द्वारा स्वीकार किए गए:
– *चेक पर आरोपी के हस्ताक्षर नहीं हैं* — अधिवक्ता भरत सेन ने जोर देकर कहा कि चेक पर कंचन गौर के हस्ताक्षर बिल्कुल नहीं हैं। यह चेक *HDFC बैंक* से महिला समूह ऋण (ग्रुप लोन) के लिए खाली रूप में टीम लीडर *ममत तिलारे* (शिकायतकर्ता की पत्नी) को सौंपा गया था। लोन 9 जनवरी 2018 को लिया गया और 24 मासिक किश्तों में पूरी तरह चुका दिया गया।
– *चेक का दुरुपयोग* — बैंक ने लोन प्रक्रिया में खाली चेक मांगा था। आरोपी ने ममत तिलारे को चेक दिया, लेकिन चेक वापस नहीं मिला। अधिवक्ता भरत सेन ने तर्क दिया कि चेक का दुरुपयोग किया गया, और आरोपी को बाद में पता चला।
– *शिकायतकर्ता से कोई लेन-देन नहीं* — अधिवक्ता भरत सेन ने साबित किया कि शिकायतकर्ता से आरोपी का कोई उधार या वित्तीय संबंध नहीं था। दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते। यह झूठा फंसाने का प्रयास है।
– *शिकायतकर्ता की आर्थिक क्षमता पर सवाल* — अधिवक्ता भरत सेन ने क्रॉस-एक्जामिनेशन में शिकायतकर्ता से स्वीकार करवाया कि:
– कोई लिखित समझौता, रजिस्टर्ड दस्तावेज या बैंक स्टेटमेंट नहीं है।
– 1.36 लाख रुपये नकद देने का कोई प्रमाणित स्रोत नहीं।
– बड़े लेन-देन में लिखित रिकॉर्ड जरूरी होता है, जो नहीं किया गया।
– आरोपी की मासिक आय केवल 15-20 हजार रुपये (ब्यूटी पार्लर से) है।
### अदालत का फैसला और आधार
अदालत ने *धारा 118* और *धारा 139* के वैधानिक अनुमान का विश्लेषण किया, लेकिन अधिवक्ता भरत सेन के तर्कों और सबूतों के आधार पर निष्कर्ष निकाला:
– शिकायतकर्ता *वैध रूप से वसूली योग्य ऋण* साबित करने में असफल रहा।
– आरोपी ने *संभाव्य रक्षा* (probable defence) सफलतापूर्वक साबित की कि चेक उनके हस्ताक्षर से नहीं भरा गया।
– “हस्ताक्षरकर्ता के हस्ताक्षर भिन्न हैं” का बैंक रिटर्न आरोपी के पक्ष में मजबूत सबूत है।
– कोई लिखित प्रमाण या बैंक स्टेटमेंट नहीं पेश किया गया।
– सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (रंगप्पा बनाम मोहन, बसलिगप्पा बनाम मुदीबासप्पा आदि) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि आरोपी ने अनुमान को संभाव्यता से खारिज कर दिया।
अंत में अदालत ने आरोपी *कंचन गौर* को *धारा 138* के तहत *दोषमुक्त* घोषित किया और जमानत मुचलका रद्द कर दिया।
यह फैसला उन मामलों के लिए मिसाल है जहां चेक पर हस्ताक्षर विवादित हों और कोई ठोस प्रमाण न हो। *अधिवक्ता भरत सेन* के कुशल बचाव और तर्कों के कारण आरोपी को न्याय मिला।