
वरिष्ठ अधिवक्ता भारत सेन
यह दस्तावेज़ भारत के सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है, जो 6 जनवरी 2026 को सुनाया गया। यह क्रिमिनल अपील नंबर (एसएलपी (क्रिमिनल) नंबर 18127/2024 से निकली) है, जिसमें अपीलकर्ता एस. नागेश हैं और प्रतिवादी शोभा एस. अराध्या हैं। जज संजय कुमार और अलोक अराधे ने यह फैसला दिया।
### मुख्य तथ्य और पृष्ठभूमि:
– *मामले का सार*: शोभा एस. अराध्या (प्रतिवादी) ने एस. नागेश (अपीलकर्ता) पर धारा 138 के तहत चेक बाउंस का मुकदमा दायर किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि नागेश ने उनसे 5,40,000 रुपये उधार लिए थे (जनवरी 2010 से जुलाई 2010 के बीच)। नागेश ने 10 जुलाई 2013 का चेक दिया, जो 17 जुलाई 2013 को अपर्याप्त फंड्स के कारण बाउंस हो गया।
– प्रतिवादी ने 13 अगस्त 2013 को लीगल नोटिस भेजा, जो ‘अनक्लेम्ड’ लौट आया, लेकिन कूरियर कॉपी डिलीवर हुई मानी गई। कोई पेमेंट न होने पर, उन्होंने 9 अक्टूबर 2013 को मैजिस्ट्रेट कोर्ट, मैसूर में शिकायत दाखिल की (पीसीआर नंबर 3144/2013, जो बाद में सीसी नंबर 1439/2014 बना)।
– समस्या: शिकायत दाखिल करने में 2 दिन की देरी थी (कानूनी समय सीमा 1 महीना है, जो 7 अक्टूबर 2013 को खत्म हुई)। लेकिन शिकायत में गलती से लिखा था कि यह समय पर दाखिल है। मैजिस्ट्रेट ने उसी दिन (9 अक्टूबर 2013) संज्ञान ले लिया, बिना देरी को माफ किए।
– बाद में, मैजिस्ट्रेट ने देरी नोट की और 30 अक्टूबर 2018 को देरी माफ कर दी (प्रतिवादी ने वायरल फीवर का मेडिकल सर्टिफिकेट दिया)।
### अपील की प्रक्रिया:
– नागेश ने कर्नाटक हाई कोर्ट में धारा 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दाखिल की (क्रिमिनल पिटीशन नंबर 9119/2018), शिकायत रद्द करने की मांग की। उन्होंने कहा कि संज्ञान लेने से पहले देरी माफ करनी चाहिए थी, अन्यथा प्रक्रिया गलत है।
– हाई कोर्ट ने 28 जून 2024 को याचिका खारिज कर दी, कहा कि देरी सिर्फ 2 दिन की थी और बोनाफाइड (ईमानदार) थी। संज्ञान पहले लेना एक ‘क्यूरेबल अनियमितता’ (सुधार योग्य गलती) है, जो बाद में देरी माफ करने से ठीक हो गई।
– नागेश ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
### सुप्रीम कोर्ट का फैसला:
– कोर्ट ने कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (एनआई एक्ट) की धारा 142(1)(बी) के प्रोविजो के अनुसार, देरी वाली शिकायत का संज्ञान तभी लिया जा सकता है जब पहले शिकायतकर्ता कोर्ट को संतुष्ट करे कि देरी का पर्याप्त कारण था। संतुष्टि और देरी माफी संज्ञान लेने से पहले होनी चाहिए।
– मैजिस्ट्रेट ने गलती की क्योंकि संज्ञान पहले ले लिया, जबकि देरी बाद में माफ की। हाई कोर्ट का नजरिया गलत था कि यह सिर्फ अनियमितता है।
– कोर्ट ने दशरथ रूपसिंह राठौड़ मामले (2014) का हवाला दिया, जहां कहा गया कि संज्ञान सिर्फ समय पर शिकायत पर ही लिया जा सकता है, जब तक देरी माफ न हो।
– परिणाम: अपील मंजूर की गई। शिकायत रद्द कर दी गई। मैसूर कोर्ट का केस क्वाश (रद्द) हो गया।
### महत्वपूर्ण बिंदु:
– यह फैसला एनआई एक्ट के तहत चेक बाउंस मामलों में प्रक्रिया की सख्ती पर जोर देता है। देरी माफी संज्ञान से पहले जरूरी है, नहीं तो पूरा मुकदमा अमान्य।
– प्रतिवादी खुद जिम्मेदार थी क्योंकि शिकायत में गलत लिखा कि समय पर दाखिल है।
– फैसला 2026 का है, लेकिन घटना 2013 की है, जो 11 साल से ज्यादा लंबित था।