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*बैतूल, मध्यप्रदेश – 20 फरवरी 2026*
(हिंदी समाचार पत्र के लिए विशेष टैक्स-कोर्ट रिपोर्ट)
**“चेक बाउंस केस में आयकर अधिनियम की धारा 139, 269SS और 44AB निर्णायक!
बैतूल कोर्ट का आदेश – ITR व ऑडिटेड बैलेंस शीट बिना वित्तीय क्षमता साबित नहीं होगी”**
*भैंसदेही (बैतूल)* – परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 की धारा 138 के तहत दायर चेक बाउंस मामले में न्यायिक दण्डाधिकारी प्रथम श्रेणी महेन्द्र सिंह की अदालत ने एक बार फिर साबित कर दिया कि *आयकर अधिनियम, 1961* की विभिन्न धाराएँ अब सीधे-सीधे धारा 138 के मामलों को प्रभावित करती हैं। अदालत ने परिवादी महेश घीघोड़े को वित्तीय वर्ष 2019-20, 2020-21 एवं 2021-22 के आयकर रिटर्न (ITR) तथा ऑडिटेड बैलेंस शीट दाखिल करने का निर्देश दे दिया।
*मामला संक्षेप में*
परिवादी ने आरोपी भारत डढ़ोड़े को अक्टूबर 2019 में ₹2 लाख नकद उधार दिए। चेक बाउंस होने पर धारा 138 का परिवाद दायर किया। बचाव पक्ष के अधिवक्ता भारत सेन ने जिरह में परिवादी की वित्तीय क्षमता पर सवाल उठाया – “कृषक, मछली पालन और स्कूल चलाने वाले व्यक्ति ने दो महीने में ₹9 लाख (₹2 लाख + ₹7 लाख अन्य को) नकद उधार कैसे दिए?” बचाव पक्ष ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 के तहत ITR व बैलेंस शीट मांगे। अदालत ने माना कि *न्यायपूर्ण फैसले के लिए परिवादी की वित्तीय क्षमता स्थापित करना जरूरी है*।
*आयकर अधिनियम की वे प्रमुख धाराएँ जो धारा 138 NI Act को सीधे प्रभावित करती हैं:*
1. *धारा 139 (आयकर रिटर्न दाखिल करना)*
हर व्यक्ति जिसकी कुल आय कर सीमा से अधिक हो, ITR दाखिल करने के लिए बाध्य है। स्वैच्छिक ITR भी कोर्ट में सबसे मजबूत प्रमाण माना जाता है।
*प्रभाव:* चेक बाउंस केस में “legally enforceable debt” साबित करने के लिए परिवादी को अपनी आय का स्रोत दिखाना पड़ता है। अगर ITR में उधार दी गई रकम या आय नहीं दिखाई गई तो आरोपी presumption under Section 139 NI Act को rebut कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में ITR के आधार पर complainant की capacity पर सवाल उठाकर acquittal दी है। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने भी कहा है कि ITR न दाखिल करने मात्र से स्रोत का अभाव नहीं माना जा सकता, लेकिन जब आरोपी challenge करता है तो ITR produce करना पड़ता है।
2. *धारा 269SS (नकद ऋण/जमा पर प्रतिबंध)*
₹20,000 या उससे अधिक की रकम नकद में ऋण लेना या जमा करना प्रतिबंधित है (केवल अकाउंट पेयी चेक/ड्राफ्ट/इलेक्ट्रॉनिक मोड से)।
*प्रभाव:* इस मामले में आरोपी ने ₹2 लाख नकद लिया – यह धारा 269SS का उल्लंघन है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले (संजाबिज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर, 2025) में साफ कहा गया कि *269SS का उल्लंघन केवल धारा 271D के तहत पेनाल्टी का कारण बनता है, ऋण को “illegal” या “unenforceable” नहीं बनाता*। इसलिए चेक बाउंस केस में परिवादी अभी भी राहत पा सकता है, लेकिन ITR में स्रोत साफ दिखाना जरूरी।
3. *धारा 271D (पेनाल्टी)*
269SS उल्लंघन पर उधार लेने वाले पर पेनाल्टी।
*प्रभाव:* आरोपी पर टैक्स विभाग पेनाल्टी लगा सकता है, लेकिन NI Act केस में बचाव नहीं बनता।
4. *धारा 44AB (टैक्स ऑडिट)*
बिजनेस/प्रोफेशन का टर्नओवर ₹1 करोड़ (या प्रीसम्प्टिव टैक्सेशन में कुछ शर्तों पर) से अधिक होने पर ऑडिटेड बैलेंस शीट जरूरी।
*प्रभाव:* परिवादी स्कूल (बिजनेस) और मछली पालन चला रहे हैं। अदालत ने इसी कारण ऑडिटेड बैलेंस शीट मांगी – ताकि साबित हो कि ₹9 लाख नकद उधार देने की क्षमता थी।
*अदालत का महत्वपूर्ण टिप्पणी*
“जब परिवादी इतनी बड़ी रकम नकद उधार दे रहा है तो आयकर रिटर्न और बैलेंस शीट के बिना वित्तीय क्षमता कैसे साबित होगी? यह परिवाद के न्यायपूर्ण निराकरण के लिए आवश्यक है।”
*टैक्स एडवोकेट का विश्लेषण*
यह फैसला पूरे देश के लिए मिसाल है। अब चेक बाउंस केस में आरोपी पक्ष ITR, बैलेंस शीट, बैंक स्टेटमेंट मांगकर बचाव कर सकता है। परिवादी अगर ITR में आय नहीं दिखाता या नकद लेन-देन 269SS का उल्लंघन करता है तो केस कमजोर हो जाता है।
*सुप्रीम कोर्ट का स्टैंड:* कैश लोन 20,000 से ऊपर होने पर भी NI Act के तहत मान्य, लेकिन स्रोत ITR से साबित करना पड़ता है।
*सलाह (टैक्स एडवोकेट के रूप में):*
– हर उधार देने वाले को हर साल ITR दाखिल करें (आय कम होने पर भी)।
– ₹20,000 से अधिक नकद लेन-देन बिल्कुल न करें।
– स्कूल/बिजनेस चलाने वालों को 44AB ऑडिट करवाएँ।
– पुराने केस में भी अब ITR जमा करवाकर मजबूत बचाव/दावा तैयार करें।
यह बैतूल कोर्ट का आदेश धारा 138 के हजारों लंबित मामलों में नई दिशा दे रहा है – *ITR अब सिर्फ टैक्स डॉक्यूमेंट नहीं, बल्कि कोर्ट में “वित्तीय विश्वसनीयता का सबसे बड़ा प्रमाण”* बन गया है।
(रिपोर्ट: टैक्स एडवोकेट एवं कोर्ट रिपोर्टर)
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