
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
नई दिल्ली: केंद्रीय कानून मंत्रालय ने लोकसभा में एक लिखित जवाब में बताया कि पिछले दस वर्षों (2016 से 2025 तक) में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के कार्यालय को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के बैठे हुए न्यायाधीशों के खिलाफ कुल *8,630 शिकायतें* प्राप्त हुई हैं। यह जानकारी 13 फरवरी 2026 को लोकसभा में साझा की गई, जिससे न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और शिकायत निवारण तंत्र पर नई बहस छिड़ गई है।
यह आंकड़ा द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के सांसद *माथेश्वरन वी.एस.* द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में राज्य मंत्री (कानून और न्याय) *अर्जुन राम मेघवाल* द्वारा प्रस्तुत किया गया। सांसद ने न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार, यौन दुराचार या अन्य गंभीर अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों के रिकॉर्ड रखने के तंत्र, उनकी संख्या और सरकार द्वारा इनकी निगरानी के बारे में जानकारी मांगी थी।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें मुख्य न्यायाधीश द्वारा अदालत के *’इन-हाउस प्रक्रिया’* (In-house Procedure) के तहत प्राप्त की जाती हैं। इसी तरह, हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें संबंधित हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों द्वारा संभाली जाती हैं। यह प्रक्रिया 1997 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई गई थी, जिसके तहत शिकायतों की जांच न्यायपालिका के भीतर ही की जाती है और इसमें कार्यपालिका का कोई हस्तक्षेप नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, इन शिकायतों में उतार-चढ़ाव देखा गया है, लेकिन कोविड के बाद इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्षवार प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं:
– 2016: 729 शिकायतें
– 2020: सबसे कम (518)
– 2024: सबसे अधिक *1,170* शिकायतें (पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ और संजीव खन्ना के कार्यकाल के दौरान)
– 2025: *1,102* शिकायतें
कुल मिलाकर, 2016 से 2025 तक शिकायतों में लगभग 51% की वृद्धि दर्ज की गई है। कई रिपोर्टों में बताया गया है कि 2024 में प्राप्त शिकायतों की संख्या दशक की सबसे ऊंची रही, जो नागरिकों द्वारा न्यायिक प्रक्रिया पर बढ़ते असंतोष या जागरूकता को दर्शाती है।
सरकार ने यह भी दोहराया कि न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों का निपटारा पूरी तरह न्यायपालिका के आंतरिक तंत्र से होता है, और CPGRAMS (केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली) जैसी सरकारी व्यवस्था इन मामलों में लागू नहीं होती।
यह खुलासा न्यायिक जवाबदेही पर लंबे समय से चली आ रही बहस को नई गति दे सकता है, जहां एक ओर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना जाता है, वहीं दूसरी ओर जनता की शिकायतों के उचित निवारण की मांग भी तेज हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से अधिकांश शिकायतें जांच के बाद निराधार साबित होती हैं, लेकिन बड़ी संख्या में शिकायतें न्यायिक प्रणाली पर दबाव और पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
(स्रोत: लोकसभा में साझा आधिकारिक आंकड़े, लाइव लॉ, बार एंड बेंच, मनीकंट्रोल, द प्रिंट आदि से संकलित जानकारी)






